गन्दी करतूत पर महिला सांसद खामोश, आज कोई हंगामा, कोई नारेबाजी क्यों नहीं?




कुछ दिन पहले संसद में बहस के दौरान मैने एक शायरी सुनी. मैने ही नहीं शायद पूरे देश ने सुनी और देखी होगी, हालांकि शायर को अपनी गलती का अहसास हुआ और उसने अगले ही मिनट उसमें सुधार किया. संसद में काफी हंगामा भी हुआ और शायर ने दो बार माफी भी मांगी. शायर थे रामपुर के वतर्मान सांसद आज़म खान, ये वही आज़म थे, जिनको महिलाओं के अंतर्वस्त्र भी दिख जाते हैं. बात आई और गयी, लेकिन गौर करने वाली बात ये थी कि सभी महिला सांसदों ने एक स्वर में आज़म का तीखा विरोध किया था. 




सचिन आर पाण्डे  

भी कुछ दिन पहले राष्ट्रवादी, देशहितवादी, नारियों के सम्मान में सदैव तत्पर बीजेपी के नेता और स्वघोषित सन्त स्वामी जी के कई वीडियो वायरल हुए हैं और नारी के सम्मान की बात करने वाली सभी महिला सांसद खामोश हैं, ना कोई हंगामा ना कोई नारेबाजी बस ख़ामोशी. आश्चर्य यह कि विपक्ष की महिला सांसद भी चुप हैं. 



सवाल ये है कि क्या सम्मान केवल सत्तापक्ष या विपक्ष का होना चाहिए? या देश का संविधान जिनको समर्पित है "हम भारत के लोग" जिसमें एक आम लड़की, महिला आती है उसका भी होना चाहिए? आखिर क्यों नेता मौन होते हैं अपनी गन्दी करतूत पर और क्यों वो दल के दलदल से निकलकर विरोध करने की हिम्मत नही जुटा पाते? अगर दल से बड़ा देश है और देश " हम भारत के लोग" से मिलकर बना है तो सबसे पहली वरीयता, सबसे पहली सुनवाई हमारी आपकी होनी चाहिए उसके बाद किसी और की.

सरकार नींद में सो रही है या दम्भ हो गया है, ये कहना मुश्किल है, लेकिन वक़्त चलायमान है और बदलाव इसकी प्रकृति है.

जब सरकार अपनी नीतियों से और आदर्शों से विमुख हो जाती है तो उखाड़ कर फेक दी जाती है.
जो भी गलत करे, उसके साथ वही आचरण होना चाहिए, जो अपराधी के साथ होता है. फिर क्या फर्क पड़ता है वो किस दल का है और उसकी हैसियत क्या है.

समय रहते अगर इस दोहरे चरित्र से निकल सके तो जनता फिर से सत्ता सौपेगी, अन्यथा सरकारें और निजाम बदलते देर नहीं लगती.

तुमसे पहले वो जो इक शख्स यहां तख़्त नशीं था,
उसको भी अपने खुदा होने पे इतना ही यकीं था.

और अंत में यह भी देख लें, क्या प्रतिक्रिया है सोशल मीडिया पर  - 







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