उत्सव, जीवन के रंग


प्रकृति में कहीं पर स्थगितता नहीं हैं. हवाएं बह रही हैं, नदिया दौड़ रही हैं, समंदर गा रहा है, ऋतुएं बदल रही हैं. समग्र जीवसृष्टि पलपल नूतन है, वह सदैव अपने बदलते रंगों से समूची प्रकृति को निखारती है. और उत्सव क्या है? यही प्रकृति की उपासना ही तो है. 



भावना भट्ट
भावनगर, गुजरात

ल्लास जीवन जीने का लक्ष्य है. कभी कभी एक ही तरह की दिनचर्या के चलते हुए जीवन में एक बोरियत प्रविष्ट हो जाती है. और वही बोरियत कभी चिड़चिड़ापन तो कभी मायूसी की जनक बन जाती है. ठीक है जीवन तो मगर फिर भी चलता है. मगर उस में जब गति नहीं होती और न होता है कोई बहाव, तब सब कुछ स्थिर और स्थगित हो जाता है. जैसे कि किसी बंध कुँए में रहा जल. जो सीवरों को जन्म देकर अपना निजत्व खो देता है ठीक उसी तरह मानव मन.  

प्रकृति की उपासना हैं उत्सव
आप ने महसूस किया है न. प्रकृति में कहीं पर स्थगितता नहीं हैं. हवाएं बह रही हैं, नदिया दौड़ रही हैं, समंदर गा रहा है, ऋतुएं बदल रही हैं. समग्र जीवसृष्टि पलपल नूतन है, वह सदैव अपने बदलते रंगों से समूची प्रकृति को निखारती है. और उत्सव क्या है? यही प्रकृति की उपासना ही तो है. त्यौहारों में कोई न कोई देवता को माध्यम बनाकर जो पूजा होती है, वह वास्तव में प्रकृति और प्रकृति के कण कण में बसे प्राणतत्त्व की ही तो होती है.

षोडशोपचार पूजा में जो भी सामग्री उपयुक्त होती है, वह कहीं न कहीं प्रकृति के तत्त्वों को ही अनुमोदित करती है. जल नदिया को, दीप सूर्य और चंद्र को, धूप और सुंगंधित पदार्थों वायु को, अक्षत, चंदन, पृथ्वी को तो फूल-पत्ते समग्र सृष्टि को निर्देशित करता है. हमारे देवी देवता प्रधान उत्सव हमें समृध्दि और सम्पन्नता के साथ साथ सम्बन्धों को प्रगाढ़ करने में सक्षम होते हैं.

गहन संदेशात्मक उत्सव- मानव जीवन के लिए कल्याणकारी
श्रीकृष्ण का रास गहन संदेशात्मक उत्सव है. जो परम् प्रेम से की गई पुर्णत्व की यात्रा है.  रासोत्सव शरीर के माध्यम से अशरीरी परम आनंद स्वरूप कृष्ण को पाना सीखाता है तो जन्माष्टमी उत्सव पर नन्हे लल्ला को सजाना, झूलाना, माखन मिश्री का भोग लगाना, ये सब कहीं न कहीं हमारे भावजगत को पोषित करके हमें पूर्ण रूप से निखारता है और हमें आनंद की ओर अग्रेसर करता है.

गणपति उत्सव हो या नवदुर्गा का मंडप, या फिर होली, तीज या ईद को ही ले लो. त्योहार हम मानवों को एक दूसरे के करीब लाता है, हमें जोड़ता है, हमें उबाऊ जीवन से उल्लास की ओर मोड़ता है. बिखरे हुए कई मानव मन को एक ही धारा में जोड़ते हुए उत्सव जीवन के शृंगार की मणिमाला है.

