दीपावली के दीप जलाने के साथ और क्या करें ऐसा कि लोग कह उठें वाह


प्रशंसा , एक सहज साध्य कला    


अभी नवरात्र चल रहे हैं. तेजी से गुजरते जमाने में  यह दिन बस यूं गए. दो दिन बाद दशहरा और बहुत तेजी से पास आ रही है दीवाली. हर कोई दीवाली कुछ नए ढंग से मनाना चाहता है. ऐसे में एक बेहद खूबसूरत टिप्स ख़ास आपके लिए. 




भावना भट्ट
भावनगर, गुजरात

रोये हुए बच्चे को हँसाने की कला, सोये हुए मनुष्य को जगाने की कला है प्रशंसा. इस कला में आँख़ों के आँसुओं से प्रारम्भ होकर होठों की मुस्कान तक आना होता है. मानव की बुझी हुई शक्ति को कार्यान्वित करने के लिए उनके हृदय को छूना होता है. प्रशंसा वह शब्दपथ है जो दिलों से दिलों को जोड़ता है.


प्रशंसा जीवन का शृंगार 
हमने देखा है जीवन में, समाज में चहुँओर खालीपन है बुझे बुझे से चेहरे हैं. जीवन का रस ही जैसे खो गया है. सब कुछ होते हुए भी वह आनंद- जो हमारा स्वभाव है वह कहीं पर नहीं है. हमने देखा है न. बच्चों को खिलखिलाते हुए, क्योंकि वह बहुत सहज और सरल होते हैं और सच कहूँ तो बाल्यावस्था में हँसने का प्रयास नहीं करना पड़ता था. हँसी तो सहज थी. आप भी अपनी बाल्यावस्था को याद करके देखिए. बच्चे जो सब से अधिक प्रशंसा पाते हैं वही आगे जाकर अच्छे इंसान बन पाते हैं.

सुना है कि हिटलर का बचपन गुलामी में बिता था. बचपन में उसने केवल अपने मालिक की अवहेलना ही देखी थी. नतीजतन समाज ने भी तो क्रूरता की पराकाष्ठा देखी न. !

प्रशंसा से ही तो जीवन का उघाड़ होता है. यह प्रशंसा ही तो है जो, जीवन को फूलों की तरह खिलाती है, महकाती है.

प्रशंसा, किसकी? कब? और कैसे?
प्रशंसा न केवल अपनों की बल्कि अनजान लोगों की भी करनी चाहिए. हमें जब भी लगे कि किसी ने भले ही छोटा मगर अच्छा काम किया है तो उस पर उसी पल प्रशंशा के फूल बरसा देना चाहिए. वह छोटा सा कार्य कल बहुत बड़ा होकर किसी की प्रेरणा जरूर बनेगा.

मगर याद रहें, प्रशंसा करने की शब्दावली विश्वसनीय होनी चाहिये. इसलिये प्रशंसा अगर हार्दिक होगी तो ही वास्तविकता के बहुत समीप होगी और वही प्रभावशाली भी होगी. प्रशंसा की शब्दावली में लेकिन, किंतु, अगर, मगर जैसी प्रवृत्ति के शब्द वर्जित हैं. क्योंकि ये शब्द एक शर्त के साथ जुड़े हुये होते हैं. प्रशंसा करते वक्त ये खयाल हमेशा ही रहे की प्रशंसा स्वाभाविक, सहज और सरल हो.


प्रशंसा कल्याण की कुंजी है
हमने अक्सर देखा है हमारी पूजा और हमारे धार्मिक क्रियाकलापों में हम हमारें देवताओं की प्रशंसा ही तो करते है न. किसी भी देवी, देवता की आरती या चालीसा हम गाते हैं वह प्रशंसा से ही तो भरे हुए होते है. ये देवी-देवताओं को खुशी देती होगी की नहीं वो तो पता नहीं. मगर हमें तो खुशी अवश्य देती है. उनके वह गुण जिनकी हम प्रशंसा करते है उसे आत्मसात करने का हमारा प्रयास भी तो हम में बना रहता है. हम चाहते है की वह दैवी गुण हम में भी आयें. आप को सुनकर अच्छा लगेगा की जो भी हम शब्दों के माध्यम से बहाते है वह लौटकर हमारे पास जरूर आता है.

