दर्द तो सबके एक से ही होते हैं

प्रेरक दास्तां     



किसी के चेहरे की मुस्कुराहट की बजह तो बनो.. खुशी ही नहीं, बहुत सूकून भी मिलेगा   
- सुषमा सिंह 

संयुक्त कलेक्टर रतलाम श्रीमती लक्ष्मी गामड़ की बहुत ही प्रेरक दास्ताँ, जिस पर Nootan Mishra जी ने सही ही कहा है 'जिन्हें चलना था वो लोग चलते गए... मगर जिन्हें रुकना था उन्हें बहाने मिले..' हम, हमारे इरादे बुलंद हों तो अच्छे कार्यों में कभी पीछे न हटें, संभव सहयोग जितना अधिक कर सकेंगे, उतना ही आपके अपने जीवन में आनंद आयेगा.    

''मैंने दवाई लेकर आँखें बंद ही की थीं कि आपदा वाले कंट्रोल रूम से फोन आ गया 'सर रात में भारी बारिश से जगह-जगह लोगों के घरों में पानी घुस गया है और सनावदा के तालाब में पानी अधिक आ जाने से निचली बस्ती में पानी घुस सकता है।' उफ्फ हम लोगों की जॉब भी न क्या-क्या चेलेंज खड़े कर देती है हर वक्त।''

टीम के साथ हर कदम 
दो-तीन दिन की लगातार रात की कानून-व्यवस्था की ड्यूटी और भारी बारिश ने जैसे मेरी भागदौड़ को और बढ़ा दिया था। थकान कुछ ज्यादा होने से सोचा आज कुछ थोड़ा और सो लूँ। घड़ी ने 6 बजे का अलार्म बजाकर मुझे उठने के लिए मजबूर कर दिया, क्योंकि मुझे रोज सुबह छह बजे अपनी एक दवाई लेनी होती है। मैंने दवाई लेकर आँखें बंद ही की थीं कि आपदा वाले कंट्रोल रूम से फोन आ गया 'सर रात में भारी बारिश से जगह-जगह लोगों के घरों में पानी घुस गया है और सनावदा के तालाब में पानी अधिक आ जाने से निचली बस्ती में पानी घुस सकता है।' उफ्फ हम लोगों की जॉब भी न क्या-क्या चेलेंज खड़े कर देती है हर वक्त। मैं फटाफट चार-पाँच कॉल करके अपनी टीम को तैयारी के लिये बता के उठ खड़ी होती हूँ फिर से नई चुनौती से निपटने के लिए।

मेरी गाड़ी एक गाँव के चौराहे पर पानी अधिक होने की वजह से रोकनी पड़ती है, तभी मेरी नजर सड़क किनारे एक छोटी सी झोपड़ी पे जाती है, वहाँ एक बुजुर्ग जो पूरी तरह से अपनी मेहनत करने की जी-तोड़ कोशिश की दास्तां बयान करते हुए अपनी छोटी सी दुकान खोल रहा था। न जाने क्यों अनायास मेरा मन एक पल के लिए ठहर सा गया। 

मैंने अपने ड्राइवर को थोड़ी दूर ही गाड़ी किनारे लगाने को कहा और उतर कर खुद-बखुद कदम उस तरफ बढ़ा दिए। पानी लगातार अपनी अविरल धारा से इस धरती को सराबोर करने में मगन था। आज जैसे आसमान ने भी होड़ मचा ली थी कि उससे ताकतवर कोई नहीं और वो दादा भी जैसे इससे लड़कर एक हौंसले को बनाये रखे थे, जैसे कह रहे हो मैं तेरे कहर से डर कर पीछे नहीं हटने वाला। 

मैं अब तक सर झुका के उसकी झोपड़ीनुमा दुकान में प्रवेश कर चुकी थी। मैंने अपने सिपाही को इशारे से पहले ही अपने साथ आने से मना कर दिया था ताकि मैं एक आम इंसान बनके उससे बात कर सकूँ। और मुझे वहाँ कोई नहीं पहचानता था। मैंने बिना अपने बारे में बताए उनसे बात करने की ठानी।

