वो चीख रही हैं 'उन्हें भी तो पकड़ो', मगर धृतराष्ट्र सभा कर रही अट्टहास, असली गुनाहगार कब होंगे बेनकाब?



युवतियों चीख रही हैं  'हमें क्यों पकड़ रहे हो... अरे उन्हें भी तो पकड़ो', मगर 

हमारी व्यवस्था ध्रुतराष्ट्र सभा की तरह उनकी इस बात पर अट्टहास कर रही है. 

कुछ तो इंसानियत रखो... पूरा का पूरा सिस्टम ही हाथ धोकर 

केवल मजबूर युवतियों के पीछे पड़ गया है. 

क गांव में एक सच्चा आदमी रहता था. उसकी सच्चाई के कारण दुसरे सभी परेशान थे. मामला यह था कि जब भी कोई बात, कोई घटना होती पुलिस आती वह सच उगल देता. परेशान होकर गांव वालों ने निर्णय किया, क्यों न इसे मार देते हैं. 

गाँव के सभी लोग एकत्रित होकर उसके घर के सामने बांस, घांस-सुतली ले जाकर ठठरी बांधने लगे. वह घर से बाहर निकला बोला- 'यह क्या कर रहे हो?'  सब एक स्वर में बोले- तू मर गया है, तुझे जलाने ले जाना है. सो तेरी ठठरी बाँध रहे हैं.  वह बोला- कौन कह रहा है? मैं तो जीवित हूँ. 


गाँव वाले बोले- हम सब कह रहे हैं तू मर गया, तो तू मर गया, तेरे एक अकेले कहने से क्या होता है? बस फिर क्या था, उसने जल्दी ही वहां से भाग कर अपनी जान बचाई.  

आज हमारे देश में भी कुछ इसी तरह के हालात हैं. धृतराष्ट्र तो अंधा था ही, बजाय उसे सही मार्ग अच्छा बुरा दिखाने के, गांधारी ने भी अपनी आँखों पर पट्टी बाँध ली, की तरह आज लगभग सभी उसी मार्ग पर चल कर अपनी आँखों पर पट्टी बाँध रहे हैं. 

यह बात इसलिए कही जा रही है, क्योंकि हाल के मामले में मजबूर महिलाओं के पीछे सब पड़ गए हैं, लेकिन जो असली गुनाहगार हैं, उनकी कोई बात नहीं हो रही. मीडिया भी यही लिख रहा है पुलिस हिरासत में मांग रही हैं मिनरल वाटर और हैंडवॉश, रसियन गर्ल बन सफेदपोशों को करती थी सम्मोहित, जिसके नाम का मंगलसूत्र और सिंदूर लगाती है आरती, वो दयाल है किसी और का पति, मीडिया यह सब तो ढूंढ लाया, लेकिन आज तक उन चेहरों को बेनकाब नहीं किया जा सका है, जो वास्तव में दोषी हैं. उन्हें हर कोई बचाता दिख रहा है. भोपाल के एक दैनिक नवभारत भर ने साहस दिखाया. 


बताया जा रहा है युवतियों के पास 100 से अधिक लोगों के 'रंगीन' वीडियो हैं, लेकिन कोई उन वीडियो को सार्वजानिक करने, दोषी व्यक्तियों के खिलाफ कार्यवाही की बात नहीं कर रहा. बात हो रही है तो केवल उन मजबूर युवतियों की, जिन्हें चटकारे ले लेकर सुनाया जा रहा है. 

जेल में भी उन्हें ही डाल दिया गया है, लेकिन जिन लोगों ने उन्हें इस तरह का घिनौना काम करने मजबूर किया, बदले में जिन्होंने उनको लाभ पहुंचाने अनुचित काम किये, उनकी कोई बात नहीं हो रही. कोई सवाल ही नहीं उठ रहा कि कुछ नहीं किया तो आखिर ब्लेकमेल क्यों हो रहे थे? 

राजनीति की बात करें तो कांग्रेस प्रदेश की सरकार गिराने की साजिश बता कर दूर हटती दिख रही है, बीजेपी मामला सीबीआई को सौंपने की मांग कर रही है. पूर्व सीएम दिग्विजय सिंह ने मामले में श्वेता के भाजपा नेताओं से निकट संबंध रहे हैं, कह कर पल्ला झाड़ लिया. पूर्व सीएम शिवराज मामा की पहले प्रतिक्रिया रही कैसा मामला? युवतियों चीख रही हैं 'हमें क्यों पकड़ रहे हो... अरे उन्हें भी तो पकड़ो', मगर हमारी व्यवस्था धृतराष्ट्र सभा की तरह उनकी इस बात पर अट्टहास कर रही है. 

यह तो सब समझ रहे हैं यह कोई पहला और आख़िरी भी मामला नहीं है. आम चर्चा में है कि जब अधिक और प्रभावी लोग शामिल हैं तो होना जाना कुछ नहीं है. हमारे ऐसे लिखने का मतलब भी यह नहीं है, लेकिन कुछ तो इंसानियत रखो... पूरा का पूरा सिस्टम ही हाथ धोकर केवल मजबूर युवतियों के पीछे पड़ गया है. 




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