ऋग्वेद की ऋचाओं का भावानुवाद : ज्ञान, जो परमात्मा ने ऋषियों के हृदय से बहाया



पुस्तक समीक्षा

पुस्तक :  स्वर्णपात्र ( वैदिक कविताएँ)
रचनाकार: डॉ.मुरलीधर चांदनीवाला,
               'मधुपर्क' ७ प्रियदर्शिनी नगर,रतलाम ४५७००१
               संपर्क: (०७४१२)२६३१४२, मोबाइल: ९४२४८६६४६०

पृष्ठ: 215
कीमत: 300 रू.
प्रकाशक:  वरेण्यम- अर्यमा हाउस ऑफ क्रिएशन्स, रतलाम , मध्य प्रदेश


'स्वर्णपात्र' यह पूरी पुस्तक ऋग्वेद की ऋचाओं का न केवल भावानुवाद है अपितु वही ज्ञान, जो परमात्माने ऋषियों के हृदय से बहाया हैं वही ज्ञान ऋषियों की कृपा से या कहूँ कि वही परमात्मा की कृपा से ही आदरणीय. मुरलीधर चांदनीवाला की कलम से बहा है।  यह किताब में रही हर रचना, जो कि परमात्मा की ही वाणी है तो उसे तर्क के बदले हृदय से पढ़ना पड़ा है। क्योंकि यह ज्ञान के जनक परमात्मा जो हमारी आत्मा बनकर हम सब में विद्यमान है उन तक पहुँचने के लिए हमें हमारी सभी मर्यादाओं को पहचानकर उसे लांघकर आगे बढ़ना होगा। हमारी बुद्धि , हमारा अहंकार, यहाँ तक कि हमारा छोटामन भी..! क्योंकि ज्ञान का आचमन करने के लिए वो सभी ठगी आवरण त्यागने होंगे। ज्ञान पाना बुद्धि का विषय है ही नहीं बुद्धि की सीमा जहाँ पर खत्म होती है वहीं से जो श्रद्धा का आकाश खुलता है उसी में विचरण करना है। हमारे ऋषियों ने भी वही किया है। और आदरणीय मुरलीधरजी ने भी वही किया है तो हमें भी वही ही करना होगा!




भावना भट्ट
भावनगर, गुजरात   


हुत ही पावक ग्रंथ ऋग्वेद की ऋचाओं से निस्तरित ज्ञान के पुंज सम इन कविताओं की समीक्षा करना थोड़ा कठिन था क्योंकि यह परम् ज्ञान रूपी सागर में डुबकी लगाते ही मन - बुद्धि,स्मृति समेत आत्मा में लीन हो जाता था और ऐसे में कलम निसहाय होकर चुप हो जाती थी। तब एक पल के लिए वही परमात्मा को प्रार्थना हो जाती थी जो हम सबकी आत्मा में विद्यमान है..! और दूसरी ही पल उनकी ही कृपा से, भाव शब्ददेह धारण करके कलम से चल पड़ते थे।


यह पूरी पुस्तक ऋग्वेद की ऋचाओं का न केवल भावानुवाद है अपितु वही ज्ञान, जो परमात्माने ऋषियों के हृदय से बहाया हैं वही ज्ञान ऋषियों की कृपा से या कहूँ कि वही परमात्मा की कृपा से ही आदरणीय. मुरलीधर चांदनीवाला की कलम से बहा है।  यह किताब में रही हर रचना, जो कि परमात्मा की ही वाणी है तो उसे तर्क के बदले हृदय से पढ़ना पड़ा है। क्योंकि यह ज्ञान के जनक परमात्मा जो हमारी आत्मा बनकर हम सब में विद्यमान है उन तक पहुँचने के लिए हमें हमारी सभी मर्यादाओं को पहचानकर उसे लांघकर आगे बढ़ना होगा। हमारी बुद्धि , हमारा अहंकार, यहाँ तक कि हमारा छोटामन भी..! क्योंकि ज्ञान का आचमन करने के लिए वो सभी ठगी आवरण त्यागने होंगे। ज्ञान पाना बुद्धि का विषय है ही नहीं बुद्धि की सीमा जहाँ पर खत्म होती है वहीं से जो श्रद्धा का आकाश खुलता है उसी में विचरण करना है। हमारे ऋषियों ने भी वही किया है। और आदरणीय मुरलीधरजी ने भी वही किया है तो हमें भी वही ही करना होगा. 

