यह पढ़िए और फिर कहिये, क्या वाकई आप स्वस्थ हैं?


स्वस्थ जीवन, मस्त जीवन


सोचिए मित्रों क्या हम वाकई स्वस्थ हैं या  फिरस्वस्थ होने के जूठे ढकोसले में खुद को कैद करके खुद को और समाज को हानि तो नहीं पहुँचा रहे हैं?



भावना भट्ट
भावनगर, गुजरात

क्या आप स्वस्थ हैं? आपका जवाब हाँ या ना हो सकता है, लेकिन खुद को तनिक टटोलें, यही प्रश्न को बार बार दोहराएं तो कदाचित यह उत्तर ना में ही परिणमित हो जाएगा.


ज्यादातर हम शरीर में कोई बीमारी न होने की अवस्था को स्वास्थ्य कहते हैं. कुछ अंश तक यह उचित भी है. मगर ज्यादातर लोगों को यह स्वास्थ्य की पूंजी से  कोसो दूर रहना पड़ रहा है. 

ऐसा क्यूँ है? 
आप को पता है हमारा सच्चा जीवनसाथी कौन है? बेशक हमारा यह शरीर. सोच में पड़ गये न. जब से हमने पहली सांस ली है तब से वो हमारे साथ है, है.. न..? हर तकलीफ में, हर खुशी में, खाने के टेबल पर, सोने के बिस्तर पर. जहाँ हम चले वहाँ वो चला. मगर विडम्बना भी यही है कि जो हमारे सबसे करीब हो उनकी ओर हमारा ध्यान ही नहीं जाता.

ठीक वैसा ही किया हमने हमारे शरीर के साथ भी. उसे चलता फिरता डस्टबिन समझ कर जो मिला वो सब कूड़ा उसी में डाल दिया. वो चाहे मुँह से गया हो या आँख से या फिर कान से भी.

इनसे क्या हुआ? हमारा मन और तन दोनों के बीच कोई सामंजस्य नहीं रहा. जीवन का तालमेल बिखर गया. कोई आकर कुछ कह गया. हम व्यथित हुए. किसी ने हमारी ओर देखा नहीं तो हम नाराज हुए. कभी चौराहे पर गये तो वहाँ से, तो कभी खुद के पैसे खर्च करके, हम सिनेमाहॉल जाकर कई सारा कूड़ा लेकर वापिस चले आये. यह डस्टबिन तो दिन-ब-दिन भरता ही रहा, उसे खाली करने की कला तो  हमें आती नहीं. तो फिर वो तनाव में परिवर्तित हो गई और उस तनाव का बोझ पड़ा शरीर पर तो शरीर थकहार के बीमारियों की चपेट में आ गया. यह पूरा विषचक्र चलता ही तो रहा है जीवनभर.


वास्तव में स्वास्थ्य का सही संबंध तन से अतिरिक्त मन से है
हम पढ़े लिखे तो  हैं लेकिन न पढ़ना सीखे, न लिखना सीखे. हम कहने सुनने में सक्षम हैं लेकिन समय पर न हमें बोलना आया और न सही सुनना आया. हम स्वस्थ हैं लेकिन स्वस्थ सोच, विचार हमारे पास नहीं. 

हमारे स्वार्थ ने हमको स्वस्थ नहीं रखा. हमने हमारे शरीर को हमने बड़ी बड़ी सुविधाओं के गुलाम बना दिया. हमने हमारे शरीर को इतना आरामप्रिय बना दिया कि ज़रा से भीग गये. ज़ुक़ाम हो गया. ज़रा सी सर्दी पड़ी बुखार हो गया. ज़रा सा प्रतिकूल वातावरण हुआ. तो हम हिल गये. आखिर क्या हैं हम?

मोम के बने है क्या? क्यूँ हम खुद को कठिनाइयों से बचाते रहते हैं?
हमारे पुरखों को देखें स्वस्थ और निरामय जीवन के प्रतिमान रहै वो.. लेकिन वो जब हमें अपने अनुभवों से कुछ कहना चाहते हैं, तब हम उनको सुनते है क्या? 

