हम तो आदिवासी हैं साहेब

आज आदिवासी दिवस पर विशेष 
सभी बहन-भाईयों को बहुत बहुत शुभकामनाओं के साथ


दोस्तो, अभी कुछ दिन पहले मेरे एक जाति भाई ने मुझे 'जय भीम' बोलने के लिए कहा। मैने उसे कोई जवाब नहीं दिया। उसने मुझे फिर लिखा 'दीदी आप जय भीम क्यों नहीं बोल रहीं। मैने कोई जवाब नहीं दिया। उसने फिर लिखा अगर हम आदिवासी हैं तो हमे 'जय भीम' बोलना चाहिए। 


श्रीमती लक्ष्मी गामड़        
संयुक्त कलेक्टर रतलाम         

ज इस विषय की प्रासंगिकता की चर्चा करने के लिए मुझे कलम क्यों उठानी पड़ी, क्योंकि अब वक्त आ गया है कि हम आदिवासी मुखर हो जायें।

"जब में Dy.Coll. बन गई। तब लोगों ने यही कहा कि आदिवासी है इसलिए आरक्षण का लाभ मिला। मैं उन कुलीन लोगों को बताना चाहूंगी कि प्रतिभा किसी की मोहताज नही होती क्योंकि मैंने जनरल की सीट पर कब्जा किया था। यही मेरा उन लोगो के लिए करारा जवाब था।'

दोस्तों अभी कुछ दिन पहले मेरे एक जाति भाई ने मुझे 'जय भीम' बोलने के लिए कहा। मैने उसे कोई जवाब नहीं दिया। उसने मुझे फिर लिखा 'दीदी आप जय भीम क्यों नहीं बोल रहीं। मैने कोई जवाब नहीं दिया। उसने फिर लिखा अगर हम आदिवासी हैं तो हमे 'जय भीम' बोलना चाहिए। मैंने उससे पूछा इससे क्या होगा, वो बोला अगर आप समाज की सेवा करना चाहते हो तो आपको यह खुलके बोलना चाहिए। खैर बात आई गई हो गई।पर मेरे जेहन में यह सवाल गूँजता रहा क्या मेरे सिर्फ जय भीम बोलने भर से क्या मैं इस आदिवासी समाज का प्रतिनिधित्व कर पाऊँगी। शायद नही।

अभी 2-3 दिन पहले मैंने फेसबुक पर देखा मेरी भांजी बरखा बघेल बड़ी अपसेट होकर किसी से उलाहना कर रही थी कि उन लोगो ने उसे नीचा दिखाने के लिए उसकी योग्यता को ना देखकर उसके व्यक्तिगत जीवन पर कोई टिप्पणी की हैं। बेटा ये लातों के भूत बातों से नही समझते। यहां आज गाँधी की कौन सुनता हैं, इसीलिए मेरे आदर्श हमेशा भगतसिंह,सुखदेव और आजाद रहे हैं। तो आज यही दो प्रसंग के कारण में जीवन का वो सच बयां कर् रही हूँ जिसे मेरे आदिवासी भाई-बहनों को जानना बहुत जरुरी हैं।

चलिये मैं शुरू से ही शुरू करती हूं। जब में महज 6-7 साल की छोटी बच्ची थी तब हम आंगन में बाहर सभी बच्चे खेला करते थे। मैं देखती थी कि जब हम धूल -मिट्टी में उन्मुक्त होके खेलते रहते थे तब हमारे कुछ पडौसी के बच्चे हमे दूर से देखते रहते।वही बच्चे जब स्कूल में मिलते तो बड़े घुल मिलकर रहते। मैं उनसे पूछती की तुम घर पे हमारे साथ क्यों नही खेलते ,तब वो कहते हमारी मां नही खेलने देती है वो कहती है कि ये छोटे लोग है छोटी जाति के लोग है। तब बाल मन कभी समझ नही पाया ये छोटी जाति क्या होती है।

फिर पापा का कठ्ठीवाडा से ट्रांसफर हो गया हम नई जगह आ गए यहाँ में 4 थी में आ चुकी थी।मुझे अब भी याद हैं उन दिनों हमारे घर (पेटलावद) में लाल चावल बोया जाता था और आप तो जानते ही हो की गरीबी क्या होती है। हमारे यहां वो लाल चावल बनाये जाते थे और माँ उनमे गुड़-घी डाल के देती थी।मेरे कुछ दोस्त वो चावल खाने के लिए अक्सर मेरे घर आ जाते थे।एक दिन मेरी एक सहेली को चावल खाते उसके भाई ने देख लिया फिर उसकी घर पे पिटाई हुई।पूछने पर पता चला हम छोटे लोग है इसलिए हमारे यहां का खाना नही खाया जा सकता।अब तक में थोड़ा बड़ी हो चुकी थी कुछ समझ आने लग गया था।

