सच कड़वा होता है हुजूर, अगर अखबार हर रोज पूरा सच छापने लगें तो क्या होगा?



सच कड़वा होता है हुजूर। एक जरा सी लाइन जो गलती से ही सही सच्चाई क्या बयां कर गई, सबको नागवार है। सोचो, अगर अखबार हर रोज पूरा सच छापने लगें तो क्या होगा? क्या यह समाज सच पचाने की क्षमता रखता है? 


विजयादशमी के अवसर पर प्रकाशित 8 अक्टूबर के दैनिक भास्कर ने फ्रंट पेज पर शीर्षक के ठीक नीचे लिखा 'सत्य पर असत्य की विजय के महापर्व की शुभकामनाएं' ऊपर लिखा था 'आप पढ़ रहे हैं देश का सबसे
श्री यतीन्द्र लवानिया जी 
विश्वसनीय और न. 1 अखबार' जी सही पढ़ा आपने 'सत्य पर असत्य की विजय' मुद्दा तो बनना था, बना और सोशल मीडिया पर जम कर लिखा जा रहा है. हर कोई इसकी आलोचना कर रहा है। इसी मुद्दे पर 
श्री यतीन्द्र लवानिया जी  की यह पोस्ट,  जो सवाल खडा कर रही है क्या यह समाज सच पचाने की क्षमता रखता है? 

श्री यतीन्द्र लवानिया जी ने लिखा है सबको आलोचना का हक है। हो सकता है इसके लिए किसी सब एडिटर या सीनियर सब एडिटर को बलि का बकरा भी बना दिया गया होगा। लेकिन बात परसेप्शन की है। मेरा मानना तो यही है कि इस तस्वीर में जो छोटी सी चूक हुई है, उसे हर कोई रेखांकित कर अपने तरीके से उसका लुत्फ ले रहा है। जहां तक पत्रकारिता से जुड़े लोग हैं वे सभी अपने जीवन कुछ न कुछ ऐसा कर चुके हैं, लेकिन फिर भी दूसरों की ट्रेजडी में ही तो कॉमेडी का झरना फूटता है।

बहरहाल, मैं आपसे जानना चाहता हूं कि अपने दिल पर हाथ रखें और खुद से पूछें इस दुनिया में क्या हो रहा है? जो हो रहा है क्या वह "सत्य पर असत्य की जीत" नहीं? आपको अपने आसपास ही कितने ही ऐसे मामले दिखेंगे, जहां सत्य पर असत्य की विजय हो रही है।


लेकिन सच कड़वा होता है हुजूर। एक जरा सी लाइन जो गलती से ही सही सच्चाई क्या बयां कर गई, सबको नागवार है। सोचो, अगर अखबार हर रोज पूरा सच छापने लगें तो क्या होगा? क्या यह समाज सच पचाने की क्षमता रखता है? जब हम एक लाइन का सच बर्दाश्त नहीं कर पा रहे तो क्या पूरा सच्चाई से भरा हुआ अखबार इस देश के सामूहिक पाचनतंत्र के लिए विनाशक साबित नहीं होगा!

हमें अपने गिरेबां में झांकने की जरूरत है और खुद से पूछने की जरूरत है कि एक समाज के तौर पर सच पचा पाने की हमारी सामूहिक क्षमता कितनी है? यकीन मानिए इस देश को सच हजम नहीं होता, इसलिए बेखयाली में भी खयाल ही आते हैं। खैर जाने दीजिये सच छापने की कीमत एक सब एडिटर की नौकरी होती है जो शायद चुका दी गई।

हालांकि कुछ लोग इसे फोटोशॉप भी बता रहे हैं, श्री ललित शौर्य  जी लिखते हैं ये फ़ोटो शॉप है. मैने छतरपुर का ऑनलाइन एडिशन देखा उसमें ठीक था.

वहीं श्री जय कुमार कुमावत जी लिखते हैं ये फोटोशॉप है. हार्डकॉपी में सही है और ये मास्टहेड है, जो सभी जगह एक जैसा होता है, सिर्फ शहर का नाम बदल दिया जाता है. जयपुर और छतरपुर का एक जैसा होगा. 

वास्तविकता बताते हुए श्री यतीन्द्र लवानिया जी ने लिखा है यह फोटोशॉप नहीं है, हालांकि ई-पेपर में इसे सुधार लिया गया. एमपी में कई लोगों के यहां पहुंचा है और अलग-अलग फोटो मिल रहे हैं.





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