कश्मकश

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अचानक ही देखा था उसने जब वह उसका हाल चाल लेने पहुँची थी ।ताज़्जुब हुआ था कि conversation reply off था। वज़ह नही समझ सकी थी। पर इस बार दिमाग पर ज़ोर  देना नही चाह  रही थी। जानती थी जाने वालों को रोकना मुश्किल है। फिर जो बिंदास मलङ्ग फ़क़ीर से हो। जिन्हें रिश्तो में उलझने से बेहतर आज़ादी प्यारी होती है। 

खैर हाथों में एक कप coffee औऱ बालकनी में रिमझिम बारिश की हल्की फुहार वातावरण को बेहद खुशगवार बना रही थी। सच कुछ रिश्ते पल भर में साथ छोड़ देते हैं पर एक संबोधन ताउम्र पकड़ बनाएं रहता है। शब्दों के खेल कहें या उनकी पकड़ पल भर में सब धूमिल कर सकती है यह उसने पहली बार जाना था।

संवादों को गरिमामय से उपस्थिति दर्ज करती थी। एक हर्फ इधर उधर नही। सम्मान का पूरा ख़्याल रखा था। फिर कौनसी बात बुरी लगी यह समझना मुश्किल था। 


एक मासूम सा चेहरा पर ग़ज़ब की सुघड़ता औऱ जबरदस्त वक्त का सामंजस्य था उसमें। वह आज  के ज़माने का चेहरा था जिसमें जमीनी धरातल मानसिक रूप से  काफ़ी सुदृढ़ थी। 

वह थोड़े पुराने ज़माने की थी। नाज़ुक, संवेदनशील। ज़माने के साथ चलने की कोशिश में अक्सर अपनी पुरानी नींव से लड़खड़ा ही जाती थी। एक सबक क्या अनेक सबक सीखने को मिलते थे। पर मजाल की सुधर जाएं। 

सच ही तो है रिश्तो के गाम्भीर्य को जितना वह समझ सकी थी क्या हर कोई समझता होगा। ख़ुद के सवाल औऱ खुद के ही जवाब में उलझी #अनु एक लंबी साँस ले यह जानते हुए की उसे दुआओं से सख्त नफरत थी फिर भी उस चहरे को ढेर सारी दुआएं दे अपने पौधों को  यथास्थान रखने लगी। नम आँखे एक बेटे को दुआ औऱ आशीर्वाद के अलावा दे भी क्या सकती थी।

माँ तो सिर्फ माँ ही होती है। इससे श्रेष्ठ संबोधन कोई और हो सकता  हैं क्या? थोड़ी सी लापरवाही से #बटन #गुलाब का  छोटा सा कांटा उसकी ऊँगली  में चुभ गया था। जो आँखो  में रुके आँसू को बहने से नही रोक सका था। 

पौधे को सहलाती हुई वह बुदबुदा रही थी जहाँ भी रहो सलामत रहो...!! बारिश बढ़ चुकी थी गरज़ के साथ भादो मानो रौद्र रूप धारण कर चुकी थी अनु भी अंदर के शोर को काबू करने की कोशिश में black coffe बनाने  के लिए केतली की तरफ बढ़ चली थी Red FM  पर perfect गीत बज रहा था.. जो भावों को औऱ माहौल को एक अज़ीब सी कश्मकश में बांध रहा था। 

कितने अज़ीब रिश्ते हैं यहाँ पर दो पल मिलते हैं साथ साथ चलते हैं जब मोड़ आए तो बचके निकलते हैं. 
- सुरेखा अग्रवाल 
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