लगातार घाटे का सौदा बन रहा सोयाबीन, खून के आंसू रोने को मजबूर किसान, सरकार तमाशबीन


मोटा मुनाफा के चक्कर में किसान सोयाबीन से मुंह नहीं मोड़ पा रहे हैं, जबकि पिछले कई सालों से यह लगातार घाटे का सौदा साबित हो रहा है. पिछले साल की हल्की राहत की भी एक ही 25% किश्त मिली और अब फिर से सोयाबीन दगा दे गया है. ऐसे में किसान परेशान है. चिंता की लकीरें सरकार के चेहरे पर भी आना लाजिमी हैं, लेकिन इस समस्या का सही समाधान क्यों नहीं तलाशा जा रहा?
देश और ख़ास कर हमारा किसान कोरोना संकट से जूझ ही रहा था कि अब सोयाबीन में लगे पीला मोजेक से किसान सदमे में है. प्रदेश भर से मिल रही ख़बरों के मुताबिक़ लगभग सोयाबीन फसल नष्ट हो गई या नष्ट होने की कगार पर है. सरकार की बात करें तो वह किसान की उचित सहायता करने की स्थिति में नहीं दिख रही. ऐसे में सारी मार किसान को ही झेलनी होगी. 
 
फसल बीमा की बातें तो बहुत होती हैं, लेकिन धरातल पर उसका ठीक ठीक असर नहीं दिखता. सभी किसानों का फसल बीमा नहीं हो रहा इसके लिए सरकार कोई ख़ास गंभीर नहीं दिखती. इसके लिए किसानों को जितना जागरूक किया हजाना चाहिए हम समझाते हैं नहीं किया गया नहीं, अन्यथा वह क्यों नहीं इसे अपनाएँ. जिनका बैंक से लेनदेन है उनका बीमा हो जाता है शेष ओवरड्यू इससे वंचित रहते हैं. जिनका फसल बीमा होता है उनका कहना है कोई ख़ास लाभ नहीं मिलता. उनका यह सन्देश भी बचे किसानों को हतोत्साहित करने का काम करता है. कहने को तो सरकार के पास कृषि विभाग है, लेकिन वह क्या काम करता है, कोई ख़ास उपलब्धि सामने नहीं आती. और किसान खून के आंसू रोने को मजबूर है. 
 

हिम्मत न हारें, पटवारी पूरी निष्ठा और ईमानदारी से आपके साथ हैं
इस सम्बन्ध में पटवारी की भूमिका की बात करें तो शाजापुर से पटवारी श्री ललित कुम्भकार बताते हैं कि अतिवृष्टि और कीट व्याधि से दो दिन के दौरान ही किसानों के खिले हुए चेहरे एक दम पीले पढ़ गए. पहले अवर्षा और फिर 21-22 अगस्त को तेज वर्षा के बाद सफेद मक्खी, पीले मोजेक की वजह से लहलहाती फसलें तबाह होने की कगार पर हैं. नुकसान ऐसा कि मुंह से बोलते हुए किसान बिलखने लगे. पहले कोरोना ने आर्थिक रूप से तोड़ दिया था और अब ये कीट व्याधि बम्पर आवक की राह में रोड़ा बन कर आ गई. सोयाबीन तबाह होने की कगार पर है. 

बे बताते हैं किसान की मेहनत का जो फल फसल आने पर उसे मिलता है, उसकी पूर्ति कोई बीमा या मुआवजा नहीं कर सकता. फिर भी एक पटवारी होने के नाते किसान का सबसे करीब और उसके कृषि परिवार का सदस्य होने के नाते फसलों की दुर्दशा और किसान के चेहरे पर चिंता की लकीरें पढ़ लेता हूं और अपने सभी  किसान भाइयों से निवेदन करूँगा कि वे हिम्मत न हारें, हम सभी पटवारी पूरी निष्ठा और ईमानदारी से आपके साथ हैं. शासन निर्देशों के तहत आपके हित में कार्य किया जाएगा.

पीला मोजेक क्या है ?पीला मोजेक रोग के शुरुआती लक्षण में विषाणु जनित रोग है, जो रस चूसक कीट एवं सफेद मक्खी के द्वारा फैलता है. प्रारंभिक अवस्था में पौधे की पत्तियों पर गहरे पीले रंग के धब्बे दिखाई देते हैं. इस रोग से ग्रसित पौधा छोटा रह जाता है और उनके दाने भी भर नहीं पाते.

क्या है इसके लक्षण ?रोग ग्रस्त पौधों की पत्तियों की नसें साफ दिखाई देने लगती हैं, उनके नरम पन कम होना, बदशक्ल होना, ऐठ जाना, सिकुड़न समेत अन्य लक्षण साफ दिखाई देते हैं. जिसमें पौधों की पत्तियां खुरदुरी हो जाती हैं, कुछ पौधों की पत्तियों पर चितकबरे गहरे हरे-पीले धब्बे दिखाई देने लगते हैं. पत्तियों में छेद नजर आने लगते हैं, 2 से 3 दिन बाद पूरा पौधा पीला हो जाता है.

क्या है उपाय ?वैज्ञानिक किसानों को सलाह देते हैं कि यलो मोजेक रोग से ग्रसित पौधे को शुरुआत में ही उखाड़ कर अलग कर देना चाहिए, जिससे वहां दूसरे पौधों में संक्रमण ना फैले. प्रारंभिक अवस्था में पौधे में नीम तेल का छिड़काव 1.15 लीटर प्रति एकड़ चिपकने वाला पदार्थ मिलाकर करना चाहिए. किसान मार्केट में मिलने वाले कीटनाशक का उपयोग भी कर सकते हैं, लेकिन प्रारंभिक अवस्था में पौधे उखाड़ देना ही ज्यादा फायेमंद है.
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News Digital India 18

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