दादा पकौड़े बनाने के लिए चूल्हे पर कढ़ाही रख चुके थे और एक तपेली में चाय बनाने की तैयारी दिख रही थी। दो-तीन लोग पहले ही शायद चाय का बोल चुके थे। तभी दादा ने मुझे देखते हुए कहा पधारो बाईसा अठे बिराजो। एक लकड़ी की टूटी बेंच की तरफ इशारा कर उन्होंने मेरा स्वागत बहुत प्यार से किया था। मेरी नजरें तब तक उनके चेहरे पर आए भाव पढ़ चुकी थी। तभी वो बोले काई लोगा बाईसा...???(क्या लोगी बाईसा) 

बस कुछ खाने का मन नहीं था फिर भी बोला 'दादा पकौड़े दे दो।' मन लगातार द्वंद्व कर रहा था कि कहाँ हम लाख का आंकड़ा छूने वाली तन्ख्वाह हर माह पाते हैं और कहाँ से अपनी रोजमर्रा की जरुरतों को बमुश्किल पूरा करने की जद्दोजहद करता हुआ लगभग 65-70 बरस का बूढ़ा दादा। मैंने वैसे ही बात करने की गरज से पूछा 'दादा घर में कौन-कौन है...???'

एक नानो (लड़का) है बाईसा उ भी बाजू वी ग्यो (अपनी पत्नी के साथ अलग रहता है) घरवाली है बाईसा वा भी घणी (बहुत) बीमार रे है। फिर खर्च कैसे चलता..??

'और जमीन..??' वह वोला 'बाईसा घरवाली की बीमारी में खेत बिकी गयो और अभे काई भी कोणी (और अब कुछ भी नहीं)।' 

मैंने पूछा 'क्या हुआ दादी को...???' 'किडनी खराब वईगी..... ' 'उफ्फ्फ' कहीं से मेरे अंदर कुछ दरकता सा हुआ महसूस हुआ....न जाने क्यों भगवान तकलीफ के लिए ऐसे कैसे किसी गरीब व्यक्ति को चुन लेता है...!!!!

मैंने पूछा 'आप कभी कलेक्टर ऑफिस नहीं आये मदद के लिये...????' 
बाईसा नरा (बहुत) चक्कर लगाया, पर काई नी वयो (कुछ नहीं हुआ)। और जिस कातर नजरों से उन्होंने मेरी तरफ देखा था वो हम जैसे अधिकारियों के लिए लानत से कम नहीं थी। मैंने दादा को पकौड़े के पैसे दिए और वापस अपनी गाड़ी की तरफ कदम बढ़ाते हुए गाड़ी तक पहुँचते हुए अपने मोबाईल में उस हल्के के पटवारी का नम्बर डायल कर चुकी थी। 

आज सुबह ऑफिस पहुँचने से पहले ही पहला फोन मेरा उन दादा के बीपीएल राशनकार्ड की रिपोर्ट की अपडेट के लिए ही था। और पहला साइन भी उस आदेश के लिए था फलाँ-फलाँ माँ को किडनी खराब होने की वजह से शासन की योजना में गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने से नि:शुल्क इलाज हेतु राशनकार्ड बनाया जाता है। और मेरे पटवारी को कहती हूँ कि दादा से कहना आपका हाथ सरकार ने थामा है आप हिम्मत नहीं हारना और इस बीमारी को हरा कर आगे बढ़ना। और हाँ वो दादा नहीं जानते कि उनके यहाँ पकौड़े किसने खाये थे और मैं कौन हूँ..... मेरे आँखों में आज फिर से नमी थी और मन में सुकून था कि मैं किसी के लिए अजनबी ही सही पर आँखों में उम्मीद की किरण तो जगा पाई...!

और जाने से पहले     
दर्द तो सबके एक से ही होते हैं, बस कोई सहन कर के उभर जाता है, कोई टूट कर बिखर जाता है बस बात नजरिये की है... तो आप कब थाम रहे हैं किसी का हाथ..!

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