सफर जिंदगी का, एक अनजान रिश्ते ने उसे जीना सिखा दिया




अपनों ने तो जैसे उसे तोड़ ही दिया था, लेकिन एक अनजान रिश्ते ने उसे जीना सिखा दिया !



मंजू शर्मा

नेहा चाय का कप हाथ में लेकर बालकोनी में आयी । नीचे आते-जाते लोगों को देख सोचने लगी कि-
आखिर क्या है जिंदगी का ये चक्कर..? और सोचते-सोचते कुछ ही पलों में वो अतीत के पन्नो में खो चुकी थी ।
"कैसी हो नेहा ?" एक फेसबुक मित्र राजेश ने पूछा था ।
"हाँ, अच्छी हूँ ,राजेश जी !
"नेहा ! तुम इतनी शांत और उदास क्यो रहती हो ?"
"क्या करें ? जिंदगी ने कभी हंसने का मौका ही नहीं दिया !"
नेहा ने हंस कर कहा ।
"ऐसा क्यूँ कहती हो ? जिंदगी में उतार-चढ़ाव तो आते ही
रहते हैं।"
"लेकिन मेरी जिंदगी की तरह नहीं। "
"अच्छा बताओ मुझे ... ऐसा क्या गुजरा ,जो तुम इतनी निराशाजनक बातें करती हो ?"
"रहनें दीजिए राजेश जी !आप भी परेशान हो जाओगे !"
"नहीं , आज तो मुझे सुनना ही है !"
"तो ठीक है , फिर सुनिए !"

"हम तीन बहनें हैं । लेकिन पापा को बेटे की बड़ी चाह थी।
लेकिन मम्मी से उन्हें बेटा नहीं मिल पाने पर वो हम सबको
माँ के भरोसे छोड़कर चले गए ,पता नहीं किस सफर के लिए !!"
"और कहने को तो संयुक्त परिवार था।लेकिन किसी का कोई सहारा नहीं...माँ ने मजदूरी कर हम तीनों को बड़ा किया...पढाया-लिखाया , वह सब कुछ किया,जो एक बाप करता । "
"मैं सबसे बडी थी ,घर में सभी लोगों को मेरी शादी की चिंता सताने लगी ! तो एक दिन माँ को....किसी ने एक रिश्ता सुझाया जो वास्तव में नाकाबिल था । मगर घर वालों ने उस रिश्ते को बिना देखे-भाले, बिना जाँच-पड़ताल किये , फटाफट मेरे हाथ पीले कर मुझ जैसे बोझ को विदा कर जैसे चैन की साँस ली ।"
".....और ससुराल जाकर धीरे-धीरे सब भीतरी बातों का पता चलने लगा। लड़के के अंदर एक से बढ़कर एक हजारों ऐब भरे पडे थे!"
".....तो जैसे-तैसे चुपचाप दो साल निकाल दिये। किसी भी चीज़ का एक पैसे का सुख नहीं और ना देह का सुख ही !! जिंदगी "बद से बदतर "नजर आने लगी तो एक दिन सोचा कि इसका अंत ही कर दूँ !"
" लेकिन तभी मेरे मायके वाले के किसी पड़ोसी को मेरी इस हालत का पता चला ,उसने मेरे घरवालों से बात की,यह सब जानकर माँ मुझे अपने घर ले आई। "
"कुछ दिन सब सही रहा, लेकिन फिर घर में भी परिवार वालों के ताने और गांव वालों की घुरती नजरें जैसे डसने लगी । तब
एक दिन फैसला किया घर छोड़ने का और निकल पड़ी
"सुकून की खोज में...इस बात से अनजान ,पता नहीं मिलेगा कहाँ?"
"घर से बहुत दूर एक परिचित के यहाँ पहुँची , उनसे कहा कि मुझे कोई काम चाहिये । लेकिन वहां से निराशा ही हाथ लगी।उन्होंने अपने दोस्त के यहाँ एक "होन्डा शो रूम" में काम करने को कहाँ
"कहते हैं मरती क्या न करती...मैंने वहां काम करने के लिए हामी भर दी। क्योकि अब तो माँ की भी हिम्मत टूट चुकी थी। छोटी बहनों की भी जिम्मेदारी मेरे सिर पर थी ।लेकिन वहां के मालिक बहुत अच्छे इंसान थे।जिंदगी में कुछ बदलाव महसूस होने लगा...
35 साल के जीवन ने बहुत कुछ सिखाया ..भईया !!"
..."और अब तुम्हारा क्या होगा ?"राजेश जी ने पूछा !
आगे क्या सोचा है नेहा ?
" पता नहीं ...इस निराशा भरी जिंदगी में आशा की कोई किरण नहीं। मुझे किसी पर विश्वास नहीं। " नेहा ! कुछ देर रूक कर बोली।
राजेश जी किसी अपने -सगे बड़े भाई की तरह उसे खूब उर्जा से भरने की कोशिश करने लगे... तरह-तरह के तर्क से उसे समझाने लगे। समय को कटते भला देर ही कहां लगती है, राजेश जी के प्रयास रंग लाए और नेहा ने फिर से नये सिरे से जिंदगी जीने की ललक पनपने लगी ।

"ट्रिंग ट्रिंग"
तभी फोन की घंटी से नेहा अतीत से बाहर आई।
फ़ोन माँ का था ..
"हेल्लो नेहा"
"हाँ माँ कहो..!! कल रमेश और उसके परिवार वाले आ रहे है , विधि (नेहा की छोटी बहन)को देखने तुम समय से घर आ जाना ।"
"हाँ माँ मैंने छुट्टी ले ली है शाम तक आ जाऊंगी !!"
समय एक अंतराल और लेता है।घर में माहौल कुछ इस तरह बदला नेहा वापस जा ही नहीं पाई।
फिर वही घुटन भरी जिंदगी से विरक्ति हो चली थी । राजेश जी के बहुत समझाने पर..उसने फिर से कुछ करने का सोचा...घर पर ही कुछ बच्चो को ट्यूशन कराने लगी । और एक स्कूल से आॅफर भी आया... अब नेहा एक स्कूल में टीचर हैं।
अपनी खुशहाल जिंदगी का श्रेय वो राजेश जी को देती है।अपनों ने तो जैसे उसे तोड़ ही दिया था ।
लेकिन एक अनजान रिश्ते ने उसे जीना सिखा दिया था !!




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