40 इंच के खिलौने से इतर दिल्ली की एक फिल्म यह भी



पिछले दो दिन से दिल्ली में हूँ। निजामुद्दीन से इंदिरापुरम फिर सादिक नगर, जनकपुरी, उत्तमनगर, शास्त्रीनगर, शाहदरा, कनाटप्लेस चांदनीचौक और मेरे जन्मस्थान कश्मीरी गेट वाली मीलों फैली राजधानी दिल्ली में। बहुत खूबसूरत दौड़ती भागती दिल्ली। स्टेशन पर फरीद खान और सुरेश चंद कुली साथ बैठ कर बीड़ी पी रहे हैं। घर पहुंचता हूँ तो दीवार पर टँगा 40 इंच का एक खिलौना कुछ और तरह की दिल्ली दिखा रहा है। अब किसे सच मानू। जो खुद देख रहा हूँ य जो खिलौना बता रहा है?
- चौ. मदन मोहन समर

आसिफ टेक्सी वाले से जयप्रकाश कह रहा है आसिफ भाई मुझे नोएडा जाना है यह सवारी द्वारका जाने वाली है तुम ले जाओ। मेट्रो में बैठे अर्पित और जुनैद विराट कोहली के परफार्मेंस पर चिंतित हो रहे हैं। उधर रेस्टोरेंट पर शबीना और ज्योत्स्ना एक प्लेट में पकौड़े खाते हुए खिलखिला रहीं हैं।

अरे यह क्या ! गाजीपुर गोलचक्कर पर बाइक फिसलने से गिरे सरदार गुरजीत सिंह को उठाने के लिए साबिर, असलम, प्रशांत, राजेश, सतवीर, अल्बर्ट, शीला, अनुष्का, ज़रीना, दौड़ कर इकट्ठे हो गए और यह जो ऑटो वाला आकर उसमें बैठी सवारियों से कह रहा है बाउजी आप दूसरा ऑटो ले लें मैं इस जख्मी बन्दे को अस्पताल ले जाता हूँ। इस ऑटो के पीछे वही स्टिकर लगा है जिस पर ॐ, अल्लाह, एक ओंकार, होलीक्रास,जय अरिहंत और बुद्धम शरणम गच्छामि लिखा होकर अंकित है 'सबका मालिक एक है'।
घर पहुंचता हूँ तो दीवार पर टँगा 40 इंच का एक खिलौना कुछ और तरह की दिल्ली दिखा रहा है। अब किसे सच मानू। जो खुद देख रहा हूँ य जो खिलौना बता रहा है?




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