बीते हुए लम्हों की कसक


क्या आप भी कभी किसी एक्सीडेंट के शिकार हुए हैं, तो पढ़ लीजिये यह  

''वक्त किसका कब बदल जाए कोई नहीं जानता. एक घटना बहुत कुछ बदल देती है, लेकिन यदि आप उसे सकारात्मक लें तो बुरे वक्त को भी अच्छे में बदल सकते हैं.''
- उषालाल सिंह  

वक्त कितना मासूम होता है उसे कुछ भी नहीं पता कि उसमें कितना कुछ समाहित है. वो तो पृथ्वी की घूर्णन गति के साथ ही घण्टा,मिनट, सेकंड के पंखों पर सवार दिन- रात में ही गतिमान है. युगों- युगों के समय के समंदर में न जाने कितनी ही घटनाएं समाहित है तो कितनी ही आकर ले रही है. पर समय इनसे बिल्कुल अनजान है वो नहीं जानता उसे कि अगली घूर्णन पूरा होने के बाद आने वाला दिन किसी के लिए सुखद तो किसी के लिए दु:खद भी हो सकता है. 

समय की इस अजनबीपन ने कुछ दिन के लिए मुझे खुद के बेहद करीब कर गया. कहते हैं जो होता है अच्छे के लिए होता है. ये सान्तवना देने के लिए अच्छा है. पर जब पैर फ्रैक्चर होने के बाद बिस्तर पर आ गई तब ऐसा लगा मेरा सब काम बाधित हो गया. जब पैरों पर खड़े होने लायक ही न रही तो किसी काम को क्या अंजाम देती? जब बच्चे व पति अपने- अपने काम से स्कूल निकल जाते तो बिस्तर पर पड़े- पड़े अकेलेपन को जीती. मोबाइल और कुछ किताबों के साथ ही मित्रों के सुझाव ने बहुत सहारा दिया. जब मोबाइल और किताब से जी उचटता और नजरें छत से जा टकराती तो ऐसा लगता कमरे की दरों दीवार भी कुछ कहना चाह रहे हैं. 
शुरू के पन्द्रह दिन तो दर्द की वजह से तन और मन का सामंजन ही न रहा. जब दर्द से राहत मिली तो एकांकीपन इतना डराता जैसे हम विक्षिप्त न हो जाएं. 

जब पैर ने चलने में असमर्थता जताई तो मन गतिमान हो उठा. खुद तो बिस्तर पर ही रहती पर मन यादों की गलियारों में घूमता रहता. बचपन, लड़कपन सब. 

याद आया है वो दिन जब सौ रु पैकेट खर्च करके मीना कुमारी(अभिनेत्री) जी का पोस्टर बनवाई थी, जो अब भी मेरे ससुराल में है. अब लगता है उसे मेरे पास होना चाहिए. बहुत पहले से मन में दबी इच्छा थी कि उनकी सारी फिल्में देखूंगी. आज तक सोच में ही ये बाते थी. पर अब लगा कि हाँ ये काम तो कर ही सकते हैं. बस रोज का समय कैसे कटने लगा मुझे भी नहीं मालूम. प्रतिदिन एक, कभी- कभी तो दो फिल्में भी देख लेती. इस बीच मीना जी की कुछ फिल्में-
मैं चुप रहूंगी, सहारा, पूर्णिमा, अर्धांगनी, चाँद, दिल अपना और प्रीत पराई, तमाशा, मैं भी लड़की हूँ, दुश्मन, मंझली दीदी, भाभी की चूड़ियां, जिंदगी और ख्वाब, आजाद, फूल और पत्थर, बहु बेगम, साहेब बीबी और गुलाम और भी कुछ फिल्में नाम याद नहीं आ रहा. पाकीजा तो कितनी बार देख चुकी हूं शायद गिनती भी याद नहीं.  

