आवश्यकता 'मानसिक दासता' से आजादी की


आज जब यह राष्ट्र युवा शक्ति से ओतप्रोत है, यह राष्ट्र विश्व के सबसे शक्तिशाली और अमीर राष्ट्रों में गिरा जा रहा है, संपूर्ण विश्व इसे संभावनाओं के सबसे बड़े केंद्र के रूप में देख रहा है, तब आवश्यकता है एक ऐसी अंदरूनी लड़ाई की, जो मानसिक दासता के खिलाफ हो, जहाँ हम धर्मवाद, जातिवाद, प्रांतवाद एवं अपने भीतर के अंधविश्वास और सबसे प्रमुख पार्टीवाद को समाप्त कर, संकुचित हो रही राष्ट्रप्रेम की भावना को पुनः एक आकार दे सकें और राष्ट्र निर्माण में आ रही बाधाओं को दूर कर सकें. 



भवानी प्रताप सिंह ठाकुर 

''जिस जाति की सभ्यता जितनी पुरानी होती है, उसकी मानसिक दासता के बंधन भी उतने ही अधिक होते हैं. भारत की सभ्यता पुरानी है, इसमें तो शक ही नहीं और इसीलिए इसके आगे बढ़ने के रास्ते में रुकावटें भी अधिक हैं. मानसिक दासता ही किसी भी राष्ट्र की प्रगति के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा होती है.'' 'महापंडित राहुल सांकृत्यायन' ने अपने निबंध 'दिमागी गुलामी' की शुरुआत इसी कथन के साथ की थी. दिन, महीने और दशक बीत गए किंतु राहुल सांकृत्यायन द्वारा कही गयी यह बात आज भी प्रासंगिक है. आज भी हम इस मानसिक गुलामी के बंधनों  से मुक्त नहीं हो पाए हैं. इसी दिमागी दासता की बेड़ियों ने हमें इस तरह जकड़ रखा है, कि हम, अपनी समस्याओं के हल खोज ही नहीं पाते हैं. हमारी आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक समस्या इतनी अधिक और इतनी जटिल हैं कि जब तक हम स्वतंत्रता पूर्वक बगैर स्वार्थ, इन पर विचार करने का प्रयास नहीं करते तब तक इनसे पार पाना असंभव है. 

हम आजादी की 73 वी वर्षगांठ मना रहे हैं. पिछले सात दशकों में देश में अनेक उपलब्धियाँ हासिल की हैं. पिछले दिनों धारा-370 और तीन तलाक को खत्म करना भी देश के लिए किसी बड़ी उपलब्धि से कम नहीं है. 200 वर्षों तक दासता की श्रंखला के बाद, भारतीयों के हाथ पैर लड़खड़ा गए थे. दिग्भ्रांति से जनता पथ विहीन हो गई थी. परतंत्रता ने राष्ट्र को खोखला कर दिया था. शनै- शनै भारतीयों में आत्म बोध हुआ, जन जागृति भी. देश ने एक कड़े संघर्ष के बाद परतंत्रता के बंधनों से मुक्ति पाई और यह राष्ट्र स्वतंत्र हो गया. अंग्रेजों से स्वतंत्रता पाना कठिन था, किंतु इस राष्ट्र ने अपने त्याग और बलिदान के बूते पर यह कार्य करके दिखाया. किंतु, वर्तमान परिस्थितियां पूर्णतः विपरीत हैं. आज हम जिस 'दिमागी गुलामी' के बंदी होते जा रहे हैं, उससे पार पाने के लिए त्याग और बलिदान से ज्यादा जरूरत आत्ममंथन की है. 

आज आवश्यकता है कि इस देश का बुद्धिजीवी वर्ग विचार करे और निष्पक्ष विचार करे. एक गौरवशाली स्वर्णिम इतिहास के लिए भारतीय समाज विभिन्न काल खंडों से गुजरता हुआ आज जिस स्थिति तक पहुंचा है उसमें आशा के बिंदु अधिक हैं, परंतु अनेक ऐसे बिंदु भी है जो चिंता पैदा करते हैं.

