आराम, जीवन का विरामचिन्ह


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बुजुर्गों  से हमने सुना है कि बोलने से पहले सोचिए और चलने से पहले रुकिए. ये रुकना और ये सोचना ऐसी अनमोल शिक्षा है जो हमारे बहुत काम की है..



भावना भट्ट
भावनगर, गुजरात

मानवजाति के विकास के बाद काफी समय के बाद भाषा की शरुआत हुई होगी. शुरुआती दौर में इशारे पर टिकी समझने- समझाने की बात, बाद में वाणी के रूप में आयी होगी, शब्दों से होकर लिपि का रूप लेते लेते कई युग लिए होंगे.


भाषा के साथ ही अटूट रिश्ता रहा है विरामचिन्हों का. अल्पविराम से लेकर पूर्णविराम की स्थिति तक पहुँचने की यात्रा में कहीं पर विस्मय भी मिला होगा तो कई बार प्रश्न भी..! और बीच रास्ते में कई कोई मोड़ पर मिल गया होगा अर्ध विराम भी.

अर्धविराम का जीवन से जुड़ाव
बुजुर्गों से हमने सुना है कि बोलने से पहले सोचिए और चलने से पहले रुकिए. ये रुकना और ये सोचना ऐसी अनमोल शिक्षा है जो हमारे बहुत काम की है और यही तो पर्याय है आराम का, विश्राम का ..अर्धविराम का !

बहुत ही जरूरी है अर्धविराम का जीवन में होना. जीवन तो बहुत ही गतिशील है पहाड़ों से निकली नदियों की तरह..!  मगर आपने देखा है कि नदिया भी कहीं कहीं पर विराम लेती है, रुक जाती है कोई तालाब में या फिर गहरी झील में खुद को सुलाकर थकान से मुक्त करके फिर से बहने लगती है अपने गंतव्य की ओर..! प्रकृति का हर तत्त्व गतिमान है मगर क्षणिक विराम लेकर चलना उनकी तासीर..!

सरलता और सरसता
यह प्रकृति को देखिए..! प्राकृतिक हरेक तत्त्व सरल है. हमें प्रकृति ने बहुत कुछ सिखाया है, जल की तरह बहना, सूरज की तरह ढलना, वृक्षों की तरह दुसरो के लिये जीना और फूलों की तरह खिलना, फूलों ने हमे ऋजुता सिखाई है तो आसमाँ ने विशालता, समंदर ने हमें गहनता सिखाई है और जमीन ने सहनशीलता..!

और इन्ही तत्वों ने ही हमें सिखाया है पलभर रुकना, अपनी गति को रोकना. हम जहाँ रुकते हैं वो हमारे अहम पड़ाव होते हैं.

हमारे गतिमान जीवन के रास्ते में आते गति अवरोधक ही हमें नियंत्रण और संतुलन की  शिक्षा देते हैं. यही विराम हम में ऊर्जा भरता है. ऊर्जा  के व्यय के लिये ऊर्जा का संचय भी तो जरूरी है. मानवीय स्वभाव में सरलता बहुत कठिन रास्तों से होकर आती है. ठीक वैसे ही सरसता बहुत ही कड़वे घूँट पचाकर आती है.

वैसे हमारा अस्तित्व यही प्रकृति का ही अंश है न..! प्रकृति खुद जब विराम को प्राधान्य देती है तो हम क्यूँ नहीं..! प्रकृति का दर्शन करने में हम देख सकते हैं कि अंकुर से फल तक की यात्रा में वृक्ष ने कितना धैर्य, और कितना संघर्ष पूर्ण जीवन जीना पड़ा है.? वृक्षोंने अपना जीवन एक ही जगह खड़े होकर जीया है. नदी को देखिए गंतव्य की प्राप्ति के लिए उसने क्या क्या नहीं सहा..?

और हम..? थोड़ी सी निराशा से डगमगाने लगते है क्योंकि ठहरने की आदत जो नहीं..!

