पितृ पक्ष का कौवा पुराण, एक पखवाड़े के लिए सबसे आत्मीय पूर्वजों का प्रतिनिधि



संस्कृति और संस्कारों को हमेशा तर्क और विज्ञान की कसौटी में ही नहीं कसते रहना चाहिए. इसमें भावनाओं की भी छूट लेनी और देनी चाहिए. हिंदुओं के तमाम धार्मिक कर्मकांड व्यापक अर्थों में धार्मिकता से कहीं ज्यादा सामाजिक और पारिस्थितिकीय व्यवस्था के पोषक हैं. पितृपक्ष का कर्मकांड भी ऐसा ही एक आयोजन है. 
- लोकमित्र गौतम  

पितृपक्ष का कर्मकांड में मरणोत्तर भावनात्मकता के तो दर्शन होते ही हैं. इसमें एक बृहद पारिस्थितिकीय दर्शन भी मौजूद है. जब हम इंसान के सबसे करीब रहने वाले और सबसे उपेक्षित पक्षी कौआ को एक पखवाड़े के लिए अपने सबसे आत्मीय पूर्वजों का प्रतिनिधि मान लेते हैं. 

इन पंद्रह दिनों में हम कौवे को एक से बढ़कर एक पकवान खिलाने की कोशिश करते हैं. भले ‘कबहुं निरामिष होई कि कागा’ वाली उसकी प्रवृत्ति फिर भी बरकरार रहती हो, लेकिन इन दिनों हम इस कुदरती सफाई कर्मी और कृषि मित्र पक्षी की खूब सेवा तो करने की कोशिश करते ही हैं, उसके प्रति एक अपनत्व के भाव से भरे होते हैं. शायद यही वजह है कि भारतीय उपमहाद्वीप में पायी जाने वाली करीब 1237 पक्षी प्रजातियों में कौआ इंसान का सबसे पुराना सहचर है.

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