भूख से मरेंगे या कोरोना से? चिंता में राष्ट्र निर्माता



कोरोना महामारी के चलते एक ओर जहाँ सरकर विदेशों में फसे प्रवासी भारतीयों को किसी तरह सरकारी अथवा निजी  विमानों की सहयता से भारत लाने में लगी है, तो वहीं देश में फसे विदेशी सैलानियों की सहयता में भी सरकारी अमला लगा हुआ है। यह हमारी जिम्मेदारी और हमारी सभ्यता दोनों ही है कि हम न केवल प्रत्येक भारतवासी, अपितु संपूर्ण मानव जाति की रक्षा करें, लेकिन इन लोगों की मदद में संपूर्ण तंत्र इतना ज्यादा व्यस्त हो गया कि उसे सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलकर अपने गाँव जा रहे देहाड़ी मजदूर नजर ही नहीं आ रहे हैं। वो नहीं देख पा रहा है कि किस तरह हजारों लोग इस महामारी के खौफ के बीच भूखे प्यासे अपने जरा - जरा से बच्चों को लिये, अपने परिवार के साथ गाँव लौटने पर मजबूर हैं। प्रवासी भारतीयों को विमान मुहईया कराने वाली सरकर न तो इन गरीबों के लिये उसी स्थान पर कोई पुखता व्यवस्था कर पा रही है और न ही इनके लिये कोई साधन उपलब्ध करवा पा रही है। लॉक डाउन के 4 दिन बाद अब धीरे-धीरे सरकारी तंत्र की नींद खुलने तो लगी है किंतु अब तक इन दिहाड़ी मजदूरों तक कोई सुविधा नहीं पहुंची है।




भवानी प्रताप सिंह ठाकुर 

भारत में कोरोना के बढ़ते मामलों को देख भारत सरकार ने अपनी सूझबूझ दिखाते हुए 21 दिन के लिए संपूर्ण लॉक डाउन की घोषणा कर दी। इस घोषणा के पहले कई राज्य सरकारें भी संपूर्ण लॉकडाउन एवं कर्फ्यू की घोषणा कर चुकी थी। यह बेहद जरूरी कदम था देश को इस महामारी के संकट से बचाने के लिए। निश्चित ही सरकारों ने ये सोच समझकर किया होगा। 


केन्द्र सरकार के बारे में यह बात बड़े गर्व के साथ कहीं जाती है कि वर्तमान सरकार में निर्णय लेने की क्षमता एवं इच्छाशक्ति दोनों है। एक पक्ष ये भी है कि पिछले लंबे समय से सरकार पर जल्दबाजी में निर्णय लेने का आरोप भी लगते रहें हैं। कई बार यह आरोप राजनैतिक हो सकते हैं, लेकिन  जब व्यवस्था कमजोर दिखाई देने लगे तो प्रश्न उठना लाजमी हो जाता है।
ठीक ऐसा ही एक प्रश्न आज दिहाड़ी मजदूरों की हालत देखकर उठता है। क्या सरकार इस बारे में विचार करने में असफल रही है की इस 21 दिन के लॉकडाउन का इन दिहाड़ी मजदूरों पर क्या प्रभाव पड़ेगा ? या सरकार अपनी बनाई हुई नीतियों का क्रियान्वयन करने में असफल रही।

आज दिल्ली मुंबई समेत देश के महानगरों में ऐसे लाखों मजदूर है जो की गैर पंजीकृत मजदूर है। ये लोग या तो किसी निर्माणाधीन इमारत में मजदूर का काम करते हैं या फिर किसी कंपनी में। इन मजदूरों की कोई जमा पूंजी नहीं होती। दिन भर मेहनत करने के बाद रात को जो धन पाते हैं उससे ही इनका घर चलता है। सरल शब्दों में कहें तो ये दैनिक कमाने खाने वाले लोग हैं। 


आज जब कोरोना के चलते 21 दिन संपूर्ण लॉकडाउन घोषित हो चुका है, सारे काम बंद हो चुके हैं। तब इन मजदूरों के पास ना तो कोई काम है और ना ही कोई नियत ठिकाना। ऐसे में सड़क किनारे रात बताने वाले हजारों मजदूर आज आसरा रहित हो चुके हैं। बात याद दिल्ली की करें तो चकाचौंध भरी दिल्ली ऐसे हजारों लोग है जो बिहार, आजमगढ़, बदायू कानपुर और अन्य जगहों से दिल्ली और नोएडा में स्तिथ कम्पनियों में मजदूरी कर अपना और अपने परिवार का पेट पाला करते हैं। आज जब पूरी दिल्ली लॉकडाउन हो चुकी है तब ना तो कोई काम मिल पा रहा है और न ही इनके लिए दो वक्त की रोटी का इंतजाम हो पा रहा है। विपत्ति के समय में दिल्ली के आम आदमी मुख्यमंत्री केजरीवाल ने वादे तो किए किंतु वो वादे अब तक पूरे होते नहीं दिखाई दे रहे हैं। आज दिल्ली की ऊँची इमारतों के बीच इन दिहाड़ी मजदरों की हैसियत इतनी बौनी पड़ गई है कि अन्य जरूरतमंदों को विमान मुहैया करा देने वाली सरकार इन गरीबों की सहायता के लिए चंद बसें मुहैया कराने पर अब तक केवल विचार ही कर रही है। 