जरा रुककर देखिए , दिनभर की भगदड़ तन और मन को थका ही देती है तब आकर रात कानों में कहती है यहाँ आओ मेरी गोद में तनिक विश्राम भी कर लो..! जैसे कोई माँ अपने लाडले के बालों को सहलाती हुई लोरी गाती है..और बेटे को गहरी नींद में जाते हुए देखकर मन ही मन मुस्काती है. ठीक वैसे ही यह रात भी हमें ठहराती है, सितारों की झिलमिल सी मुस्काती है..चाँदनी के साये में बहती हुई ठंडी हवाएं, जब बालों को सहलाती है तब हम सच में हम प्रकृति के इस स्पर्श में  माँ का स्पर्श महसूस करते है.

जीवन खेल निराला
जीवन पथ पर  देह नामक रथ, जिसे मन ही तो चलाता है...दिन भर रथ दौड़ता है और रात में विश्राम करता है. यही तो पुनरावृत्ति है हमारी..! इसी पुनरावृत्ति में अपने और पराये रथ रास्ते में मिलते रहते हैं. कुछ रथ साथ साथ ही रहते और विश्राम करते हैं और अटूट रिश्तों में बंध जाते हैं.

हर नयी सुबह...हम अपनी यात्रा संयुक्त रूप से निर्धारित करते हैं और शाम को इस यात्रा को पड़ाव देते है. प्रकृति में सब कुछ नियम से चलता है. सूरज का कितना आकर्षक नियम है...! ठीक बारह बजे सूरज हमारे सर पर होता है. दौड़ती बदलियाँ जब भी रुकती है सृष्टि को नवपल्लवित करती है. तनिक रुकती फिर चलती ये हवाएं ही देख लीजिए..! उनका निरंतर चलना आंधियों को जन्म देता है न..! मगर सब कुछ नियम से चले वही अच्छा.


जीवन पलों का कारवाँ      
दिन ..दिन के बाद साल. गुजरते पलों का कारवाँ ही तो जीवन बन जाता है..! और यह जीवन जब भी थकता है एक अर्धविराम चाहता है. वो चाहे पलभर का हो..रातभर का हो, सालभर का हो या फिर एक जीवन से दूसरे जीवन तक जाने के मार्ग में पड़ाव भी हो..मगर गतिशीलता के लिए भी बहुत जरूरी है न..!

विराम...मन और हम...  
विराम हमारें मन को, हमारे जीवन को नई दिशा देता है..जीवनभर चलते कदम के साथ यह मन भी विचारों की शृंखला में अनगिनत सपने बुनता रहता है कभी खुशीसे झूमता है तो कभी बेबसी में गुम होकर सूनापन ओढ़े घूमता है. कभी बैठ जाता है कोई अंधियारे कोने में तो कभी भागता रहता है अश्वों की तरह..! और यही मन जब विश्राम में जाता है. आराम में जाता है तब बहुतकुछ पाता है. अपनी गहराई में खुलने लगता है. विराट से जुड़ने लगता है और वहीं से शक्ति पाकर फिर अपने गंतव्य की ओर दुगनी गति से दौड़ने लगता है मगर इस बार की दौड़ में सम्मिलित होती है स्पष्टता जो उसे सफलता की ओर अग्रेसर करती है.

आपने कभी अपनी सांसों को सुना है? देखा है उसकी गति को..?
अनवरत चलती यह साँसे भी तनिक रुकती है, फिर चलती है, दो सांसों के बीच का यह विराम ही अनंत का द्वार है. शांति का उपहार है. शक्ति का भंडार है. तो फिर देर किस बात की..?

चलिए..रुकिए और चलिए..!
बोलिए..मगर बोलने से पहले सोचिए..
पल पल अपनी साँसों को देखिए, यह जीवन को देखिए, प्रकृति को देखिए..बहती हुई इन पलों को देखिए,जीवन का एक नया आयाम खुलेगा निश्चित..!
शुभकामनाएं..





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1 comments:

  1. धन्यवाद आदरणीय संपादक जी

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