डॉ.मुरलीधर चंदनीवालाजी ने स्वयम लिखा है की जब मैं सबकुछ लिखना छोड़कर दिनरात केवल ऋचाओं का पठन करने लगा तब सभी ऋचाएँ अपना अर्थ प्रगट करने लगी और स्वयम ही कविताओं में ढलने लगी। वह अपने विचारों को इस प्रकार दर्शातें है।

एक लंबे समय के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि वेद प्रतीकों के जाल को तोड़कर बाहर आने का प्रयास लगातार कर रहा है। वेद तर्कशील बुद्धि का नहीं, आत्मा का विषय है। मनुष्यता के निमित्त अमरता और आनंद, प्रेम और प्रकाश, ऋत और सत्य के प्रगट होने के लिए अनुकूल अवसर का निर्माण करने कराने वाला वेद जीवन से भरपूर है। सच कहें तो वेद वीतराग का चरम शिखर होते हुए भी जीवन के सभी आयामों को समेटता हुआ जीवन के सभी रस का आस्वाद कराता हुआ जीवन की सुंदरता से भी रूबरू कराता है।


यह किताब की हर रचना में वेदों के प्रतीकों का एक नया अर्थ खुलता है।
वेदों का अर्थ समझने के लिए महर्षि श्री.अरविंद के दृष्टिकोण से देखें तो, प्रचलित मान्यताओं,अंधविश्वासों और कर्मकाण्ड की बोझिलता के उस पार  सुरम्य जीवन है,चिरंतन आशा है, और विश्वास से भरा हुआ शाश्वत सौंदर्य है। उसी से हम रूबरू हो जाते हैं और तभी अग्नि को संकल्प की ज्वाला के रूप में,वरुण को नैतिक आदर्शों के स्वामी के रूप में,इंद्र को भागवत मन के रूप में देखने लगते हैं और चंद्र दिव्य मदिरा बनकर छलकने लगता है। गौएँ उषा की किरणें बन जाती हैं और  अश्व आत्मशक्ति बनकर स्वर्गतक की दौड़ लगा आते हैं।
तो आइए इस भव्य निधि की कुछेक बूंदों का रसास्वाद करते हैं।

रचना 'हम याचक है युद्ध के' की यह पंक्तियाँ
ओ तूफानों!
सृजनकी दिशा तय करो
हमें तुम्हारा निश्चय शुद्ध चाहिए,
हम तो याचक है युद्ध के
हमें युद्ध चहिए।

पहली नजर में यह पंक्तियाँ थोड़ी संशयात्मक लगे क्योंकि हम तो मानवता के पुजारी है न..! हमें तो युद्ध नहीं चाहिए। मगर इस रचना को पूर्ण पढ़ने पर ही इसका रहस्योद्घाटन होता है। कवि कहते है कि

एक  युद्ध
निरंतर चलता है भीतर,
बुलाये जाते हैं इसमें
केवल तेजस्वी योद्धा,
युद्ध जीतते ही
छलक उठता है अमृतकलश।

कितना अनुपम है यह..! यह कोई बाहरी युद्ध नहीं है..!अमृतकलश को पाने की इच्छा ही हमें निरंतर युद्ध की चाह देती है।

इन्द्र माने उत्साह के देवता, भगवत मन जो समुद्र की तरह विशाल भी है और आत्मशक्ति रूपी अश्वों पर सवार होकर स्वर्ग की अनुभूति भी तो वही ही करवाता है ! कितनी सटीक बात कह दी है इस कविता में

ओ उत्साह के देवता!
अमृत प्रकाश और उल्लास से
भर दो मेरा जीवन,
तुम्हारी कृपा हो
तो मुष्टि के प्रहार से ही
जीत लेंगे वृत्र को,
लौटा देंगे उल्टे पैर असुर विचारों को,

तो जीवन की वसंत का स्वागत भी उतना ही सुंदर ..! जैसे दे रहा हो जीवन का संदेश ..!

