यदि आप सच में आदिशक्ति के पूजक हैं तो यह अवश्य करिए


'आदिशक्ति' के प्रागट्य का उत्सव नवरात्रि के पावन पर्व पर विशेष  


प्रकृति हमसे नाराज है, क्यों न हो. हमने तो ईश्वर के घरों को भी नहीं छोड़ा. घूमने-फिरने के बहाने पहाड़ियों पर चले गये और वहाँ भी प्लास्टिक उड़ेल कर आ गये. लगता है जैसे शिव कुपित होकर तांडव कर रहे हैं. बढ़ती हुई आबादी और हमारे स्वार्थों ने आज नदियों को समंदर तक जाने के रास्ते भी रोक लिए हैं, नदियां कुपित नहीं होंगी क्या? यह सब हमें छोड़ने होंगे, अन्यथा जीवन बहुत ही दु:खद संघर्षमय होगा. और यह सब करते हैं तब ही मां शक्ति की सही उपासना होगी...



भावना भट्ट
भावनगर, गुजरात

क आख्यान में कहा गया है कि पिछली चतुर्युगी के अंतिम चरण में जब 'मधु'-'कैटभ' नामक असुरों ने देवी-देवताओं को अपना बंदी बनाया, तब 'श्री नारायण' भी मोह निद्रा में सोये हुए थे. तब 'ब्रह्मा जी' द्वारा 'आदि कन्या' प्रकट हुईं और नारायण को जगाया. उन्होंने 'मधु' तथा 'कैटभ' का नाश कर देवी-देवताओं को मुक्त कराया. वह कहलाई आदिशक्ति.


दूसरे आख्यान में कहा गया है कि 'महिषासुर' नामक असुर ने स्वर्ग के सभी देवी-देवताओं को पराजित किया. त्रिदेव की शक्ति से एक कन्या के रूप में 'आदिशक्ति' प्रकट हुई. उसने महिषासुर का वध किया और देवी-देवताओं को मुक्त कराया. जो कहलाई महिषासुर मर्दिनी महाकाली.

तीसरे प्रसंग में कहा गया है कि सूर्य के वंश में 'शुंभ' और 'निशुंभ' नामक दो असुर पैदा हुए. उनके प्रधान कार्यकर्ता का नाम 'रक्तबिंदु' था, सेनापति का नाम 'धूम्रलोचन' था और उसके दो मुख्य सहायकों का नाम 'चंड' और 'मुंड' था. शिव जी की शक्ति से 'आदि कुमारी' प्रगट हुईं, जिनके विकराल रूप से 'महाकाली' प्रगट हुईं और 'चंड-मुंड', 'रक्तबिंदु' तथा 'धूम्रलोचन' का विनाश किया.


मूल कथाएँ आज के परिप्रेक्ष्य में
आख्यान की बातों को ऐसे नजरिए से देखें तो 'मधु' और 'कैटभ', 'राग' और 'द्वेष' के प्रतीक हैं और 'असुर' शब्द 'आसुरी लक्षणों' का. इसी प्रकार 'महिष' शब्द का अर्थ 'भैंस' है जो 'मंद बुद्धि' तथा 'तमोगुण' का प्रतीक है. वैसे ही 'धूम्रलोचन' ईर्ष्या और बुरी दृष्टि का. 'शुंभ-निशुंभ' 'हिंसा' और 'द्वेष' आदि के प्रतीक हैं. 

अत: उपरोक्त बताए गए तीनों आख्यानों का वास्तविक भाव यह है कि सृष्टि पर अज्ञान तथा तमोगुण रूपी रात्रि छाई हुई थी, तब राग, द्वेष तथा हिंसा ने उन सभी नर-नारियों को धीरे-धीरे अपवित्रता की ओर अग्रसर कर उन्हें अपना बंदी बनाया. तब परमपिता परमात्मा ने त्रिदेव द्वारा भारत की कन्याओं को ज्ञान, योग तथा दिव्य गुण रूपी शक्ति से सुसज्जित किया, जिसके कारण वे 'आदि शक्ति' कहलाईं. उन दिव्य कन्याओं के महान कर्तव्य के कारण ही हर वर्ष इन दिनों कन्या-पूजन करते हैं.

हम आज भी यह देख सकते हैं आज के समाज में उन सभी असुरों को नंगा घूमते देख रहे हैं न. इस वक्त कलियुग चल रहा है, कहा जाता है कि वह अपने अंतिम चरण में है इसी लिए आसुरि यता का बोलबाला है.

समाज जीवन को देखिए हर जगह ऊपर कथित राग, द्वेष, क्रोध, अहंकार, लालसा, ईर्ष्या, हिंसा से ग्रसित लोग खुलेआम घूम रहे हैं. आज न बेटियां सुरक्षित हैं न बेटे. कई घरों से माता-पिता निकाले जा चुके हैं. हर घर चुपचाप, विक्षिप्त और अपने में ही खोया हुआ है, लगता है घर का उजाला ही कहीं चला गया हो. भाई-भाई एक दूसरे के हरिफ होकर एक दूसरे को काट रहे हैं. समाज जीवन बहुत ही कलुषित हो चुका है. मानवता करीबन खत्म होने की कगार पर है.


