रामदेव और पतंजलि की कठोर आलोचना क्यों जायज़ है?



रामदेव ने लगातार ऐलोपैथ को 'विदेशी षड़यन्त्र' के रूप में पेश किया, लेकिन कभी अपनी प्रिय बीजेपी सरकार से इस पर पाबंदी लगाने की माँग नहीं की। ऐसे में बालकृष्ण का बीमार होकर एम्स जाना उनके फ़र्ज़ीवाड़े का सबसे बड़ा प्रमाण है जिस पर उँगली उठाई ही जानी चाहिए।



पंकज श्रीवास्तव 

कुछ 'मानवतावादी' मित्रों का कहना है कि आचार्य बालकृष्ण बीमार हैं इसलिए उनको या आयुर्वेद को निशाना बनाना अनुचित है। संवेदनहीनता है। जहाँ तक हमारी जानकारी है सभी ने उनके शीघ्र स्वस्थ होने की कामना करते हुए उनके द्वारा अहर्निश फैलाए गए इस फ्रॉड को निशाना बनाया कि 'एलोपैथ पश्चिम का षड़यंत्र है और आयुर्वेद के पास हर मर्ज़ का इलाज है। पतंजलि का ठप्पा लगा गोमूत्र तो कैंसर तक दूर करता है।'



न जाने कितने भोले भाले लोग इस कुटिल प्रचार के चक्कर में पड़कर आधुनिक चिकित्सा पद्धति से चल रहे इलाज को छोड़ पतंजलि के अस्पताल पहुँचे और बुरी तरह छले गए। ऐसे में आचार्य बालकृष्ण को हार्ट अटैक पड़ने या फूड प्वाइज़निंग होने पर एम्स की शरण में जाना उन करोड़ो लोगों के विश्वास से छल है जिन्होंने न जाने कितना पैसा पतंजलि की दवाएँ ख़रीदने में ख़र्च की हैं। उनका अपना पाँच सितारा पतंजलि अस्पताल क्या दूसरों का इलाज करने के लिए ही है? असाध्य बीमारियों के इलाज का दावा करने वाले वहाँ के डॉक्टर क्या सामान्य फ़ूड प्वाइज़निंग का उपचार नहीं कर सकते?

क़रीब 15-16 साल पहले की बात है। लखनऊ में था। वहाँ के एक प्रसिद्ध हृदय रोग विशेषज्ञ ने दुखी होकर बताया था कि उनके एक मरीज़ की रामदेव के चक्कर में जान चली गई। उसने अँग्रेज़ी दवा बंद करके सिर्फ़ योग और पतंजलि के चूरन पर भरोसा किया और खेत रहा। उन दिनों टीवी का विस्तार हो रहा था। रामदेव का शो लोकप्रिय हो रहा था। उनके बड़े बड़े कैंप लगते थे और पार्कों में घूमते गंजे भी नाखून रगड़कर बाल उगने की आशा से वायु विमोचन करते रहते थे। शहर- शहर छोटे रामदेव पैदा हो गए थे। एक बार पिताजी को मलेरिया हुआ तो एक बटुक हमारे घर भी पहुँच गया था। उसने मलेरिया= मल+एरिया बताया और पिताजी को कंबल ओढ़ाकर ठंडे पानी से नहलाने लगा। दो-तीन दिन ऐसे ही बीते। प्राण बचे जब एक चाचा जो डॉक्टर हैं, घर आए। उन्होंने इंजेक्शन और दवाओं से हालत को काबू में किया।



रामदेव और पतंजलि का अपराध भी यही है कि उन्होंने आयुर्वेद और योग के नाम पर अंधविश्वास फैलाया। ऐसा नहीं कि पहले योग और आयुर्वेद नहीं था। पर इनकी सीमाएँ भी स्पष्ट की जाती थीं। हमारे सेंट्रल स्कूल, रायबरेली में योग पाठ्यक्रम में तब से था जब रामदेव तुतलाते रहे होंगे और बीजेपी का जन्म भी नहीं हुआ था। हमें आष्टांगिक योग (यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार , धारणा, ध्यान , समाधि) पढ़ाया गया था। इसका पहला सिद्धांत यम है जिसके तहत योगी को सत्य, अहिंसा और अपरिग्रह को अपनाना होता है। लेकिन रामदेव ने न सिर्फ़ योग को आसनों या कसरत तक सीमित कर दिया बल्कि कारोबार में मुनाफ़े के लिए पतंजलि के उत्पाद को ख़रीदना राष्ट्रवाद से भी जोड़ दिया। 

