भूख़़ से बेबस बच्ची की झकझोरती कहानी और भीख माँगते, अखबार बेंचते मासूम 'ले लो साहब 2 ही रूपये का है, भूंख लगी है रोटी खाउंगा'




भूख़़ से बेबस बच्ची इस बात से अनजान थी कि मंदिर में सीसीटीवी लगा हुआ है. आखिर उसने चुगली कर दी और बच्ची को पकड़ लिया गया. 

सरकार, मंत्रीजी क्या करें, उनकी गाड़ियों का काफिला जब सड़क से गुजरता है तो सबको दूर ही रोक दिया जाता है, लेकिन उनके कार्यकर्त्ता किस काम के लिए हैं? आखिर क्यों जमीनी हकीकत साहेब तक नहीं पहुँचती? ऐसा ही रहा तो क्या कभी भीख माँगते मासूमों की तरफ सरकार की निगाह जायेगी? इतना ही नहीं इनकी आबाज उठाने वाला मीडिया भी इनसे बाल श्रम करवा रहा है. कम उम्र बच्चे 'ले लो साहब 2 ही रूपये का है, भूंख लगी है रोटी खाउंगा' कहते हुए पेपर आगे बढ़ाते रोज ही हर चौराहे पर मिल जाते हैं, लेकिन किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता. यही कल कोई पेट के लिए इस तरह का रोटी चुराने का अपराध कर दें तो...
पंकज चतुर्वेदी / बलभद्र मिश्रा     

सागर ज़िले के रहली गांव की बच्ची ने मंदिर की दान पेटी से 250 रुपए चुरा लिए थे. चोरी की वजह पापी पेट था. बच्ची के छोटे भाई-बहन भूख़े थे और घर में आटा ना था. पिता ने उसे दो किलो गेहूं पिसवाने के लिए दिए थे, लेकिन उसके गेहूं किसी ने चक्की से चुरा लिए. पिता ने बहुत मुश्किल से जैसे-तैसे दो किलो गेहूं का इंतज़ाम किया था. वो डर गयी कि अब पिता को क्या बताएगी. बस उन्हीं हालात में उसके मन में चोरी की बात आ गयी. वो मंदिर गयी. दान पेटी की कुंडी बहुत आसानी से खुल गई और उसने उसमें से 250 रूपए निकाल लिए.


भूख़़ से बेबस बच्ची इस बात से अनजान थी कि मंदिर में सीसीटीवी लगा हुआ है. जो उसकी हरक़त को क़ैद कर रहा है. चोरी पकड़ में आते ही बच्ची को भी पकड़ लिया गया. और उसे बाल सुधार गृह शहडोल भेज दिया गया.

12 वर्षीय बच्ची के सिर से तीन साल पहले मां का साया उठ गया था. उसके पिता मज़दूरी करते हैं. मजदूरी के उसी थोड़े-बहुत पैसे से वो अपना और अपने तीन बच्चों का पेट पालते हैं. ये बच्ची छोटे भाई-बहनों के लिए घर में मां की भूमिका निभाती है और फिर बाहर निकलकर रोटी-पानी का इंतज़ाम करती है. इन सब ज़िम्मेदारियों के बीच वो पढ़ने स्कूल भी जाती है.

पकड़े जाने के बाद बच्ची ने बताया कि उसने छोटे भाई-बहन के खाने के लिए पैसे चुराए थे. पिता ने उसे दो किलो गेहूं पिसवाने के लिए दिए थे. लेकिन उसके गेहूं किसी ने चक्की से चुरा लिए. पिता ने बहुत मुश्किल से जैसे-तैसे दो किलो गेहूं का इंतज़ाम किया था. वो डर गयी कि अब पिता को क्या बताएगी. बस उन्हीं हालात में उसके मन में चोरी की बात आ गयी.वो मंदिर गयी. दान पेटी की कुंडी बहुत आसानी से खुल गई और उसने उसमें से 250 रूपए निकाल लिए. पुलिस जब उसे पकड़ने घर गयी तो उसने पिता को बताया कि 180 रुपए का आटा ख़रीदने के बाद बाकी बचे 70 रुपए उसने स्कूल बैग में रख दिए हैं.

जिसके घर आटा न हो वह बाप क्या सागर जा पाता और वकील कर पाता? मैना को उसके घर से 375 किलोमीटर दूर शहडोल की बच्चा जेल भेज दिया गया. वो तो भला हो सागर की सहृदय कलेक्टर श्रीमती मैथिली नायक का, जिन्होंने बच्ची को शहडोल बाल जेल से वापिस लाने व परिवार को तत्काल मदद की व्यवस्था कर दी. और यह सोशल मीडिया की ताकत है कि मध्यप्रदेश के सहृदय मुख्यमंत्री कमलनाथ जी ने मामले को संज्ञान में लिया और आदेश भी दिए.


लेकिन जो सवाल उठ रहे हैं, उनका समाधान जरुरी है. दुर्भाग्य कि न तो वह चक्की वाला पकड़ा गया, जिसने उसका पिसिया गायब किया, न ही वे सरकारी कर्मचारी जो महिला बाल विकास के फ़र्ज़ी आंकड़े भरते हैं. वैसे समाज को उस मंदिर का भी बहिष्कार करना चाहिए, जिसने मामले को ठीक से देखा तक नहीं. 

सवाल यह भी हैं कि क्या यह पहला और आख़िरी मामला है. क्या देश में ऐसे लाखों बच्चे इन्हीं हालात में नहीं हैं. मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल की बात ही करें तो यहाँ हर चौराहे पर 7 से 10-12 साल के बच्चे बच्ची भीख माँगते मिल जायेंगे. भीख नहीं मिलेगी तो चोरी भी करेंगे. आखिर पापी पेट का सवाल है. इन तरफ किसी की निगाह नहीं जाती. वो तो यदा कदा कोई मामला सोशल मीडिया पर तूल पकड़ जाता है तो कुछ सुनवाई हो जाती है. 

सरकार, मंत्रीजी क्या करें, उनकी गाड़ियों का काफिला जब सड़क से गुजरता है तो सबको दूर ही रोक दिया जाता है, लेकिन उनके कार्यकर्त्ता किस काम के लिए हैं? आखिर क्यों जमीनी हकीकत साहेब तक नहीं पहुँचती? ऐसा ही रहा तो क्या कभी भीख माँगते मासूमों की तरफ सरकार की निगाह जायेगी? 





Share on Google Plus

News Digital India 18

पाठकों के सुझाव सदा हमारे लिए महत्वपूर्ण है ..

0 comments:

Post a Comment

abc abc