भाई!
तू अभी यौवन के द्वार पर है,
धुमाच्छन्न मत होने दे
इस वसंत को,

सूरा
बह रही है वनस्थली में
पी ले कलश भर कर,


समूचे मानव कल्याण के चाहक ऋषियों के हृदय से बहती कारुण्य धारा को हमारे लिए ले आई यह रचना भी देखिए !

मैंने पुकारा है अच्युत आनंद को
विश्व की उन्नति के लिए,....

प्राणवान !
तू सोम की धारा में बहते हुए
आगे निकल जा।

प्रार्थना, प्रार्थनाकार और प्रार्थना का परिणाम तीनों के स्वरूप पर प्रकाश डालती यह अनुपम रचना ' आओ स्वप्नसाक्षी'

तुम्हारी
धवल प्रार्थना
सितारों की तरह चमक रही है,
भीतर कहीं से
जीवन उमड़ रहा है,........
निर्मल झरना, और चारु वसंत
तुम्हारी मुस्कान की झलक
पाने के लिए
व्याकुल है

धवलता मतलब शुद्ध भाव से की हुई प्रार्थना निसंदेह जीवन की और मुस्कान की द्योतक है।

नए जीवन की आशाऐं हों या जीवन के खोये हुए सौंदर्य को पुनः पाना हो तो 'दिव्य जन्म होने को है' 'भगवान आते ही होंगे' और ' तुम्हारा जीवन यज्ञमय हो' जरूर पढ़नी पढ़ेगी। 

श्रद्धा की बात लेकर बहती रचना 'कहीं कोई है' जो हमें भी अपनी नाव को सागर पार कराती हुई जीवन के अंतिम प्राप्तव्य तक ले जाती है। देखिए कुछ पंक्तियाँ...
वह चुप नहीं है
मुझसे बात करता है,
वादा है उसका,
कि वह न्याय करेगा
और मुक्त कर देगा मुझे
एक दिन।

और देखिए यह रचना 'युग का बीज' की अद्भुत पंक्तियाँ जिसे पढ़कर केवल वाह..! ही निकल पाती है।

चेतना को कुदाल बनाकर
अंधेरे को खोद रहा हूँ....

  अग्नि को बाहर लाने के लिए
  पृथ्वी को तपस्या करनी होगी..
  खोलनी पड़ेंगी
  वे सब ग्रंथियाँ,
  जहाँ से अग्निशिशुओं का
  उदय होगा।

बात जल की हों या सोम की, सूर्य की हो या व्योम की, हवा की हों या स्वर्गकन्या उषा की, शब्दों का लाघव हमें कविता के माध्यम से सौंदर्य की गहराई और गरिमा तक ले जाता है। यही तो खासियत है रचनाकार की..! कभी कभी तो लगता है की ऋचाओं के सौदर्य के साथ यह रचनाएँ स्पर्धा कर रही हैं। इनमें से किसी की भी हार होना संभव ही नहीं है। तो कभी लगता है कि जुड़वाँ बहने कदम से कदम मिलाकर नृत्य कर रही है और सृष्टि का मनोरम दृश्य खड़ा कर रही हैं!


