अश्वमेघ के घोड़े





- सुरेन्द्र रघुवंशी 



"कर्ज़ में डूबे किसान ने फाँसी लगाकर जान दी"
यह मात्र एक छोटी सी खबर थी
धनतेरस के सिक्कों की खनक
और दीपावली के पटाखों के शोर में
इसे किसी ने भी नहीं सुना


धन्नासेठों के विज्ञापनों से भरे
और शुभकामनाओं की तंद्रा में खिलखिलाते हुए अख़बार ने
दबी जुबान से 25 अक्तूबर को
एक छोटे से कोने में बताया
कि मध्यप्रदेश के रीवा जिले के सेमरिया थाना क्षेत्र के
पटना गाँव के निवासी किसान वंशपति साहू ने
गुरुवार सुबह फाँसी लगाकर जान दे दी

इस किसान ने मध्यांचल बैंक से
सवा दो लाख रुपए का लोन लिया था
इसकी अदायगी के लिए बैंक का नोटिस मिलने से
वह बेहद परेशान था

इस मामले में स्थानीय प्रशासन
अनभिज्ञता ज़ाहिर कर रहा है

किसान वंशपति साहू की क़ौम का एक कवि
इस अख़बारी ख़बर को
आलोचकों के मत और काव्य के सिद्धांतों को
दरकिनार करते हुए
सीधे कविता में रूपांतरित करने का जोख़िम उठा रहा है
सावधान ! इसे किसानों की क़ौम के ख़त्म होने की
ख़तरे की घंटी की तरह सुना जाए

कवि के मन में उठता है यह प्रश्न भी
कि सरकारों पर उठाया यदि प्रश्न
तो देशद्रोही ठहरा दिया जाएगा
जबकि भीड़ देश भर में उत्सवधर्मिता के
नकली झंडे उठाये हुए
पिला दी गई भावनाओं की घुट्टी के नशे में झूम रही है
राजदरबार जयकारों की गूँज से गुंजायमान है

यहां पूजे जा रहे हैं      
विभाजन के सारे उपकरण
षड्यंत्र के सारे मंत्र
चालाकियों के सारे औजार
विश्वासघात के ऊँचे पहाड़
और अवसरवादिता के अश्वमेघ के ताक़तवर घोड़े
जिनके गले में बंधी हैं राजाज्ञाएँ
और जो चले जा रहे हैं जन को रौंदते हुए
निर्विघ्न सभी दिशाओं में      





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News Digital India 18

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