लोगों की मजबूरियों का फायदा उठाने में कथित लोक कल्याणकारी सरकारें भी पीछे नहीं, केबीसी शो में हुआ साबित



लोक कल्याणकारी राज्य या सरकार से आशय है कि वह राज्य के नागरिकों की आर्थिक एवं सामाजिक उन्नति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाये. लोक कल्याणकारी सरकार का मतलब राज्य के नागरिकों को अवसर की समानता, धन-सम्पत्ति के समान वितरण तथा जो लोग अच्छे जीवन की न्यूनतम आवश्यकताओं को स्वयं जुटा पाने में असमर्थ हैं, उनकी सहायता करने जैसे सिद्धान्तों पर आधारित है, लेकिन यहाँ तो खुद सरकार ही लोगों की मजबूरियों का फायदा कैसे उठाया जाए पर चल रही है. कल रात केबीसी शो में बबिता काकू जी के बारे में जो बताया गया, उसे सुनकर यह साबित हो जाता है. 
बबिता सुभाष ताडे इस समय गेम खेल रही हैं, हम उन्हें शुभकामनाएं देते हैं कि वह यहाँ से खूब धनराशी जीतें और अपने सपनों को साकार करें ..



गिरीश सक्सेना 

ल रात केबीसी शो में बबिता काकू जी के बारे में बताया गया कि वे स्कूल में अपनी एक सहायिका के साथ 450 बच्चों के लिये मध्यान्ह भोजन बनाने का कार्य करतीं हैं. इस काम में उन्हें रोज 8 से 10 घंटे काम करना होता है और इस कार्य के लिये उन्हें पूरे महीने के मात्र 1500/- वेतन के रूप में सरकार की ओर से दिया जाता है.



जब उनसे उनकी इच्छा पूछी गयी तो उन्होंने बताया कि वो यहाँ से जो रकम जीतेंगी, उससे एक मोबाइल खरीदना चाहती हैं.

सबसे बड़ी बात वो अपने इस काम से पूरी तरह संतुष्ट हैं. और अपना काम पूरी ईमानदारी और जिम्मेदारी से करती हैं. 

इस तरह के काम लोग सिर्फ इस आशा के साथ करते रहते हैं कि आज नहीं तो कल वेतन अच्छा हो जाएगा. हम स्थायी हो जाएंगे.

सरकारों का सिर्फ इस आधार पर कि अस्थायी/ संविदा/ आउटसोर्सिंग कर्मचारियों से काम करवा रहे हैं, इसलिए कम वेतन दिया जा सकता है, जैसा सोच रखना कहाँ तक उचित है? यह उन्हें लोक कल्याणकारी सरकार से अलग भी करता है. 

प्रश्न यह है कि लोक कल्याणकारी सरकार की इस व्यवस्था और इस तरह की अनेकों व्यवस्थाओं में शोषण को संस्थागत कर दिया है, ये कैसे और कहाँ तक उचित है? 

इस तरह के अनेकों काम, जो सरकार करवाती है और उसके लिये ऊंट के मुँह में जीरा के समान वेतन या मेहनताना दिया जाता है, सोचने वाली बात यह है कि आखिर ये क्यों चल रहे हैं? 

आखिर हमारे संविधान में वर्णित हमारे गरिमामय जीवन जीने के अधिकार को ये तथाकथित सरकारें कैसे छीन सकती हैं. 

जनहित में आवश्यक है कि आज न्यायपालिका को स्व-विवेक से इस तरह के कामों के लिये समान काम, समान वेतन का नियम लागू करवाने के लिये राज्य और केंद्र सरकारों को निर्देशित किया जाना चाहिये. 




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