जब फिल्में देखी तो गाने भी अच्छे लगने लगे. वैसे गाने की कला तो आनुवंशिक रूप से माता- पिता किन्हीं में न थी न हम भाई बहनों में ही हस्तांतरित हुआ. सो इस विद्या से अब तक अछूती ही रही हूँ. पर सुनना अब अच्छा लगता है. बड़ा मन करता है थोड़ी तेज आवाज में गाना बजता रहे और उसकी झनकार से हम भी झंकृत हों. पर जब भी बजाना चाहें बच्चों ने ईयर फोन लाकर पकड़ा दिया. बहुत तकलीफ हुआ. पर कुछ कर नहीं सकते. बचपन में पिताजी के सामने कभी रेडियों भी न बजाएं थे वैसे रेडियो प्रोग्राम की कोई जानकारी भी न थी. बस पिताजी सुबह शाम का समाचार सुनते थे. सबसे अधिक दुखी पापा को तब देखी थी जब श्रीमती इंदिरा गांधी जी की हत्या की खबर रेडियो पर आई थी. उस वक्त तक हम इतने अल्हड़ थे कि नहीं पता था कि इंदिरा गांधी क्या हस्ती हैं. 

फूलनदेवी दस्यु की आत्मसपर्ण का समाचार भी पापा रेडियो पे ही सुने थे इतना याद हैं. और कभी कभी किन्हीं गीता बहन जी का कोई प्रोग्राम का याद है.  जब टीवी भी आया तो एकलौता दूरदर्शन पर सीमित कार्यक्रम फिर भी देखने पर पाबन्द. बड़ी बेसब्री से रविवार का इंतजार रहता. सुबह में रंगोली, मिक्की एंड डोनाल्ड, रामायण, ही मैन, अप्पू और पप्पू, पंखों से पंजों तक, लेखु, सिग्मा और दोपहर में "सीक्रेट ऑफ द सी". शाम में दादा- दादी की कहानियां, विक्रम बैताल और फ़िल्म शुरू होने से पहले पचास विज्ञापन. जिसे हम सब बड़े चाव से देखते थे और गिनते भी थे. 

बाद में रविवार को ही एक धारावाहिक "फिर वही तलाश" मन के तार से जुड़ा. पद्मा और नरेंद्र की कहानी. फिर तो बहुत से धारावाहिक अच्छे लगे. 

सबसे पहले तो बुनियाद. जो सप्ताह में दो दिन देता था. मंगल और शनिवार, एक सीरियल, "यात्रा" और जी अच्छा लगा था वो था "कशिश" जिसमें सुदेश बेरी और मालविका तिवारी. एक पचपन खम्भे लाल दीवार भी अच्छी लगी थी. 

बस ऐसे ही हर रोज कोई न कोई पुरानी यादें दस्तक दे जाती और फिर पूरा दिन उसे गुनते ही बीत जाता. 

करीब सवा महीना के बाद डॉक्टर के यहाँ गई तो X-ray के बाद कहा गया अभी हड्डी नहीं जुड़ा है दस दिन और. डॉ की बात से मन उदास हो गया. कहाँ तो दोनों पैर का चप्पल लेकर गई थी ताकि प्लास्टर कटने पर नंगे पैर न आना पड़े. 

पर प्लास्टर कई बार भींग चुका था इसलिए डॉक्टर से आग्रह कर कटवा ली पर बदले में क्रेप बैंडेज बांध दिया गया. ये प्लास्टर से आरामदेह है, पर अभी दस दिन और झेलना है. 

अब धीरे धीरे वर्तमान में लौटने में ही भलाई है. स्कूल भी जॉइन कर ली हूँ. वहाँ भी बच्चों को अब तक नए सत्र का एक क्लास भी न ले पायी हूँ. इसी बीच फर्स्ट टर्म एग्जाम भी गई. अब मूल्यांकन कार्य भी करना है. तो जितनी जल्दी यथार्थ के धरातल पर आ जाऊं उतना ही बेहतर होगा आखिर यादों से पेट नहीं भरता?

बहुत से घर बाहर के काम पेंडिंग हैं. तो अब यही विचार की हूँ कि कुछ दिन के लिए इस आभासी दुनियाँ से विदा ले लूँ. सभी को बहुत- बहुत हार्दिक आभार. फिर तो लौट कर यहीं आना है, क्योंकि अब समय किसके पास है. जो किसी की कुछ सुन सकें. 

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