समाज जीवन की कलुषितता से उबारती रचना 'आह्वान' और 'नदियाँ रो रही हैं' मानो आज के लिए ही रची गई रचनाऐं लगती है जो दर्शाती है की वेदों की यह ऋचाऐं अतीत से लेकर आज तक और आज से लेकर भविष्य तक समाज के उध्दार के लिए सदैव यथोचित है। वेदों का यह ज्ञान आज भी उतना ही अपेक्षित है जो कि हर युग में, हर कालखंड में रहा है

परमात्मा का अद्भुत वर्णन करती यह रचनाएँ 'तुम बहती नदी की तरह' 'कई बार हुआ ऐसा' ' ओ आदिम प्रकाश!' एक बार नहीं बार बार पढ़ने को जी चाहता है और जब भी पढ़ते है ईश्वर जैसे नए अर्थो के साथ रूबरू होते हुए कहते है की हाँ मैं वहीं हूँ मैं यह शब्द के साकार रूप में भी हूँ और निराकार भी हूँ मैं ही वह ब्रह्म हूँ...! तभी तो वह अपनी रचना वागभ्भ्रूणी में कहते है।

मैं शब्द चेतना
सम्पूर्ण जगत की स्वामिनी,
सब वसुओं की
मैं ही संगमनी,.....

  मैं ही
  जीवों में उतरी हुई वागभ्भ्रूणी
  ब्रह्मजिज्ञासा।

कवि और कविता की मीमांसा भी देखिए...!

अनायास ही नहीं
बन जाता कोई महाकवि,
डूबना पड़ता है
हृदय के भीतर, और
गुप्त अग्नि को स्पर्श कर
फिर लौटना पड़ता हैं, बहिरंग में।

संहार के देवता रुद्र को की गई प्रार्थना ' नम्र निवेदन' में संसार के उन सभी आधार स्तंभो को बचाने का निवेदन है जो संसार के आरंभ के लिए और संसार के वहन के लिए जरूरी है। यहाँ पर बहुत चतुराई से कविने वह सब कुछ मांग लिया है जो संसार के नवोन्मेष के लिए और हरेक जीवन को उत्सव बनाने के लिए जरूरी था।

यह रचना मेरी दृष्टि से सबसे ऊपर है जो मानव कल्याण की प्रार्थना के रूप में उतर आई है। लगे कि कलम की मुरली से सुमधुर शब्दों की धुन उतर आई है कोरे पन्नो पर..! जो आँखों के साथ साथ मन को भी तृप्त करती है।


कर्ताभाव से विमुक्त करती रचनाएँ ' मैं तो तंत्रीवाद्य हूँ' ' मैं तुम्हारा यंत्र' 'मैं इस रथ में बैठा हूँ' हों या फिर वर्तमान से जुड़ी हुई रचना ' आज के आनंद की जय हो' वाकई अद्भुत है।

विश्व कल्याणी माँ को समर्पित यह रचना 'माँ' की कुछ पंक्तियाँ यहाँ पर रखने की इच्छा मैं छोड़ नहीं सकती ..!

मैं
माँ में प्रवेश करता हूँ,
जब यह प्रवेश सध जाता है
मेरे प्राण
पवित्रता से भर उठते हैं,
हिंसा का कोई अंश
शेष नहीं होता
और मैं विशाल हो जाता हूँ

जीवन की अंतिम खोज  'मैं कौन हूँ ?'  यही यक्ष प्रश्न को रचनाकारने अपनी रचना ' पूछ, पृथ्वी के नमक से ' में ढाला है।

तुझे खोजना ही होगा
उसका घर,
नवयुग के ओ मानव !
खोद निकाल वहाँ से उसे
जहाँ वह गुप्त ऊर्जा
प्रच्छन्न गति के साथ समाधि में है,

वही आत्मा जो सूक्ष्म से सूक्ष्म और विराट से भी विराट है उसी का वर्णन देखिए रचना 'आत्मा का आनंद ' में

मेरे अंतरिक्ष में कोई
नवजात शिशु
आकर लेट गया है,
और मुझे
ऊपर से नीचे तक
माप रहा है,
अभी अभी वह
आकाश से भी ऊँचा था
अभी-अभी
मुझ से भी बौना

देह ही खलु धर्म साधनम को सार्थक करती हुई रचना 'सोमपात्र' देह के महत्व को इंगित करती हैं
यह देह क्या है ?
कृपाओं से रचित
स्वर्णपात्र
अहोरात्र
जब यज्ञ होता है,
आहुतियाँ पड़ती हैं,
यह पात्र भरने लगता है
सुगंध से

हृदय को प्रतिपल आह्लादित करता यह ऋचाओं के मधुबन की रचना देवों के आशीर्वाद के बिना संभव ही नहीं।
प्रभातवेला में ऊषा की अरुणिम रश्मियों सी यह रचनाएँ पढ़कर मन आलोकित हो जाता है।कविता कहें या वेद मन्त्र का मर्मानुवाद !