आज जब यह मुल्क विश्व के सबसे शक्तिशाली राष्ट्रों की सूची में पांचवें पायदान पर आकर खड़ा है. तब आज इस बात को नकारा नहीं जा सकता, कि आज हमारे अंदरूनी शत्रु हम पर हावी हो रहे हैं. इस अंदरूनी लड़ाई में नक्सलवाद, प्रांतवाद, सीमावाद, जाति एवं पंथ के नाम पर खींची जा रही रेखाएं, आज इस देश की सबसे बड़ी समस्या बन चुकी है. राजनीतिक मंचों से बात अक्सर कही जाती है कि इस देश की प्रगति में सबसे बड़ी बाधा भ्रष्टाचारी और घूसखोरी है. जो सच भी है.

किंतु क्या यह सच नहीं, कि इस देश की प्रगति में सबसे बड़ी बाधा, इस देश की राजनीति ने खड़ी की है? वो ओछी राजनीति, जहाँ देश के राजनीतिक दल अपने निजी हित के लिए नित नए शब्दों का अविष्कार कर देश की जनता को उनके मतलब समझाने में कोई कसर नहीं छोड़ते.  हिंदू मुस्लिम, अगड़े-पिछड़े, दलित और अब तो महादलित जैसे शब्द भी केवल अपने राजनीतिक फायदे के लिए इजाद किए गए और इनका अर्थ भी अपने राजनीतिक हित के अनुरूप देश की जनता को समझाया गया. यह वह कटु जमीनी यथार्थ है जिसे झुठलाया नहीं जा सकता है. परिणाम स्वरूप वह राष्ट्र जो विश्व में कौमी एकता की सबसे बड़ी मिसाल कहा गया, वो राष्ट्र जिसके बारे में कहा जाता है कि यहां मानव नहीं मानवता बस्ती है. 

वह राष्ट्र जो -
''अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम् 
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्
के मूल मंत्र के साथ अर्थात - यह अपना बन्धु है और यह अपना बन्धु नहीं है, इस तरह की गणना छोटे चित्त वाले लोग करते हैं. उदार हृदय वाले लोगों की तो (सम्पूर्ण) धरती ही परिवार है.'' की भावना लिए संपूर्ण पृथ्वी को ही अपना परिवार कहता है. 

वो देश जो - 
सर्वे भवन्तु सुखिनः ,सर्वे सन्तु निरामयाः.
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चित् दुःख भाग्भवेत्॥ 
भावना लिये सभी का कल्याण चहता है. उसी राष्ट्र में आज धर्म, जाति, मजहब के नाम पर आए दिन भीड़तंत्र का न्याय देखने को मिलता है. राजनीतिक दल इसे भी एक धर्म और जाति के सांचे में ढाल अपने सियासी फायदे तलाशने लगते हैं.

राजनीतिक स्वार्थ के दलदल में फंसे हुए लोग सामाजिक मतभेद की खाई को पाट नहीं सकते, उसे गहरी अवश्य बना सकते हैं. वे समाज में एकात्मकता उत्पन्न नहीं कर सकते, समाज को नष्ट करने का उपक्रम जरूर कर सकते हैं. 

आजादी के 73 वर्ष बाद जब यह देश मंगल और चांद पर कदम रख रहा है. तब इसी देश में मॉब लिंचिंग जैसी घटनाएं प्रतीक है, उस 'मानसिक दासता' की जिससे राष्ट्र आज जूझ रहा है. राजनीतिक क्षेत्र के मध्य से सामाजिक एकता साध्य नहीं हो सकती. हमें संस्कृति, एक दूसरे के प्रति तादात्म्य, प्रेम तथा सहकार्य के आधार पर यह कार्य करना पड़ेगा. इस कार्य में सबसे अहम भूमिका किसी सरकार की नहीं अपितु इस देश में जनता की है. किंतु यह 'मानसिक दासता' के बंधन है, जो इस देश की जनता को भी जाति, धर्म और मजहब की बेड़ियों में जकड़ कर रखते हैं.

गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं की "हित अहित पशु-पक्षीहू जाना" अर्थात अपना हित और अहित तो पशु-पक्षी तक जानते हैं. फिर मानव तो एक बुद्धिजीवी प्राणी है, वह इसमें फर्क क्यों नहीं कर पाता? आज भारत में लगभग 75 फीसदी से अधिक आबादी शिक्षित है, यह वर्ष 1948 के 18% से तो बहुत बेहतर परिस्थिति है, किंतु वर्तमान समय में यह प्रबुद्ध वर्ग भी जनता को भ्रमित करने का हथियार मात्र बनकर कर रह गया है. क्योंकि, आज किताबी ज्ञान तो सभी के पास है किंतु वह नैतिक ज्ञान जिसकी आवश्यकता ज्यादा होती है वो कहीं नहीं.

भारत वह देश जिसकी 65% आबादी युवा है. विश्व का सबसे युवा देश कहलाने वाला यह राष्ट्र, अपने भीतर वह शक्ति, सामर्थ्य और ऊर्जा रखता है. जिससे यह हर असंभव कार्य को भी संभव कर सकता है. किंतु दुर्भाग्य ये है, कि जो राष्ट्र चांद पर चहलकदमी कर रहा है, उस राष्ट्र का युवा वर्ग भ्रमित है. शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की कमी से जूझता युवा वर्ग, जिसे हिंदू - मुस्लिम, दलित - स्वर्ण, अगड़े- पिछड़े की बेड़ियां तोड़ने का दायित्व अपने कंधों पर लेना चाहिए था. वह आज सड़कों पर स्वयं को पिछड़ा साबित करने के लिए आंदोलन करने में लगा हुआ है. जो वर्ग यहां से बचा वो विदेश भागने की फिराक में घूम रहा है. 

पश्चिमी प्रभाव ने इस देश के युवा को न केवल भ्रमित किया है, अपितु नशे की लत और आत्मघाती प्रवृत्ति भी विकसित कर दी है. पश्चिमी राष्ट्रों में जन्मे गैजेट और सोशल वेबसाइटों ने आज भारतीय युवा वर्ग को दिमागी रूप से बंदी कर लिया है. वे 'पश्चिमी राष्ट्र अब धीरे-धीरे आध्यात्मवादी होते जा रहे हैं.ʼ वो भारतीय युवा वर्ग जिससे विवेकानंद होने की अपेक्षाएँ हैं, उसकी जिज्ञासा, उसकी मुखरता कहीं खोती जा रही है? उसके अंतस में प्रश्नों का लोप हो रहा है? समाज के प्रति उसकी प्रतिबद्धता जीर्ण होती नजर आ रही है.  

'मानसिक दासता' की बेड़िया समाज के हर अंग को प्रभावित करती हैं. आजादी के 73 वर्ष बाद भी हमारी समस्याएँ कम नहीं हुई है. एक ओर जहाँ ये राष्ट्र 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था की ओर कदम बढ़ाने के सपने देखता है. वहीं पूरी दुनिया में भूख से पीड़ित कुल आबादी मे से लगभग 25 फ़ीसदी आबादी भी भारत में ही रहती है. विडंबना तो यह है कि सबसे अमीर राष्ट्र की सूची में भारत का स्थान 6 वां है. 
             