इसे ही तो कहते हैं दो पीढ़ियों के बीच की खाई. परिवार बिखर गये हैं और हर घर में यही हाल है. संवादहीन होकर संवेदनाहीन हो चुके हैं हम. साथ होकर भी एक दूसरे से अलग-थलग. 

किसी से भी कुछ कहने का धरम नहीं रह गया है. कहोगे तो मानेगा नहीं. मानेगा तो बतायेगा नहीं. स्वस्थ संवाद ही नहीं है. कैसे कह सकते हैं कि हम स्वस्थ हैं.

न सम्बंध स्वस्थ रहें हैं न संतुलित आहार की परिभाषा हम जानते हैं न गतिमान जीवन है. इंसान दौड़ा जा रहा है केवल अर्थ के पीछे. वो खूब कमाना चाहता है, ताकि लखलुट संपति का प्रदर्शन कर सके. अपने आसपास भीड़ इकट्ठा कर सके जो उसकी वाहवाही करें. सच में हम भीड़ प्रिय हो गये हैं. क्या वो स्वस्थता की पहचान है?
यही सवाल मैं फिर से दोहराती हूँ कि क्या हम स्वस्थ हैं?

क्या हम संतुष्टि के घर में रह रहे हैं? यदि हाँ तो ही हम प्रसन्नचित्त रह सकते हैं और जब हम प्रसन्न हैं तो भय, क्रोध, राग, द्वेष, जैसे आवेगों से दूरी निश्चित करके स्वास्थ्य की ओर बढ़ चुके हैं.

क्या हम आत्मविश्वासी हैं? आत्मविश्वास और अहंकार के भेद को जानकर आगे बढ़ रहे हैं? हमारी क्षमता को जानकर उसी के आधार पर कार्य करते हुए दूसरों से भी सीखने को लालायित रहते हैं तो शायद हम स्वास्थ्य की ओर बढ़े हुए हैं.

क्या हम किसी की बातों से आहत होते हैं? या फिर हमारी बातों से किसी को चोट पहुँचाकर आनंद लेते हैं और खुद के अहंकार को सिंचित करते हैं तो यह आप के स्वस्थ न होने की चेतावनी समझकर इन से मुक्त होने के उपाय ढूंढिए. 

यदि रोज सुबह से शाम तक जीवन में आने वाली समस्याओं का धैर्य के साथ सामना कर पाते हैं तो हम निःसंदेह स्वस्थ हैं.

क्या वास्तव में हम निडर हैं? 
चाहे सामने कोई भी परिस्थिति हो, उसे स्वीकार कर सकते हैं. विपरीत परिस्थितियों पर हम उसका मुकाबला डंटकर कर सकते हैं? या फिर उसे स्वीकार करके उस के साथ तालमेल बिठाकर मुस्कुरा सकते हैं? तो ही हम स्वस्थ हैं. 

हम हरेक नयी बात को सुन सकते हैं? उस पर विचार करके खुद को संशोधित कर सकते हैं? हमारी घिसी-पिटी विचारधारा से मुक्त होकर कुछ नयेपन को प्रविष्ट होने की अनुमति दे सकते हैं? तभी हम स्वस्थ हैं.

सोचिए मित्रों क्या हम वाकई स्वस्थ हैं या स्वस्थ होने के जूठे ढकोसले में खुद को कैद करके खुद को और समाज को हानि तो नहीं पहुँचा रहे हैं?

अभी भी समय है. आइए अपने ढकोसले को त्याग कर मुक्त हवा में कुछ साँसे लीजिए. जीवन को नयेपन के साथ गतिमान कीजिए.
सम्पूर्ण स्वास्थ्य की ओर आगे बढिये और एक बहुत गर्व से कहिए की हाँ मैं स्वस्थ हूँ.

हमारी शुभकामनाएं आप के साथ हैं.




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