सरकारी अस्पतालों में गरीब प्रसूति महिलाओं के साथ ऐसी बेहूदगी कब तक?



ऐसा सिर्फ सरकारी अस्पताल में होता है यानि सिर्फ गरीब महिलाओं के साथ... शर्मशार हूँ आखिर जलील भी वही महिलाएं होती हैं, जो धनवान नहीं.  क्या करें साहब यहां शायद सब कुछ बिकता हैं- और सिर्फ रुपया बोलता है.  



सुषमा सिंह 

ल मैं अपनी कोचिंग क्लासमेट(सीमा मिश्रा) से मिलने उनके घर गई थी. 32 साल की सीमा की अभी पिछले महीने ही डिलीवरी हुई थी. शाम को लौटते वक्त रास्ते में अचानक जोरदार बारिश हो गई. घर पहुचते ही मैं पूर्णतः भीग चुकी थी. माँ ने कहां बेटा जल्दी कपड़े चेंज कर लो, वरना शीत हो जायेगी, लेकिन उस वक्त मेरे अंदर तूफान हिलोरे मार रहा था. आँखों से अंगारे बरस रहे थे. जिस विषय में मैने सीमा से सुना था, सोचकर रुह कांप रहीं थी. 


मैं कपड़े चेंज करके हमेशा की तरह मोबाइल नोटिफिकेशन देखने लगी. तब तक माँ चाय बनाकर ले आई. माँ ने कहा कैसी है सीमा और उसका बेबी. मेरा जबाव था- वो तो बढ़िया हैं, लेकिन माँ आप मुझे एक बात बताओ आपकी डिलीवरी.

उफ्फ्फ! आगे जुबान साथ नहीं दे रही थी.

माँ- हूंह, कहो बेटा क्या बात है?

पर मैं माँ से कुछ भी पूछने में असहज महसूस कर रही थी. इसलिए मैंने नजरें चुराकर खुद ही बताना शुरू कर दिया. 

माँ सीमा की डिलीवरी इंदिरा गांधी जिला अस्पताल में हुई थी. सीमा कह रही थी कि मुझे नहीं पता था कि "डिलीवरी में क्या-क्या होने वाला है, मैं पहले से ही घबराई हुई थी, क्योंकि यह मेरा फर्स्ट टाइम था. 


मेरे साथ बड़े से कमरे में और भी औरतें डिलीवरी के लिए आई हुई थीं. वे दर्द से कराह, चीख रही थीं. लेकिन इन औरतों के प्रति सहानुभूति दिखाने के बजाय उन्हें डांटा जा रहा था, जिसने मेरी बैचेनी को और बढ़ा दिया था. यहां तक की "हॉस्पिटल के वार्ड में कोई पंखा भी नहीं था. इस गर्मी और भीड़ में हमारा दम घुट रहा था.'' 

उन्होंने बताया ''हम दो-तीन महिलाओं के लिए एक ही बिस्तर था. हम सब प्रसव के दर्द से जूझ रही थीं और लेटना चाहती थीं, लेकिन वो संभव नहीं था. हम सब महिलाएं सिकुड़ कर बैठी थीं और तभी आराम कर पाती थीं, जब हम में से कोई बाथरुम या टहलने के लिए उठती."

मां उन्होंने बताया ''तभी मेरे बगल वाले बिस्तर पर एक महिला को तेज़ दर्द उठा, वो दर्द से कराह रही थी. पसीने में तर-बतर उस महिला का मुंह सूख रहा था, लेकिन उसकी सुध लेने वाला कोई नहीं था, लेकिन जब वो ज़ोर-ज़ोर से कराहने लगी, तब एक नर्स आई. नर्स ने जांच की और कहा कि अभी बच्चा बाहर नहीं आया है. दर्द से चिल्ला रही इस महिला को जांच के दौरान न सिर्फ़ नर्स ने डांट लगाई, बल्कि उसे कई बार मारा भी.'' 

"नर्स का जहां हाथ पड़ता वो उसे मार देती. वो लोग बाल तक खींच रहीं थीं. बातें तो ऐसी कह रही थीं कि सुनकर बच्चा पैदा करने पर शर्म आ जाए. पहले तो मज़ा उठा लेती हो फिर चिल्लाती हो. बच्चा पैदा कर रही हो तो दर्द तो होगा ही, पहले नहीं पता था क्या....  वगैरह-वगैरह.. सुषमा तुम ही बताओ ये क्या कोई कहने वाली बात है. हम कोई जानवर हैं क्या जो ऐसा करते हैं, लेकिन उस वक्त ये सब देखकर तो हम सभी दहशत में आ गए और मेरा दर्द तो जैसे ग़ायब ही हो गया.''

माँ ने कहा- अक्सर सरकारी अस्पतालों में प्रसव के दौरान महिलाओं के साथ ऐसा असंवेदनशील व्यवहार होना आम बात है. कई और सरकारी अस्पतालों में इलाज करा रही महिलाएं भी इस तरह के अनुभव बतायीं हैं मुझे.

मैं- माँ क्या आपके साथ भी!!

माँ- नहीं-नहीं मेरी डिलीवरी हॉस्पिटल में नहीं, बल्कि घर पर ही हुई थी. उस वक्त अक्सर डिलीवरी घर पर ही होती थीं. मां से यह सुनकर कुछ सूकून मिला.

खैर मेरा निष्कर्ष यहां तक पहुंचा था कि ऐसा सिर्फ सरकारी अस्पताल में होता है यानि सिर्फ गरीब महिलाओं के साथ... शर्मशार हूँ आखिर जलील भी वही महिलाएं होती हैं, जो धनवान नहीं.  क्या करें साहब यहां शायद सब कुछ बिकता हैं- और सिर्फ रुपया बोलता हैं.

खैर मैं कहना चाहूंगी नर्स महोदया क्या आपमें जरा सी भी इंसानियत बाकी हैं? लगता है आप बेच खायी हैं सारी शर्मोहया? एक औरत होकर इतनी बेहुदगी आपके अंदर..

क्या तुम एक माँ नहीं हो, या कभी माँ बनोगी ही नहीं? क्या तुम्हें स्वयं के साथ ऐसा बर्ताव अच्छा लगेगा??

सच पूछो तो मेरी नजर में तुम जानवर से बद्तर हो नर्स महोदया.. और सिर्फ मेरी नजर में नहीं बल्कि हर उस माँ की नजरों में तुम अपराधी हो, जिनको तुमने प्रताड़ित किया है, क्योंकि जिस वक्त किसी माँ को सहानुभूति और मदद की जरूरत होती है, तुम उन्हें गालियां दे रही होती हैं और शारीरीक कष्ट देती हो.. बेहद शर्मनाक. 




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