प्राण जाए पर कुर्सी ना जाए, उत्तराखंड के सीएम रावत के लिए इंसान जाए भाड़ में, पहले कुर्सी बचानी जरुरी


कुर्सी बचाना जरुरी है या इंसान? यह सवाल अगर उत्तराखंड प्रदेश के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत से पूछा जाए तो वह यही कहेंगे कि इंसान जाए भाड में, पहले कुर्सी बचानी जरुरी है। इसको उन्होने आज साबित भी कर दिखाया है। 




आकाश नागर 

से समय में जब उत्तराखंड आपदा की चपेट में है। 19 लोग अब तक मर चुके हैं और दर्जनों गायब हैं। नदिया उफान पर हैं और गाड गधेरे बाढ के पानी से तितर बितर हो रहे हैं। लोग आपदा के भय से सो नही रहे हैं। पूरी पूरी रात जागकर वह अपने परिवारों की रक्षा कर रहे हैं। ऐसे में जनता की सुरक्षा करने की बजाय सूबे का हाकिम जनता को भगवान भरोसे छोडकर दिल्ली के लिए उड जाए तो इसे आप क्या कहेंगे? 



स्वाभाविक है कि आप कहेंगे कि यह संवेदनहीनता है। आखिर इस देवभूमि में ऐसे संवेदनहीन सियासतदाओ को हम हाकिम कैसे कबूल रहे है ? क्यों नही प्रतिकार करते है ?

करे भी तो क्यों ? क्योंकि यह देवभूमि उत्तराखंड की जनता है, जो प्रतिकार करने की हिम्मत नही जुटा सकती है, लेकिन त्राहि-माम, त्राहि-माम जरूर कर सकती है। और पिछले 19 सालो से जनता कर ही क्या रही है?
 इसे ही शायद अब इस जनता ने अपनी नियति मान लिया है। अपने आप पर थोपे गये त्रिवेंद्र सिंह रावत जैसे संवेदनहीन सियासतदाओ को ही अपना भाग्य विधाता मान लिया है ?

लेकिन याद रखिए कि उसकी लाठी में आवाज नही होती है। 2013 की आपदा में भी एक ऐसा ही मुखिया जनता को मूर्ख बनाने के लिए सत्ता पर कब्ज़ा किए बैठा था। जो केदारनाथ की आपदा में जान गवा रहे हजारों लोगों की लाशो पर अट्टहास कर रहा था। लेकिन उस पर उप्पर वाले की ऐसी मार पडी थी, जिससे वह आज तक उबर नही पाया है। शायद ऐसा ही कुछ होने का इंतजार देवभूमि उत्तराखंड की निराश, उदास और हताश जनता कर रही है ...
Share on Google Plus

News Digital India 18

पाठकों के सुझाव सदा हमारे लिए महत्वपूर्ण है ..

0 comments:

Post a Comment

abc abc