ऐसे ही जिज्ञासावश मैने पापा से पूछ लिया -पापा ये छोटे लोग क्या होता हैं, और हमे आदिवासी क्यों कहते है,ये आदिवासी कोन होते है जिससे लोग दूर रहते है।पापा बोले बेटा भगवान ने तो सबको बराबर बनाया है पर इस समाज के कुछ कर्णधारों ने छोटे बड़े की जम्मेदारी ले रखी हैं। हम आदिवासी इसलिए है कि ये भारत माता की भूमि ही हमारी जन्म भूमि हैं हम आयातित लोग नही हैं। और हमारे वंशज आदिकाल से निवास करते आ रहे है इसलिए हमें आदिवासी कहते है। और बेटा जिनका अपना वजूद होता है, जिनकी अपनी अलग पहचान होती है, हमारी ईमानदारी, सच्चाई, और कठोर काम करने ताकत ही हमे आदिवासी होने का गौरव प्रदान करती है। ओह तो ये बात है। पापा की बात मन में गहराई तक घर कर् गई थी। फिर जीवन मै कई अवसर आये जहां मुझे अपनी जाति की वजह से पक्षपात का शिकार होना पड़ता था। पर मैं भी कहाँ मानती थी आदिवासी जो ठहरी। हम तो चोरी भी करते है तो बड़ी ईमानदारी से साहेब। सामने वाले की बढ़िया ठुकाई पिटाई करके ही माल लिया जाता हैं।

मेरा बचपन इसी जिद के साथ हर चुनोती को स्वीकार कर् गुजरता जा रहा था।उस समय दौड़ ,गोला फेक,भाला फेक,कब्बडी,खो-खो,निबंध,भाषण यहां तक की सुगम संगीत में भी सिर्फ एक ही नाम का सिक्का चला लक्ष्मी।मैं उन कुलीन लोगो को बता देना चाहती थी की हा मैं आदिवासी हूं पर योग्यता में तुमसे बेजोड़ हूं। जिन लोगो ने मेरा बचपन देखा हैं वो इस बात से 100% इत्तेफाक रखते है। मैं भीड़ में एक जाना पहचाना नाम बन चुकी थी फिर भी संघर्ष का दौर जारी था।

फिर मेरी शादी हो गई बेशक हम दोनों की जाति अलग- अलग हैं। यहां भी मुझे जातिवाद की ओछी मानसिकता का शिकार होना पड़ा। पति से कहा जाता किसी को बताना नही ये कौन जाति की है। वो लोग जो मेरे हाथों से बने भोजन को चाट-चाट के खाते थे उन्हें मेरी शक्ल देखते ही याद आ जाती की मैं भील हूं। जो योग्यता में मेरे10% भी नही ठहरते थे वो मेरा मूल्यांकन करते थे। मेरे देवर मुकेश द्वारा मेरे उन दोस्तों को कहा जाता कि देखो वो भीलड़ी सातवें आसमान में उड़ रही हैं। पर हाँ मुझमे वो धैर्य था कि मैं वक्त आने पर मुंह से नही अपने काम और नाम से जवाब दे सकूँ। मैं पढ़ाई करती रही और आगे बढ़ती रही।

मैं टीचर बन गई और उन लड़कियों को आगे बढ़ाया जो समाज में उसी पक्षपात की शिकार होती थी। और एक दिन वो वक्त भी आ गया जब में Dy.Coll.बन गई। तब लोगों ने यही कहा कि आदिवासी है इसलिए आरक्षण का लाभ मिला। मैं उन कुलीन लोगों को बताना चाहूंगी कि प्रतिभा किसी की मोहताज नही होती क्योंकि मैंने जनरल की सीट पर कब्जा किया था। यही मेरा उन लोगो के लिए करारा जवाब था।

जब मैं ज्वाइन के पहले भोपाल गई तो मुझे वेरिफिकेशन के लिए सामान्य प्रशासन के मुख्य सचिव से मिलने का अवसर मिला।विजिट पर्ची पर लक्ष्मी गामड़ देख कर् उन्होंने पूछा की आपके (दो-तीन मेरे रियल रिश्तेदार) वो क्या लगते हैं और पूछते वक्त उन्होंने मेरा सरनेम गामौड लिया ।

(आप को बता दूं ये हमारे यहाँ ब्राह्मण जाति में आते हैं।)मैने कहा - सर गामौड़ नहीं मेरा सरनेम गामड़ है और मैं आदिवासी हूं ना की ब्राह्मण। वो मुझे अवाक् देखते रह गए, क्योंकि अब वो मेरे कथित रिश्तेदारों का राज जान चुके थे जो ब्राह्मण बने पड़े थे।

