सच्चा समर्पण




पता ही नहीं चला कि कैसे वह जीवन के साथ जुड़ती चली गयी। हाँ.....वहीं साँवली सी दिखने वाली,बेहद शर्मीली पर उतनी ही आत्मविश्वास से पूर्ण। कई नामों से मैंने उसे पुकारा था और हर बार वह उसी शिद्दत से जवाब भी दिया करती थी। जीवन की कभी ना समाप्त होने वाली नरक यातना को सहते हुए भी उसकी सहज-सरल मुस्कान बड़ी आकर्षक थी।
    


राजेश रघुवंशी      

पहली बार जब वह मिली थी तो लगा था कि पता नहीं कोई इससे जुड़ा भी होगा की नहीं।....समाज के क़ायदे-नियमों से परे...।कम बोलने वाली वह,जब कुछ कहती तो लगता की बस बोलते ही रहे।आकर्षक वाणी की अधिकारिणी वह,जानकर भी अक्सर कम ही बोला करती थी।
         
कई बार उससे अपना हाले-दिल कहने की कोशिश भी कि...सुनो.......एक बात कहनी थी तुमसे........और वो अपनी बड़ी बादामी-सी आँखों से मुझे ताका करती।मासूमियत से भरा उसका चेहरा अनेको रूपवती स्त्रियों को मात दे जाता।मेरे मन में उभरे भाव मन के ही किसी कोने में दुबक जाते।भला इतना सौंदर्य अनदेखा करने का मन भी कहाँ साहस कर सकता था?उसके उस सौंदर्य को देखकर बरबस एक गीत की कुछ लाइनें याद आ जाती-
 "रूप तेरा ऐसा दर्पण में ना समाय।
 खुशबू तेरे तन की मधुबन में ना समाय।।"
             

पता ही नहीं चला कि कब उसकी हर ख्वाहिश मेरे जीवन के रंगीन स्वप्न बन गए।उन स्वप्नों को पूरा करने का जुनून हर पल मुझपर छाया रहता।एक दिन भी वह ना दिखाई दे तो मन बच्चों की तरह व्याकुल होकर उसे ढूंढ़ने की नाक़ाम कोशिश करता और जब वह दिख जाती तो मन की मुरादें पूरी हो जाती।....शिकायत करता उससे...पूछता कि कहाँ थी........मुस्कुराकर कह देती.......मेरे बिना क्या तुम्हारी दुनिया ही खत्म हो जाएगी?......कोई किसी के बिना नहीं मरता इस दुनिया में....उसकी वो बे-सिर पैर की बातें मुझे आज तक कभी समझ नहीं आयी।..चाहता था उसे अपने साथ जोड़े रखूं।भला आत्मा को भी कभी शरीर से जुदा किया जा सकता है क्या? अगर विलग भी हो जाए तो शरीर बेजान हो जाता है।शक्ति साथ है तो शिव भी शिव कहलाते हैं वरना शक्ति बिना शिव भी शव के समान हो जाते हैं।हाँ...सत्य है....वह मेरी शक्ति ही तो है।
   उसका व्यक्तित्व मुझमें पूरी तरह समाहित हो चुका था।पता ही नहीं चलता कि मैं अपने बारे में सोच रहा हूँ या उसके बारे में।#दो जिस्म और एक जान# को केवल फिल्मों में देखा-सुना था।.......अब इस एहसास को जीने लगा था...कैसे उसे अपने दिल का हाल बताता?क्या कहता उससे?किस तरह?मन बस इन्हीं उलझनों में भटकता रहता।पर कहते हैं ना कि जिससे हम बेहद प्यार करते हैं,वह ईश्वर का भी स्नेही बन जाता है।परिणामतः उस व्यक्ति के जीवन में दुख के साथ मृत्यु का भी आना स्वाभाविक हो जाता है।
   आज अचानक जब बातों-ही-बातों में यह पता चला कि उसके दिमाग के आधे से अधिक हिस्से ने काम करना बंद कर दिया है और वह कुछ दिनों की मेहमान है।मैं एकदम मौन हो गया।चाहता था कि वो कह दे......मजाक था...पर नहीं,यह सत्य था।इस सत्य को बताते हुए भी उसकी आँखों में कोई भाव ना था।ना किसी को चाहने का,ना खोने का।निर्विकार-सी वह कहकर चली गयी।यह जानते हुए कि मैं उसे बेहद चाहता हूँ,बिना किसी वादे के वो चली गयी।.....कभी ना लौट आने के लिए...।जाते-जाते उससे केवल इतना ही कह पाया....."इस जन्म में ना सही,अगले जन्म में ही सही पर तुम्हें मेरी बनना होगा.....।"सुनकर वह हँसी।......जिसने इस जन्म में असहनीय दुख झेले हो,वो अगले जन्म की कल्पंना से ही आतंकित हो जाता है,ठीक वहीं हालत उसकी थी।आज भी अनजाने या जानकर ही सही,उसे आवाज दे देता हूँ।...कहते भी है ना कि आत्मा अजर-अमर है।.....यकी है कि वो मेरे आस-पास ही है...शायद मेरे भीतर ही......।अब भी उसे अपने करीब महसूस करता हूँ।
   जब भी उसकी याद आती है,मन बस अकेले रहने की ज़िद करने लगता है।अब भी शांत हूँ....उसकी अनुभूति कर रहा हूँ.......ठीक इसी समय कही दूर से रेडियो पर हल्के  स्वर में गीत सुनाई दे रहा है-
         
        "कितना मदिर,कितना मधुर,तेरा मेरा प्यार।
          लेना होगा,जनम हमें,कई कई बार।"
  कहते भी है ना-
        "इश्क जब हद से गुजर जाता है,
        फिर वह इश्क,इश्क नहीं रहता,
        इबादत बन जाता है।"
उसकी यादें ही अब मेरी इबादत बन गयी है।...मन बार-बार कहता है.......लौट आओ....फिर एक बार....कभी ना लौट जाने के लिए... 




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