यह पूरा ब्रह्मांड  तरंगों से ही तो बना है. हमारे शब्द भी महज एक तरंग ही तो है. अगर वह किसी को खुशी देता है तो वह अवश्य लौटकर हमें खुशी देगा ही.

प्रशंसा का प्रभाव    
प्रशंसनीय स्वभाव हमें सकारात्मक दृष्टिकोण प्रदान करता है. वैसे भी हम जिस वक्त सकारात्मक होंगे उसी वक्त हमें सामने वालों में अच्छाइयां भी दिखेगी. हाँ शुरू में यह प्रयास जरूर करना पड़ता है, बाद में वह आदत ही बन जाता है. प्रशंसा से हमारें सभी संबंध में एक मीठापन आ जाता है जो हमारे जीवन को भी मधुर बनाता है. प्रशंसा से सामने वालों के चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कान आती है और वह तुरंत ही हमारे चेहरे को भी कस लेती है वैसे भी मुस्कुराहट बहुत चेपी होती है तो तुरंत फैलने लगती है !

प्रशंसा आत्मविश्वास को जन्म देती है और व्यक्ति को स्वविकास और समाज को विकास की और ले जाती है. इस संदर्भ में देखे तो प्रशंसा परिवर्तन की जननी है. प्रशंसा सृजन की भी जननी है. संसार में देखिए . हर सृजन प्रयत्न से संभव हुआ है और हर प्रयत्न प्रशंसा की नींव पर खड़ा मिलेगा. प्रेम हो ,गीत हो, श्रृंगार हो या सृजन सभी में प्रशंसा की अहम भूमिका होती है.

प्रशंसा और सावधानी
जी हाँ प्रशंसा में भी कुछ बातों का ध्यान अवश्य रखना चाहिए. इन में सब में अहम बात है स्वप्रशंसा. हमें खुद की प्रशंसा से जरूर बचना चाहिये, क्योंकि वह हमारे विकास के द्वारों को बंद कर देती है. हमें स्व-केन्द्रित बनाकर समाज से अलगथलग कर देती है और कभी ऐसा भी वक्त आता है कि हम हमारे साथ केवल अकेले ही खड़े मिलते हैं. बाकी सब हमें छोड़कर जा चुके होते हैं.  


ठीक वैसे ही हमें उस वक्त भी सावधान हो जाना चाहिए, जब हमारी प्रशंसा हो रही हो. उस वक्त केवल द्रष्टभाव से प्राप्त की हुई प्रशंसा का विश्लेषण अवश्य करना चाहिये, तब ही हम उसे देख पाएंगे की यह प्रशंसा है या खुशामद?

हाँ जैसे ओरों की खुशामद से हमें सावध रहना है ठीक वैसे ही हमें भी किसी की खुशामद करने से भी बचना चाहिए क्योंकि खुशामद के पीछे कोई न कोई स्वार्थ जरूर होता है! और जहाँ पर स्वार्थ होगा, वहाँ पर स्नेह नहीं होगा और जहाँ स्नेह नहीं है वहाँ आनंद तो आयेगा ही नहीं.

तो, फिर क्या? आनन्द में रहना है? हमारे अपनों को आनंद में रखना है?
तो फिर देर किस बात की? आज से ही शुरू हो जाइए. जहाँ भी जाओ अपने साथ कुछ प्रशंसा के फूलों को जरूर ले जाओ. और जब भी मौका मिले उसे कंजूसी किये बिना बरसाओ. खुश रहिए, खुश रखिए.

दीपावली के दीप जलाऐं, प्रशंसा के फूल बरसाऐं. 

और एक छोटी सी टिप्स 
इस दिवाली अपने पड़ोसी के द्वार पर भी रंगोली सजा दीजिये फिर देखिये.. कैसे आपके अपने पड़ोसियों से सम्बन्ध और मधुर हो जायेंगे. 




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1 comments:

  1. बहुत बहुत धन्यवाद
    डिजिटल इंडिया टीम..

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