केजरीवाल के सामने फिर भाजपा ढेर, देश के दिल दिल्ली में मात के पीछे क्या है ख़ास वजह?



दिल्ली में आखिर 21 साल बाद भी भाजपा सत्ता में आने से क्यों वंचित रह गई? आखिर क्या वजह थी कि देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पांच राज्यों के मुख्यमंत्रियों के अलावा देश के 70 मंत्री और करीब ढाई सौ सांसद दिल्ली मे डोर टू डोर कैंपेन करने के बावजूद भी आखिर पार्टी कैंडिडेट की जमानत तक बचाने में असफल क्यों रहे?




आकाश नागर 

आज जब दिल्ली में तीसरी बार केजरीवाल मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं। तो ऐसे में हर किसी के जेहन में यह सवाल उभर रहे हैं कि आखिर किन गलतियों की वजह से भाजपा से दिल्ली दूर हो गई। कौन से वे कारण थे? भाजपा दिल्ली में सम्मानजनक स्थिति में नहीं आ पाई। आखिर क्या वजह थी कि मोदी का जादू दिल्ली में नहीं चल पाया। ऐसे कई सवाल है? जिनका जवाब जनता जानना चाहती है।


यहां यह कहना जरूरी है कि इस बार भाजपा ने शुरुआत में प्रचार में नकारात्मक राजनीति का रुख अपनाया। जब चुनावी प्रचार शुरू किया गया तो केंद्र के राज्यमंत्री अनुराग ठाकुर ने गोली मारने का विवादास्पद बयान देकर नेगेटिव माहौल बना दिया। इसके बाद आम आदमी पार्टी से भाजपा में गए एक उम्मीदवार कपिल मिश्रा ने यहां तक कह दिया कि यह चुनाव भारत-पाकिस्तान का चुनाव है।

यही नहीं बल्कि देश के गृहमंत्री जिन पर पूरे देश की कानून व्यवस्था के साथ-साथ सांप्रदायिकता को बनाए रखने का जिम्मा होता है। वह भी यह कहते नजर आए कि ऐसा बटन दबाओ की करंट साइन बाग पर लगे। ले-देकर भाजपा के बड़े से बड़े नेता के पास सिर्फ एक मुद्दा शाहीन बाग रह गया था।

जबकि दूसरी तरफ आम आदमी पार्टी के संयोजक और मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल सकारात्मक राजनीति का। दांव खेलते रहे। वह एक मंजे हुए खिलाड़ी की तरह भाजपा के सामने अपने पासे फेंकते रहे। हालत यह हो गई कि भाजपा जहां इस चुनाव को हिंदू बनाम मुस्लिम बनाने की जुगत में थी और शाहीन बाग का डर दिखाकर लोगों को हिंदुवाद की तरफ मोड़ने की रणनीति अपना रही थी, लेकिन जनता ने भाजपा की इस रणनीति को 8 फरवरी के दिन वोट देकर करारा जवाब दे दिया।

उल्लेखनीय है कि दिल्ली देश का आईना है। यहां देश के हर राज्य का व्यक्ति रहता है। ज्यादातर वह लोग रहते हैं जो रोजगार के लिए अपने घरों से पलायन कर यहां आकर अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत बनाने की ओर अग्रसर है। ऐसे में उन्हें हिंदू मुस्लिम का विवादास्पद बयान भाजपा अपनी तरफ नहीं मोड़ पाई। बल्कि यह जनता बिजली, पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य के मुद्दे पर अरविंद केजरीवाल की तरफ जाते हुए दिखी।


शुरू में जब इन मुद्दों को लेकर आम आदमी पार्टी जनता के बीच गई तो भाजपा के समर्थकों ने कहा कि वह नि:शुल्क मिलने वाली सुविधाओं का परित्याग करते हैं। लेकिन दूसरी तरफ एक वर्ग ऐसा भी था जो किसी तरह अपने परिवार का पालन पोषण कर रहा था। उस वर्ग को बिजली और पानी में छूट के साथ-साथ शिक्षा और स्वास्थ्य में आम आदमी पार्टी के आमूलचूल परिवर्तन अपनी ओर आकर्षित कर गए। यही वजह रही कि भाजपा के स्टार प्रचारक चुनाव में पूरी जान लगाने के बाद भी सफल नहीं हो पाए।

यहां तक कि गृहमंत्री अमित शाह डोर-टू-डोर पर्चे बांटते रहे। यही नहीं बल्कि देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दिल्ली में दो बार रैली कर गए लेकिन जनता का मन नहीं टटोल पाए। दूसरी तरफ दिल्ली के प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी चुनावी महाभारत में बहुत पिछड़े हुए नजर आए। मनोज तिवारी एक प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर फ्लॉप रहे। साथ ही वह एक साल पहले का प्रचंड बहुमत दिल्ली में लाने में नाकामयाब रहे।

गौरतलब है कि एक साल पहले यानी कि 2019 में दिल्ली में भाजपा ने लोकसभा चुनाव में सातों की सातों सीट जीतकर प्रचंड बहुमत पा लिया था। लेकिन विधानसभा चुनाव आते-आते वह दिल्ली अर्श से फर्श पर चली गई।




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