'आ अब लौट चलें..' मजबूर हो के अपने गांव की डगर पर मजदूर



पहले नौकरी करने वाले कहते थे कि हम पेटपुरा जा रहे हैं, यानि जहाँ से हमारा गुजारा होता है, वहां जा रहे हैं. यह सही है कि हमारे देश की अधिकतम आबादी गावों में रहती है और देश की आर्थिक उन्नति में गांव का बहुत बड़ा योगदान रहता है. गांव में खेती और अन्य उपजों के कारण हमारा भरण पोषण होता है. गांव के बिना हमारा जीवन यापन शून्य है. अन्न का कोई भी अन्य विकल्प नहीं है. आपको पेट की भूख शांत करने अन्न की ही जरुरत होगी, धन काम नहीं आएगा. 



डॉक्टर अरविन्द प्रेमचंद जैन भोपाल

गांव से शहरों की ओर का पलायन का मुख्य कारण आजीविका का अभाव, रोजगार के कोई अवसर नहीं, निम्मतम मौलिक सुविधाएँ जैसे सड़क, पानी, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएँ न होने से ग्रामवासियों का पलायन शुरू हुआ. एक वक़्त था जब ग्रामीण जनों का इतना शोषण हुआ की उन्होंने कभी नगद रूपया तक नहीं देखे. गरीब काम करने वालों का वहां के मालगुजार /पैसे वाले नौकरों से अपनी पूरी तीमारदारी कराते थे और मेहनताने के रूप में अपने घरों का अनुपयोगी सामान जैसे कपडा, जेवर, अन्न. आदि देकर पीढ़ियों से काम कराते रहे. उनका आर्थिक, सामाजिक, पारिवारिक शोषण करते रहे. जब सब ओर निराशा दिखाई दी तो उनमे से कुछ ने साहस कर अपने पास से कस्बे,शहर, महानगर की ओर भागे. नया दौर था, शुरूआती समय में बिना प्रक्षिशण के फैक्ट्री में. पल्लेदारी में और जिसमे कुछ कुशलता थी काम करने लगे. उनके माध्यम से अन्य लोग भी बाहर निकले. कुछ पढ़ाई के वास्ते भी शहरों में आये. 


इस प्रकार यह क्रम वर्षों चला और गांव खाली होना शुरू हुए और शहरों में आबादी का बढ़ना शुरू हुआ. इससे शहरों में कामगार. कार्य करने वालों की उपलब्धता बड़ी और सुख सुविधाएँ जुड़ने से उसी रंग में रच पच गए. इस कारण उनकी आमदनी बढ़ी और उनका योगदान शहरों के विकास में बढ़ा, आज भी महानगरों में फैक्ट्री, बाज़ार, होटल्स, भवन निर्माण सड़क निर्माण और अन्य छोटे छोटे कार्यों में जैसे घरों में साफ़ सफाई, झाड़ू बुहारी करना, बच्चों की देखभाल करना आदि ऐसा कौन सा क्षेत्र इन गांववासियों से नहीं बचा, यानी प्रत्येक क्षेत्र में ग्रामवासियों का महत्वपूर्ण योगदान रहा. इस कारण गांव खाली हुए. खेती किसानी में मजदूरों की कमी भी हुई. उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश, ओडिशा आदि पूरे देश के गांव खाली हुए और अपनी आजीविका के लिए देश के साथ विदेशों में भी जाना हुआ. इनके माध्यम से विकास भी हुआ और भरण पोषण कर रहे थे.

सरकारें तो सीमित नौकरियां देती हैं पर निजी संस्थानों ने भरपूर अवसर भी दिए और अपना विकास भी किया. कई बार महाराष्ट्र प्रान्त के निवासियों ने प्रवासी मजदूरों का घोर विरोध किया, पर अंत में उनके बिना काम न होने के कारण फिर से खपाना पड़ा. इससे सरकारों और निजी संस्थानों की सेहत पर कोई भी विपरीत प्रभाव नहीं पड़ा. असर पड़ा तो उनके निजी गावों में और वहां की अर्थव्यवस्था में. उसको भी सहन किया गया. 

विगत २ माह से प्रवासी मजदुर जिनकी संख्या करोड़ों में हैं और उनका पलायन लॉक डाउन के कारण कितनी विषम और दयनीय स्थितिओं में उनको निकलना पड़ा जिनकी अकल्पनीय, अकथनीय और दारुण कहानियां देखने सुनने मिली और उनकी आप बीती असहनीय, इससे लगा शायद जो समय के भोजन के लिए कितने अधिक गुलाम हुए. सब सरकारें उनके साथ हमदर्दी दिखाती हैं पर वास्तविक धरातल पर उनको कितनी वीभस्त वेदनों को झेलना पड़ा और हजारो हजार को पैदल, साइकिल आदि से सैकड़ों मील चल कर जाना पड़ा, भूखे लांघे अपने जीवन की परवाह किये बिना गए और मरे, जो मरे वे कष्टों से मुक्त हुए और जो बच गए उनके सामने परिवार के भरण पोषण की समस्या. पेट की भूख शांत करने भोजन अन्न चाहिए, उनकी भूख बातों, आश्वासनों से नहीं मिटने वाली हैं. 