आज के समय का सब से खतरनाक असुर- प्रदूषण 
हमारी जमीन प्रदूषित कर दी है हमने. जो अब हमारे शक्ति के स्रोत अनाज को उगाने में असमर्थ हो रही है. मानो उसका मातृत्व छीन गया है. हमारी नदिया, हमारे जंगल, हमारी हवा कुछ भी तो नहीं छोड़ा है हमने.

हमने हमारे जीवन को सहज और सुरक्षित करने के लिये प्रतिदिन प्राप्त किये जाने वाले सुख को पाने के लिए प्रकृति के हर घटक को छेड़ा है, उसे प्रदूषित किया है. हम दिन रात की ताजी हवा को दूषत कर रहे हैं कैसे? कभी सोचा है?

दिन-रात चल रहे एयरकंडीशनर, हवा में भारी मात्रा में गर्मी छोड़ रही है. साथ में हमने अपने समय को बचाने की दौड़ में आविष्कार किये हुए प्रेट्रोल डीज़ल से चलने वाले सभी यंत्रों, चाहे वह कारखानों के हों या अपने स्कूटर मोटर. वह सभी दिन-रात हवा में कार्बन डायऑक्साइड छोड़कर पृथ्वी का तापमान बढ़ा रहे हैं. जिनकी वजह से ग्लोबल वार्मिंग की समस्याओं के चलते आज कहीं पर ग्लेशियर पिघल रहे हैं, तो कहीं पर बादल फट रहे हैं. नदियाँ बेकाबू होकर घरों तक आ चुकी हैं, साथ में खेत खलिहान और फसलों को बहा चुकी हैं.


जगाए हम अपनी शक्तियों को..!
क्या हम आज भी राह देख रहे हैं कि जो पुरानों में लिखी गई है, ऐसी ही कोई घटना घटित होगी और आद्यशक्ति, महाकाली, प्रकट होंगी!  कहाँ है वह आदिशक्ति? वह महाकाली? हमारे भीतर ही है, मगर आज भी सोई हुई है.

यह नवरात्रि पर्व उन शक्तियों को जगाने का पर्व है, जो हममें आप में और सभी में स्थित है. मधु' और 'कैटभ' माने 'राग' और 'द्वेष', महिष माने मंद बुद्धि' तथा 'तमोगुण', धूम्रलोचन' ईष्र्या और बुरी दृष्टि का. 'शुंभ-निशुंभ' 'हिंसा' और 'द्वेष' हमारे भीतर ही रही आदिशक्ति को जगाकर हमें हम में ही बसे उन असुरों का संहार करके सबसे पहले खुद को ही आसुरी शक्तियों से मुक्त करना है. समाज तो अपने आप हो ही जाएगा.

आओ संकल्प करें
तो आओ, आज हम घट स्थापन के साथ शरीर रूपी घट में रही आसुरी शक्तियों को बाहर निकालने का संकल्प लें. दीपज्योति को स्थपित करने के साथ साथ भीतर की आत्मज्योति को जगाने का संकल्प लें. 

नौ दिन उपवास के साथ साथ प्रकृति के उन सभी तत्वों के पास भी बैठें, जो जीव जगत के प्राणदाता है. उस की विडम्बना को भी समझें, सोचें और अपने हाथों को जोड़कर प्रार्थना के साथ प्रकृति के उन तत्वों को शांत होने के लिए विनती भी करें. साथ में यह वचन भी दें कि हम भी आप के नियमों का पालन करेंगे और आप का संरक्षण करेंगे. हम नदियों के जल को पवित्र रखेंगे, हम जमीन को प्लास्टिक कचड़े से और रसायनों से मुक्त रखेंगे.  

हम संकल्प लें कि हम हवा को प्रदूषित नहीं करेंगें, हम ज्यादा से ज्यादा वृक्षो को उगाकर हमारी पृथ्वी को शीतलता प्रदान करेंगे.  

अगर हम सब सच में आदिशक्ति के पूजक हैं तो वह आदि शक्ति जो आप में है, मुझ में है, हम सब में है, संसार के कण कण में है, उसे पहचाने, उसी का आह्वान करें. उसका ह्रदय के पवित्र भावों से पूजन करें और समग्र मानवता के लिए उनको मानव कल्याण का ही वर देने के लिए लालायित करें. 

वह तो माँ है, सच मानिए, वो हमें निराश नहीं करेंगी. 
आप सभी को नवरात्रि पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं, माँ आदिशक्ति आपको शक्ति दे कि आप समाज को देश को आसुरी शक्तियों से मुक्त करने में सहभागी बन सकें. माँ आदिशक्ति आपकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करे .. 




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1 comments:

  1. मेरे आलेख को प्रकाशित करने के लिए आप का धन्यवाद ज्ञापित करती हूँ। संपादक महोदय श्री..🙏

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