एक ओर यह राष्ट्र विश्व के अमीर राष्ट्रों में भी गिना जा रहा है, और वहीं इस राष्ट्र को भुखमरी से ग्रसित राष्ट्रों की सूची में भी रखा गया है. क्या कारण है कि विश्व के छट्वे सबसे अमीर देश में 20 करोड़ लोग कुपोषण के शिकार हैं? वैश्विक खाद्य सुरक्षा सूचकांक 2018 की रिपोर्ट के मुताबिक देश में 22 करोड़ 46 लाख लोग कुपोषण का शिकार हैं. संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के मुताबिक भारत में 40 फ़ीसदी खाना बर्बाद हो जाता है. इन्हीं आंकड़ों में कहा गया है कि यह उतना खाना होता है जिसे पैसों में आंके तो यह 50 हज़ार करोड़ के आसपास पहुंचेगा. देश के सक्षम लोगों का असक्षम और असहाय लोगों के प्रति संवेदना हीन होना देश में भुखमरी जैसी समस्याओं को जन्म दे रहा है. वैषम्य कि अग्नि देश में चारों ओर धधकने की अवस्था में आ गई है. ऐसा प्रतीत होता है कि समानता कहीं किसी कोने में जाकर सो गई हो. 

आज जब विश्व के अधिकांश देश भारत को उम्मीद भरी निगाहों से देख रहे हैं, तब इस देश के सामने सबसे बड़ी समस्या है पार्टीवाद. एक लोकतांत्रिक देश में विभिन्न राजनैतिक संगठनों का विशेष महत्व होता है. यह राजनैतिक दल ही उस राष्ट्र की उन्नति में महत्वपूर्ण सहायक होते हैं. किंतु विगत कुछ वर्षों में राजनीतिक संगठनों द्वारा अपने राजनीतिक फायदे के लिए देश हित की भावना को जिस तरह ठुकराया जा रहा है. उसे देख ऐसा प्रतीत होता है कि इस देश को जितना खतरा जातिवाद, संप्रदायवाद और पड़ोसी देशों से है. उससे कहीं ज्यादा खतरा इस बढ़ते हुए पार्टीवाद से है. 

एक ओर जब भारत वैश्विक स्तर पर अपनी धाक जमा रहा है. तब आज देश को आवश्यकता है अंदरूनी एकात्मकता की. इतिहास गवाह रहा है कि जो राष्ट्र एकत्र रहा, संगठित रहा वह राष्ट्र सदैव हर मुद्दे पर विजयी रहा है. लेकिन हम वैश्विक स्तर पर स्वयं को चाहे जितना ही मजबूत बना ले, जब देश के भीतर से ही विरोध की आवाजें आने लगे तब वैश्विक स्तर पर राष्ट्र का पक्ष सदैव कमजोर ही साबित हुआ है, क्योंकि हमारे आपसी मतभेद ही अन्य राष्ट्रों को हम पर उंगली उठाने का मौका दे देते हैं. 

आज जब यह राष्ट्र युवा शक्ति से ओतप्रोत है, यह राष्ट्र विश्व के सबसे शक्तिशाली और अमीर राष्ट्रों में गिरा जा रहा है, संपूर्ण विश्व इसे संभावनाओं के सबसे बड़े केंद्र के रूप में देख रहा है, तब आवश्यकता है एक ऐसी अंदरूनी लड़ाई की, जो मानसिक दासता के खिलाफ हो, जहाँ हम धर्मवाद, जातिवाद, प्रांतवाद एवं अपने भीतर के अंधविश्वास और सबसे प्रमुख पार्टीवाद को समाप्त कर, संकुचित हो रही राष्ट्रप्रेम की भावना को पुनः एक आकार दे सकें और राष्ट्र निर्माण में आ रही बाधाओं को दूर कर सकें. 

यह देश सदियों से विश्व का गौरव बना रहा है. परिस्थितियां बदली, समय बदला और समय के साथ इस देश की विचारधाराओं में परिवर्तन भी आते रहे. लेकिन हम आज भी अपने मूल सिद्धांतों को नहीं भूले हैं. समय के साथ साथ हमने अपने आप को परिवर्तित किया और अपनी बुराइयों को स्वयं तलाश कर उन्हें खत्म कर स्वयं को आधुनिकता से सुसज्जित किया है. हमें अपनी मानसिक दासता की बेड़ियों की एक-एक कड़ी को बेदर्दी के साथ तोड़कर, एक मानसिक क्रांति की ओर बढ़ना है, जिसके लिए यह राष्ट्र धीरे- धीरे स्वयं को तैयार भी करेगा.

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