बहुत ही गहनता के भाव और पर्यावरण के प्रति सजग दिखाई देती हुई आपकी सभी रचनाऐं आदरणीय ऋतम उपाध्याय के शानदार चित्रांकन के साथ संस्कृत भाषा में लाजवाब अभिव्यक्ति दे रही है।

चिंता बस यही है कि काश.! वैदिक जीवन की दिव्यता फिर भारतीय जन मानस में उतर पाये और समाज का मार्गदर्शन करें.!
देश में यह विडंबना हैं कि मानवता तब भी आहत थी और आज भी करुण क्रंदन कर रही हैं। ऐसे में इस तरह की कविता सब का मार्ग प्रशस्त करें यही प्रार्थना।
ऋग्वेद का यह अनुपम गान,चिरंतन ज्ञान जो भाषा की मर्यादा के कारण साधारण जन से दूर था उसे नवरूप देकर ज्ञान पिपासुओं के लिए ले आने के लिए मैं हम सभी पाठकों की ओर से आपको नमन करती हूँ और आपका अभिनंदन करती हूँ।


आपने अपने 'अर्ध्य' में बताया कि आप को काफी प्रश्नों का सामना भी करना पड़ा..! मगर ज्ञान के हकदार तो सभी है न ?  चाहे वह विद्वान हों या साधारण जन हों..! केवल भाषा की कठिनाई के कारण यह ज्ञान साधारण मनुष्य तक नहीं पहुँच पाया था। जब ऋग्वेद की यह ऋचाएँ ग्रंथस्थ हुई होगी तब कदाचित समाज के ज्यादातर लोग संस्कृत को बोलचाल में उपयोग करते होंगें। या संस्कृत से भलीभाँति परिचित होंगें। मगर समय के साथ परिस्थितियाँ बदल गई है। आज हिंदी साधारण जनमानस तक जा पहुँची है। ऐसे में यह रचनाएँ हिंदी में होने के कारण समाज के बहुधा लोगों को स्पर्श कर पाएगी। रही बात छंद से मुक्त होकर छन्दमुक्त सृजन की तो यह निसंदेह रचनाओं को अधिकतम सरलता और सुंदरता प्रदान कर रहा है। वह कविता ही क्या जो केवल बुद्धि को स्पर्श करें.? कविता तो हृदय को स्पर्श करनी चाहिए..! और आपकी यह रचनाएँ अपना कार्य शत प्रतिशत कर रही हैं।
कुछेक लोगों के सवालों से ऊपर उठकर आपने जो यह उत्तम कार्य किया है वह वाकई अनुकरणीय और नई पीढ़ी के लिए आशीर्वाद समान है। आप को पुनःपुनः पुनः..धन्यवाद देती हूँ और सभी पाठकों को नम्र निवेदन करती हूँ कि हम हमारी पीढ़ी को जो भी देना चाहते हैं उसी में यह किताब को भी सम्मिलित कर लें। पढें..पढ़ाएं और अपनों को आशीर्वाद या शुभकामनाओं के साथ अवश्य भेट करें।

एक से बढ़कर एक ऐसी 200 कविताओं की यह अनमोल पुस्तक 'स्वर्णपात्र' साहित्यनिधि का अनमोल गहना है । वह ज्यादा से ज्यादा लोगों का मार्गदर्शन करें ऐसी शुभकामनाएं देती हूँ।






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News Digital India 18

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