अब एक किस्सा और है जब मैं पहली बार मन्दसौर पति के साथ ज्वाइन करने गई तो कलेक्टर सर ने एक और समकक्ष महिला अधिकारी से मिलवाते हुए कहा नई आई है इसे अपने साथ रख के काम सिखाना है। जब हम उससे मिलने चेम्बर की तरफ पहुँचे तो वो किसी से कह रही थी अरे वो नई डिप्टी कलेक्टर को देखा कैसी काली कलूटी ,नाटी सी है और उसका हसबैंड माय गॉड टू हॉट..जरूर उस लड़की ने फंसाया होगा ये आदिवासी लोग होते ही ऐसे जादूगर है किसी को भी अपने जाल में फंसा लेते हैं। हर जगह आपको सिर्फ एक जाति को देखकर अयोग्य मान लिया जाता है।

मेरा सफर चलता रहा मुश्किलें आती रही मै उन्हें पार कर् आगे बढ़ती रही।फिर चाहे कोई प्रोजेक्ट बनाना हो,इलेक्शन,छापा डालना हो या किसी की पिटाई करनी हो सब में अव्वल आगे रहने की जिद जो थी। आज मध्य-प्रदेश का ब्रांड नाम हूं। डीजी शील्ड हो या यूथ आइकॉन अवार्ड हो ये सब मैने योग्यता से जीते है, न की जाति से।

मैने बचपन मे ही ठान लिया था कि ये जो आज मेरे सामने लोग खड़े होकर ख़ास बनने का दावा करते है वो एक दिन मेरे लिए आम हो जाये वो ऊंचाई मुझे पाना है। मेरी मेहनत,लगन और हार ना मानने की जिद ने मुझे आखिर ख़ास बना ही दिया,आज वही लोग जो मेरा मजाक उड़ाया करते थे मुझे देख के अनदेखा करते थे मुझसे मिलने के लिए मेरे स्टेनो से समय लेना पड़ता है उन्हें क्योकि उन्ही कथित ख़ास लोगों के लिए एक आम आदिवासी लड़की ख़ास बन गई है।

पापा आपसे किया एक वादा कि मैं कभी अपनी पहचान नही बदलूंगी फिर चाहे मुझे सब खोना ही क्यों ना पड़े,वो पूरा कर् दिया ।राज को भी धन्यवाद की जीवन के इस संघर्ष मे वो साया बन साथ चले। मैं अपने नाम (लक्ष्मी गामड़) के साथ अपना वजूद बनाये रखूं की पापा की अंतिम ईच्छा पूरी हो गई पापा आज मुझे लोग आपही के नाम से जानते है,मैने आपका सपना सच कर् दिया ।देखो पापा आज मुझे अपने आदिवासी होने पर गुमान हैं और मुझे कोई नकली पहचान नही चाहिए ।

और हा मुकेश आज मेरा जवाब तुम्हारे लिए ये हैं कि तुमने तो मुझे सिर्फ सातवे आसमान में उड़ने का ताना मारा था पर देखो इस भीलन ने वो सुर्खाब के पर पा लिए जिससे वो सातवे नही ग्यारहवे-बारहवें आसमान पे उड़ने की ताब रखती हैं। जातिवाद के उन ठेकेदारों को मेरा यही कहना है कि हम आदिवासी के लिए(शबरी ) तो भगवान राम को भी जमीन पे आ के झूठे बैर खाने पड़े। ऐसी ही हमारी भक्ति,शक्ति,और नीयत हैं। 

और अंत में यह संदेश उस मेरे दोस्त के लिए जो ये कहता है कि भीम की जय बोलने से हम अपने समाज का उद्धार कर देंगे तो ऐसा नही है मेरे दोस्त कुछ काम को ख़ामोशी से ही अंजाम दिया जाता हैं।

और बेटा बरखा लोग हमें जज क्यों करें, हम उनको यह अधिकार क्यों दे। यहाँ तो अपनेआप को अपना मूल्यांकन करना चाहिए। इसी से साबित होगा की हम औरो से बेहतर हैं। जवाब दो उन मक्कारों को जो तुम्हें जाति के आधार पर आंकते हो।

मेरा ये लेख मेरे सभी आदिवासी बंधूओ को समर्पित हैं और गर्व से कहो 'हम तो आदिवासी हैं साहेब।'

और अंत में  
"कभी किसी के बचपन को देखके उसका मूल्यांकन मत करना दोस्तों
ना जाने कब आपको उससे मिलने के लिए विजिट कार्ड देना पड़े.."

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