ये वही गरीब मजदूर वर्ग है जो भारत का निर्माता है जिसकी मेहनत से आज देश में हजारों कंपनियां चल रही है। देश की मशहूर इमारतों , मशहूर कंपनियों के लिए काम करने वाले ये गुमनाम लोग, वही लोग हैं जिनका जिक्र चुनाव के पहले हर पार्टी, हर नेता करता है। लेकिन दुर्भाग्य है, की चुनाव के बाद इन्हीं लोगों को राजनेता अपने मैनेफेस्टो के साथ - साथ अपने दिल और दिमाग से भी यूँ निकाल फेकते हैं, जैसे दूध में से मक्खी। यदि निकट समय में विधानसभा चुनाव होते तो जरुर इनकी राहों में फूल बिछाये जाते। संभव यह भी था की नेताजी खुद इनकी खिदमत में लगे होते, लेकिन अफसोस की अभी कोई चुनाव नहीं होना है। 

यह ऐलान तो आज से 4 दिन पहले ही कर दिया गया कि गरीबों को हरसंभव मदद मुहैया कराई जाएगी। किंतु इस एलान के संसद से सड़क तक पहुंच वास्तविक धरातल पर सत्य होने का इंतजार बेहद लंबा है। आज देश के कई बड़े चेहरे इस आपदा से लड़ने के लिए आर्थिक सहायता हेतु सामने आए हैं। किंतु ऐसे धन और सहायता का भी क्या महत्व जो जरूरतमंद व्यक्ति तक पहुंच नहीं पा रही हो। इस विषय पर तर्क वितर्क हो सकते हैं। किंतु यह एक कड़वी सच्चाई है कि सरकारी तंत्र अपनी जिम्मेदारी निभाने में विफल रहा है। 


यही कारण है कि यह मजदूर महामारी के साए में सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलने पर मजबूर है। यदि प्रशासन व्यवस्था करता तो ऐसा नहीं होता। ऐसे तमाम लोग हैं जो इस समय इस मजदूर तबके को जहां है वहीं ठहर जाने की सलाह दे रहे हैं, किंतु क्या यह संभव है ? यदि संभव है तो कैसे ? क्या खुले आसमान के नीचे सो जाने पर कोरोना नहीं होगा ? क्या सरकारी व्यवस्था इतनी मजबूत है कि इन हजारों मजदूरों को आसरा मुहैया करा पाए ? 

एक ओर जहां दिल्ली की आम आदमी ने इन दिहाड़ी मजदूरों को नजर अंदाज किया, तो वहीं बिहार के विकास पुरुष की नजर भी इन दिहाड़ी मजदूरों पर नहीं पड़ी। उत्तर प्रदेश के योगी से लेकर केंद्र की सबका साथ - सबका विकास वाली सरकार सब को बारी-बारी आस लगाकर देखने के बाद अपने ईश्वर को प्रणाम कर उसी ईश्वर के सहारे यह 'दिहाड़ी मजदूर ' एक ऐसे सफर पर निकल चुके हैं जहां या तो इन्हें सफलता मिलेगी और यह अपने घर पहुंच जाएंगे या फिर इन्हें राह में ही मृत्यु के दर्शन हो जाएंगे। इस समय यह मजदूर वर्ग वक्त की एक ऐसी मार झेल रहा है। जहां एक ओर महामारी से जान जाने का जोखिम है तो दूसरी ओर भूख प्राण लेने पर आमादा है। इन मजदूरों की मानें तो ये कोरोना वायरस से तो एक बार बच सकते हैं किंतु भूख, भूख इन्हें जीवित नहीं छोड़ेगी। 

लेकिन इन्हें ये भी यकीन है कि ये सभी सही सलामत अपने घर पहुंच जाएंगे और सबका साथ - सबका विकास के मूल मंत्र वाली सरकारें इन्हें फिर से याद करेंगी। चुनावों के ठीक पहले।




Share on Google Plus

News Digital India 18

पाठकों के सुझाव सदा हमारे लिए महत्वपूर्ण है ..

0 comments:

Post a Comment

abc abc