अब इस समय सबसे बड़ी आर्थिक समस्या यह आएँगी की यदि उन प्रवासी मजदुर यदि अपने अपने कामों पर वापिस न हुए तो पूरा तंत्र ध्वस्त हो जायेगा. बिना मानवशक्ति से उत्पादन होना असंभव होगा, निर्माण कार्य नहीं होंगे जिससे आर्थिक स्थिति बहुत ख़राब होंगी और गावों में नौकरी, रोजगार न मिलने से उनके सामने भुखमरी बढ़ेंगी. 

इन दो माहों में इन मजदूरों की आप बीती शब्दों में बयां नहीं की जा सकती हैं, उनकी अनुभूतियाँ, उनके अकथनीय कष्टों की अनंत कथाएं हैं, जो समाचार पत्रों, टी वी में पढ़ने देखने मिल जाती हैं वे तो प्रामाणिक हैं पर जो इनके सामने नहीं आये क्या वे कष्टों से मुक्त रहे होंगे. 

केंद्र सरकार ने अपनी हठवादिता और अदूरदर्शिता के कारण कोई प्रामाणिक योजना नहीं बनाई. शायद कुर्सी पर बैठे लोगों को यह अहसास नहीं होगा की ऐसी स्थिति भी पैदा होगी. सरकार नियमों का पालन कराने में बहुत सचेत रही पर इनके प्रति अमानवीय व्यवहार किया गया जो भोगने वाले सरकारों को कभी माफ़ नहीं करेंगी और जिनकी क्षति हुई हैं उनको सरकारों पर से भरोसा उठ गया. 

एक बात भारत गलती हो गयी इंडिया में बहुत अच्छी हैं, यहाँ जिन्दा व्यक्ति की कोई इज़्ज़त नहीं हैं, वह एक रोटी मांगे तो लाठी मिल सकती हैं, पर अपराधी जो सरकार की सम्पत्ति मान ली जाती हैं उसको सब सुविधाएँ मिल जाती हैं, खाना, पीना, रहना, देखरेख, सुरक्षा सब फ्री है. एक्सीडेंट से मरने पर भी सुविधाएँ दी जाती हैं. मरने के पहले चाही गयी सुविधाएँ नाकर दी जाती हैं, मरने के बाद मुआवजा देते हैं और मुर्दे को सब सुविधा देते हैं कारण मरने वाला स्वर्गीय होने से भव्य आत्मा मान लिया जाता हैं जबकि हमारे देश में नेता एक बार बन गया उसे जीवन भर सुख सुविधाएँ, पेंशन, इलाज़ घर नौकर चाकर सब फ्री में मिलते हैं चाहहए वे नाकारा क्यों न हों, वर्षों मर्त जैसे रहे पर सब साधन जुटाए गए. और अंत समय में भी तिरंगा से सम्मान.  

मजदुर जिसके श्रम से देश का विकास होता हैं, जिनके वोट से सड़क का आदमी शिखर पर पहुंचकर अपनी औकात भूल जाता हैं वे भाग्यविधाता माने जाते हैं और जिनका खून पसीना उन्हें घृणा पैदा करता हैं, यह कब तक विसंगति चलेगी इस देश में. यदि सभी प्रवासी मजदूरों को गावों में उद्यम खुल जावें और उनको अपनी पुरानी जगहों पर काम पर न लौटे कारण वे वर्षों से उन फैक्टरियों में कार्यरत रहकर अनुभवी हो चुके थे न जाए तब उन फैक्टरियों का उत्पादन प्रभावित नहीं होगा क्या? मजदुर के श्रम, कौशल का जब तक सम्मान नहीं होगा तब तक उद्योगपति उनका शोषण करने से नहीं चूकते या चूकेंगे. 

निकट भविष्य में इतनी अधिक बेरोजगारी से और मंहगाई के कारण अराजकता, लूट खसोट, चोरी, डकैती, आत्महत्याएं, हत्यायों का ग्राफ नहीं बढे. गांव में और अधिक बढ़ने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है.  इसके अलावा इस लॉक डाउन ने चलती हुई अर्थव्यवस्था का पहिया खड़ा कर दिया, अब इसको पटरी में लाने में बहुत समय लग सकेगा और अभी भी अनिश्चितता की स्थिति बन पडी हैं. 


एक तरफ बचाव के लिए चालीस दिन का समय दिया और शराब की दुकाने, राजस्व के लिए खोलने का क्या औचित्य रहा ?वैसे लॉक डाउन न करके जानकारी और बचाव से अवगत कराकर भी कोरोना जंग जीत सकते थे. आज जो जो इलाज़ कर रहे हैं मर्ज़ बढ़ता जा रहा हैं. इसका मतलब यह हैं की लॉक डाउन खोले और व्यापार भी चलने दे. सरकार के द्वारा दी जा रही सुविधाओं में भारी अनियमितता हैं. इस समय कई लोगों का पुण्यपर्व चल रहा हैं. किराना, दवा, अन्य आवश्यक वस्तुओं की कालाबाज़ारी का चलन प्रचलन में हैं. 

सरकारों की अदूरदर्शिता का परिणाम जनता को कई वर्षों तक भुगतना होगा.  वे तो भाग्यशाली हैं, जिनको शासन करने का मौका मिला है, अन्यथा असफलता का सेहरा तो बंध चुका है. वे जरूर अपने मुंह मिया मिठ्ठू बन रहे, पर देश को कई वर्ष पीछे ले गए. अब बेचारे प्रवासी मजदूरों को उनके गावों में रोजगार के साधन मिले और अब शहर की चमक दमक से दूर रहकर ग्रामीण व्यवस्था में सुधार की जरुरत है.  



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