कोरोना से तो हम एक दिन निपट ही लेंगे, लेकिन जब मानवता ही ख़त्म हो जायेगी फिर रह ही क्या जाता है?





लॉकडाउन में दिहाड़ी मजदूरों की मुसीबत बढ़ी, 

कोरोना से बड़ी समस्या बनी भूंख



यह हालत बहुत ही चिंताजनक है. जी हाँ, कोरोना संकट से भी कहीं ज्यादा, क्योंकि कोरोना से तो हम एक दिन निपट ही लेंगे, लेकिन जो यह समस्या है, यह हमारी मानवता को खत्म कर रही है. और जब मानवता ही ख़त्म हो जायेगी फिर रह ही क्या जाता है? कोरोना से मरेंगे या नहीं, उन्हें यह नहीं पता, लेकिन इतना जानते हैं कि कोरोना से बड़ी यह भूंख है, जिससे मरना तो तय है, बस उसी से बचने यह निकल पड़े हैं पैदल सैकड़ों कि.मी. की यात्रा पर. 
- सृष्टि सक्सेना  



महानगरों की चकाचौंध उन्हें अपनी और खींच तो ले गई थी, लेकिन आज मुसीबत के समय उन्हें अपने ही याद आये. महानगरों में दिहाड़ी मजदूरों की कुछ यही दास्ताँ है. हालांकि इनके लिए केंद्र सरकार ने 1 लाख 70 हजार करोड़ का पॅकेज की घोषणा की है. बालाजी ट्रस्ट ने 100 करोड़, शिरडी साई ट्रस्ट द्वारा 50 करोड़ की ख़बरें हैं, इनके अलावा भी दान दाताओं की बड़ी फेहरिस्त सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है, लेकिन यह सब लाखों करोड़ की राहत की बातें इन्हें राहत नहीं दे सकीं. 



यह हालत बहुत ही चिंताजनक है. जी हाँ कोरोना संकट से भी कहीं ज्यादा, क्योंकि कोरोना से तो हम एक दिन निपट ही लेंगे, लेकिन जो यह समस्या है, यह हमारी मानवता को खत्म कर रही है. और जब मानवता ही ख़त्म हो जायेगी फिर रह ही क्या जाता है? कोरोना से मरेंगे या नहीं, उन्हें यह नहीं पता, लेकिन इतना जानते हैं कि कोरोना से बड़ी यह भूंख है, जिससे मरना तो तय है, बस उसी से बचने यह निकल पड़े हैं पैदल सैकड़ों कि.मी. की यात्रा पर. 



जो पूंजीपति हैं, जिन्होंने देश से बेहतर विदेश को समझा, उन ज्यादा पढ़े लिखे लोगों को सरकार विदेश से एयरलिफ्ट करा लाई, लेकिन देश की अर्थव्यवस्था को चलाने वाले गरीब मजदूर, जो इस लॉकडाउन में भूखे प्यासे हैं, उन्हें अपने घर पैदल लौटना पड़ रहा है. न तो सरकार और न ही वे अमीर ठेकेदार, जो इनके दम पर खूब आगे बढ़ गए, लेकिन मुसीबत के समय पर इन्हें कोई सहारा नहीं दे सके. इतना भी नहीं कि कम से कम इन्हें इनके अपने घर-अपनों के बीच ही पहुंचा देते. 

इतना ही नहीं सामजिक ढर्रा किस कदर ढह गया है, जहां यह लोग रह रहे थे, वहां के आस पास के लोग भी इनकी कोई सहायता नहीं कर पा रहे. ऐसे में उन्हें अब केवल और केवल अपने पैतृक गाँव उनके अपने ही याद आ रहे हैं. वे कह रहे हैं अब कभी नहीं लौटेंगे शहर. कभी नहीं लौटेंगे दिल्ली, कभी नहीं लौटेंगे मुम्बई. 

ऐसा भी नहीं है कि सरकारें इनके लिए काम नहीं कर रही हैं, लेकिन वह इन लोगों में विशवास कायम नहीं कर सकीं हैं. दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल जी रोज 4 लाख लोगों को भोजन देने की बात कर रहे हैं. मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह जी भी कह रहे हैं कि समाज के ऐसे वर्ग, खासकर ऐसे श्रमिक, जो कार्य के लिए अन्य स्थानों पर गए, विवश हैं और अब अपने घर लौटना चाहते हैं, उनकी सहायता के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएं, लेकिन विशवास जैसे सबकुछ ख़त्म हो गया है. मजदूर कह रहे हैं हमें आज तक कोई सहायता नहीं मिली है. 






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