मैंने कहा प्रेम, उसने कहा...


मैंने कहा- प्रेम
उसने कहा- पीड़ा
मैंने फिर से कहा- प्रेम
इस बार वो पूंछ ही बैठा- कैसे?
घण्टों बैठी रही मौन
हाथ थामे उसका ....
फिर पूँछा- अब कहो-
प्रेम या पीड़ा..
नम आँखों से बोला
शायद तुम सही..
या फिर कुछ कुछ मैं भी...
किंचित आश्वस्त
मुस्कान सहेजी मैंने
आँचल की कोर पर....
फिर अचानक ही न जाने कहाँ
गुम गया वो...
दुनिया की भीड़, भरी दोपहर..
खोजी जो ठहरा
करता होगा कहीं अब भी
प्रेम में पीड़ा की खोज
किन्तु विश्वास है मुझे
किसी एक दिन जब भी
ये नम हथेली
उसका हाथ थाम बैठ जायेगी
उसकी हर पीड़ा निरर्थक हो जायेगी
जीवन शोध को उन्मुख उसकी
एक और प्रति बढ़ जायेगी....

- प्रियंवदा अवस्थी      




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