न ही यह सुशासन है और न ही सभ्य समाज



2012 में दिल्ली में हुए निर्भया गैंगरेप के बाद जस्टिस वर्मा आयोग की सिफारिशों के मुताबिक एंटी रेप ला लाया गया था। आईपीसी और सीआरपीसी में तमाम बदलाव हुए थे। कानून को सख्त करके बलात्कार रोकने को नए कानूनी प्रावधान किए गए। इतनी सख्ती और जनाक्रोश के बावजूद बलात्कार के मामले नहीं रुके। शीर्ष और संवैधानिक पदों पर बैठे या रह चुके जिम्मेदार लोगों पर बलात्कार के आरोप सामने आये हैं। इस वक्त हालात ये हैं कि देश में हर 12 मिनट पर एक लड़की बलात्कारियों का शिकार हो रही है। उसके बाद उसे अपनी एफआईआर दर्ज करवाने के लिए न जाने कितनी पीड़ा सहनी पड़ती है। 




आकाश नागर 

न्नाव रेप केस हो या शाहजहांपुर का चिन्मयानंद मामला, सभी में पीड़िताओं को पहले तो एफआईआर दर्ज कराने के लिए न जाने क्या क्या खोना पड़ा। अदालत की सख्ती के कारण जब मामला दर्ज हुआ तो पुलिस और सत्तारूढ़ सियासी दल के लोग रेपिस्ट के बचाव में ऊल जुलूल सफाइयां देते दिखे। उन्नाव रेप केस के गवाहों को मौत की नींद सुला दिया गया और पीड़िता के पिता समेत तमाम परिजनों पर झूठे केस लाद दिये गये। चिन्मयानंद का शिकार लड़की अपनी जान बचाने को छिपती घूम रही है। उसे हाईकोर्ट में एफआईआर दर्ज कराने के लिए खुदकुशी की बात कहनी पड़ी। सत्ता इतनी भी बेशर्म हो सकती है, हमने पहली बार देखा है।


इन घटनाओं में यह भी देखने को मिला कि आरोपियों को जेल में ऐसे रखा जा रहा है, जैसे वे जेल प्रशासन के मेहमान हैं। उनकी मर्जी के मुताबिक सुविधाएं और तमाम इंतजाम किये गये हैं। सुशासन और पारदर्शी ईमानदार निष्पक्ष कार्यवाही करने की बातें सिर्फ ढकोसला हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने बेटी बचाओ और बेटी पढ़ाओ का नारा दिया था मगर उनकी सरकार के ही कुछ लोग इस नारे को खोखला करने में जुटे हैं। 

हालात यह हैं कि न बेटी बच रही है और न पढ़ पा रही है। परिजन बच्चियों के सकुशल घर पहुंचने तक चिंतित मिलते हैं। इसका कारण वह पुलिस और जांच एजेंसी भी हैं, जो आपराधिक कानून के तहत सिर्फ कागजों में संचालित होती हैं, असल में वह सियासी तंत्र का हथियार हैं। यह तंत्र इतना सशक्त है कि उससे जुड़े लोग गुणदोष के आधार पर अपराधों की समीक्षा नहीं करते बल्कि सियासी फायदे देखते हैं। नतीजतन बलात्कारी और अपराधियों के हौसले बुलंद हैं। पीड़ित दबाव में या तो आत्महत्या कर लेता है या बयान बदल देता है। 

चिन्मयानंद के मामले में पुलिस ने पीड़िता के रिश्तेदारों को गिरफ्तार करके आरोपी को ‘बारगेनिंग’ का मौका दे दिया है। यह नीति न तो सुशासन है और न ही सभ्य समाज का चेहरा।




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