उनके टीवी विज्ञापनों का भाव यही है कि अगर आप 'देश को विदेशी ग़ुलामी' से बचाना चाहते हैं तो पतंजलि की दवाएँ ही ख़रीदें। गोया डाबर, वैद्यनाथ, ऊँझा आदि तमाम कंपनियाँ विदेशी हैं जो न जाने कब से आयुर्वेदिक दवाओं को प्रचारित-प्रसारित कर रही हैं। इसी राष्ट्रवादी छद्म के छौंक और सत्ता संरक्षण के तहत तमाम राज्यों में मिली सैकड़ों एकड़ ज़मीन की वजह से पतंजलि का कारोबार देखते-देखते आसमान छूने लगा और आचार्य बालकृष्ण का नाम देश के चुनिंदा अमीरों की सूची में आ गया। छद्म राष्ट्रवाद के नाम पर वोट तो बीजेपी ने बटोरा, पर नोट बटोरने में रामदेव जैसी छलाँग किसी ने नहीं मारी (अपरिग्रह की ऐसी की तैसी!)

रामदेव ने लगातार ऐलोपैथ को 'विदेशी षड़यन्त्र' के रूप में पेश किया, लेकिन कभी अपनी प्रिय बीजेपी सरकार से इस पर पाबंदी लगाने की माँग नहीं की। ऐसे में बालकृष्ण का बीमार होकर एम्स जाना उनके फ़र्ज़ीवाड़े का सबसे बड़ा प्रमाण है जिस पर उँगली उठाई ही जानी चाहिए। पृथ्वी शेषनाग के फन और गुरुत्वाकर्षण नियम, दोनों पर नहीं टिकी रह सकती। यह संवेदनहीनता नहीं संविधान की धारा 51-ए का पालन करना है जिसके तहत भारतीय समाज में वैज्ञानिक बोध बढ़ाने का दायित्व निर्धारित किया गया है। क़ानून अंधविश्वास फैलाने को अपराध मानता है।

पुनश्च: ऐसा नहीं कि योगासनों और आयुर्वेद से कोई लाभ नहीं है। हम स्वयं योग करते हैं। पर यह बचाव है उपचार नहीं। सामान्य बीमारियों में आयुर्वेद हो या होम्योपैथ, सब फ़ायदा करता है। चमत्कार भी होते हैं। लेकिन विज्ञान चमत्कारों को एक ही पद्धति से बार बार संभव करने का नाम है। इस लिहाज़ से आधुनिक चिकित्सा पद्धति बाक़ियों से सैकड़ों मील आगे है। जब 'फ़ुल बॉडी चेकअप' की सुविधा है तो नाड़ी देख कर अंदाज़ लगाने वाले वैद्य जी के पास जाने का कोई तुक नहीं है। न ही चेचक निकलने पर 'माता' की पूजा करने का। आधुनिक चिकित्सा पद्धति सभी बीमारियों के अंतिम निदान का दावा नहीं करती लेकिन उपचार के सभी पहलुओं पर प्रकाश ज़रूर डालती है। वहाँ एक सफल प्रयोग के पीछे सैकड़ों असफल प्रयोगों का दस्तावेज़ी सिलसिला होता है। हाँ, तमाम मुनाफ़ाख़ोर कंपनियाँ एलोपैथिक दवाओं के नाम पर लूट का कारोबार भी जमाए हुए हैं, पर सरकार चाहे तो नकेल कस सकती है। वैसे गोबर और गोमूत्र से कैंसर तक के इलाज का दावा जैसा 'पाप' ये कंपनियाँ भी नहीं करती हैं।



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