जीवन में मिठास घोलते हैं उत्सव
उत्सव के आने की प्रतीक्षा में भी बहुत मिठास होती है. चखकर देखिये. जब भी कोई उत्सव करीब होता है घर में जैसे गुलालमय माहौल हो जाता है. घर के बच्चे बुजुर्ग सब उत्सव की तैयारियों में जुट जाते हैं. घर की सजावट, गलियों-मोहल्लों की सजावट और फिर खुद की सजावट, जो हमारी सोई हुई क्रियाशक्ति को जगाकर सृजनात्मकता की ओर ले चलती है और आपने देखा है? हमसे हुआ छोटा सा भी सृजन हमें बेशुमार खुशियां देता है. और वही खुशियां जो हमें हमारे एकाकीपन से निकालकर आनंद से भर देती है.

उत्सव हमेशा ही सबका भला करते हैं. अच्छाइयों का और बुराइयों का भी. उत्सव, भारत की मिट्टी में बसी वो खुशबू हैं, जिनको चुराने के लिये हवायें लालायित होती हैं. उत्सव भारत की वह तस्वीर है, जिसे देखने के लिए, मनाने के लिए सारा संसार भारत में आने का इंतजार करता है. और भारत को मिलना हो तो उत्सव ही श्रेष्ठ माध्यम है.

हमारी साँस्कृतिक प्रदर्शिनी हैं, हमारे उत्सव
भारत के कोने कोने में मनायें जाते छोटे मोटे उत्सव अपनी गोद में हमारी संस्कृति को समाये हुए है और यही त्योहार युगों से हमारी परंपराओं और हमारें सांस्कृतिक धरोहर को संभाले हुए उन्हें हमारी आज तक ले आये है. अब उसे संभालने की बारी हमारी है.

आधुनिकता की आड़ में हम उसे कलुषित नहीं कर सकते हैं. हम उस परंपराओं से खिलवाड़ नहीं कर सकते हैं, जो हमारे पुरखो की देन हैं. हमें अपने उत्सवों को पावन रखना होगा. स्वार्थों से नहीं परमार्थों की दिशा देनी होगी. हमें वो चाहे जैसे भी मिले हो मगर हमें अपनी विवेकबुद्धि का उपयोग करके उसे पवित्र रखना होगा. हमारी अगली पीढ़ी के लिए हमारी यह सांस्कृतिक धरोहर, हमारी परंपरा के परिचायक, हमारें आनंद के असीम स्रोत, उल्लास के आधारक हमारें उत्सवों को सभी तरह से संभालकर आगे ले जाना होगा क्योंकि यही तो संदेश है उत्सवों का मानवजाति को. कि गतिशीलता ही तो जीवन है और उत्सव वही गतिशीलता के द्योतक है उल्लास के परिचालक और स्नेह के संवाहक है.

उत्सवों के अंक में छुपे उल्लास, आनंद, ऐक्य, सम्मान, प्रेम और गतिशीलता जैसे अनेकविध मोतियों से अपने जीवन को सजाते रहना है और यही तो ईश्वर चाहता है. तभी तो वह उत्सव के बहाने हमें मिलने आता है.

उत्सव का महत्व
उत्सव की विविधता, उत्सव की परंपरा और उत्सव रूपी खुशियां अतीत की पीढ़ी ने वर्तमान पीढ़ी को दी और वर्तमान पीढ़ी भविष्य की पीढ़ी को दे रही है. इसी तरह उत्सव, पुष्पित पल्लवित होते रहे हैं और होते रहेंगे.

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9 comments:

  1. धन्यवाद आदरणीय
    आभारी हूँ

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  2. वाह.....बहना..... सुंदर आलेखन....धन्यवाद

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  3. कितना सुंदर और खूबसूरत आलेख...रुबरु कराती..लेखनी को नमन ❤️

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  4. बहुत सुंदर लेख आदरणीय भावना जी!!!

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  5. "जीवन की गत्यात्मकता का उल्लास होते हैं.. उत्सव"...,,,

    बहुत ही सुन्दर एवं सारगर्भित आलेख..!

    हार्दिक बधाई आदरणीया..!

    सादर प्रणाम स्वीकार करें।

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