मुख्यमंत्री का खून बहाने की धमकी के बाद गिरफ्तार पूर्व विधायक सुरेन्द्रनाथ सिंह ने लिखा कमलनाथ को खत


भोपाल एमपी नगर में नगर निगम द्वारा चलाई जा रही अतिक्रमण विरोधी मुहिम को लेकर दिए बयान पर पुलिस ने अतिक्रमण कराने के लिए प्रसिद्द पूर्व विधायक सुरेन्द्रनाथ सिंह को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया है. बयान में पूर्व विधायक सुरेन्द्रनाथ सिंह ने मुख्यमंत्री का खून बहाने तक की धमकी दे दी. और अब गिरफ्तारी के बाद मुख्यमंत्री कमलनाथ को लंबा खत लिखा है. पत्र में वे लिख रहे हैं प्रशासन अतिक्रमण-विरोधी मुहिम की आड़ में केवल छोटे गुमठीधारियों और खोमचे वालों के साथ अत्याचार हो रहा है. मैं अतिक्रमण का समर्थक नहीं हूं. ना मैं सड़क पर हर कहीं गुमठी, ठेले लगाने का समर्थन करता हूं. ये रहा-  

आदणीय कमलनाथ जी,
मुख्यमंत्री,
मध्यप्रदेश शासन

प्रणाम। यह पत्र पीड़ा से वशीभूत हो कर लिख रहा हूं। यह उन गरीब परिवारों का मामला है, जो आजीविका के लिहाज से अराजकतापूर्ण अनिश्चितता के मुहाने पर ला दिये गये हैं। भोपाल स्थित महाराणा प्रताप नगर के जोन एक और दो में प्रशासन अतिक्रमण-विरोधी मुहिम संचालित कर रहा है। इस कदम की आड़ में केवल छोटे गुमठीधारियों और खोमचे वालों के साथ जो अत्याचार हो रहा है, उसकी ओर किसी का ध्यान नहीं जा रहा। ये वे लोग हैं, जो अल-सुबह से लेकर देर रात तक रोजाना कहीं समोसा-कचौड़ी तो कहीं चाय-पोहा इत्यादि बेचकर अपने परिवार का गुजारा करते हैं। एमपी नगर बड़ा व्यावसायिक क्षेत्र है, इसलिए ऐसे खाद्य पदार्थों की बिक्री के वहां समुचित अवसर उपलब्ध हैं। मैं अतिक्रमण का समर्थक नहीं हूं। ना मैं सड़क पर हर कहीं गुमठी, ठेले लगाने का समर्थन करता हूं। आरम्भ से ही मेरा यह आग्रह रहा है कि इन बहुत छोटे स्तर के लोगों को हटाए जाने से पहले उनके उचित पुनर्वास का पूर्ण एवं मानवोचित प्रबंध किया जाए। आपको स्मरण होगा कि मैंने अपनी पार्टी की सरकार के रहते हुए भी हबीबगंज नाका क्षेत्र में अतिक्रमण हटाए जाने का इसी आधार पर पुरजोर विरोध किया था। यही भाव लेकर आज मैं यह पत्र आपको प्रेषित कर रहा हूं।

आदरणीय, पोहे, जलेबी या चाय बेचने वालों को शहर की भीड़ से दूर सूनसान में दाना-पानी क्षेत्र में भेजने का निर्णय क्या उनका समुचित पुनर्वास कहा जा सकता है? सोचिए कि उस जगह पर क्या इस तरह के व्यवसाय किसी भी तरह से जीवित रह पाएंगे? जो लोग इतनी मेहनत के बावजूद दिन-भर में बमुश्किल कुछ सौ रुपए का मुनाफा अर्जित कर पाते हैं, क्या उनसे यह उम्मीद की जा रही है कि व्यवसाय निर्बाध रूप से संचालित करने के लिए वे एमपी नगर में लाखों रुपयों की दुकान खरीदें अथवा किसी कॉम्पलेक्स में महंगा ऑफिस खरीद कर वहां इन पदार्थों की बिक्री करें? फिर मेरी आपत्ति इस मुहिम के निष्पक्ष न होने पर भी है। किसी से नहीं छिपा है कि एमपी नगर में अतिक्रमण के धनाढ्य स्वरूप की भयावह स्थिति से प्रशासन आंख मूंदकर बैठा है। तमाम कॉम्पलेक्स और होटलों में वाहन पार्किंग के नाम पर दिखाये गये स्थानों में व्यवसाय संचालित किए जा रहे हैं। नतीजा यह कि इन भवन तथा होटलों में आने वाले वाहन सड़क पर खड़े किये जाते हैं। वहां की मुख्य सड़क कहने भर के लिए अस्सी फीट की है। सच कहें तो इन बड़े अतिक्रमणकारियों की बदौलत यह सड़क आठ फीट तक की नहीं बच सकी है। क्यों नहीं ऐसे भवन मालिकों के खिलाफ अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई की जा रही है?

उन्होंने लिखा है कितनी बड़ी विडंबना है कि सुरसा के मुंह की तरह दिन-ब-दिन विकराल होती इस समस्या के जवाब में वहां केवल एक स्मार्ट पार्किंग बनायी जा सकी है। क्षेत्र में खाली पड़ी कई जमीनों को पार्किंग के नाम पर खाली छोड़ा गया है वहां क्यों नहीं हाकर्स कार्नर बनाए जाने चाहिए। बेहद छोटे स्तर के गुमठी तथा खोमचे वालों को खदेड़कर बेरोजगार कर देने की मुहिम के लिए प्रशासन अराजक होने की हद तक सख्ती दिखा रहा है। मुख्यमंत्री जी, इन छोटी-मोटी दुकानों से आसपास के हजारों परिवारों की सुविधा का मामला भी जुड़ा है। 

उन्होंने लिखा है दूध से लेकर रोजमर्रा के इस्तेमाल के छोटे किंतु जरूरी सामान घर से चंद कदम की दूरी पर ही यहां उपलब्ध रहते हैं। क्या प्रशासन की मंशा यह है कि ऐसे परिवार दैनिक उपयोग की इन वस्तुओं का क्रय करने के लिए भी बाजार या किसी मॉल तक की लम्बी दूरी तय करें? नि:संदेह बड़े बाजार एवं मॉल आज की अहम आवश्यकता बन चुके हैं। किंतु हम इस बात पर तो आमादा न हो जाएं कि इनके लिए बेहद गरीब तबके के पेट पर लात मार दी जाए। आप की सरकार ने तो बजट में पोहे तथा जलेबी की ब्रांडिंग की बात भी कही है। तो फिर क्यों ऐसा हो रहा है कि इन्हीं पदार्थों की इसी शहर के आम लोगों तक सुलभ एवं सस्ती पहुंच सुनिश्चित करने वालों को यूं प्रताड़ना का सामना करना पड़ रहा है। 

महोदय, राष्ट्रपिता महात्मा गांधी तक ने इस देश में विकास के लिए कुटीर उद्योगों की स्थापना का मंत्र दिया था। ये ठेले, गुमठियां और खोमचे किसी कुटीर उद्योग से कतई अलग नहीं हैं। इन के माध्यम से एक ऐसी अर्थव्यवस्था संचालित हो रही है, जो गरीबी की रेखा से नीचे जीवनयापन कर रहे अनगिनत परिवारों की आर्थिक मजबूती का सबब बनी है। स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पकौड़े बेचने को रोजगार माना है। किंतु यहां हम पकौड़े आदि बेचने वालों को बेरोजगार बनाने पर उतारू हो गये दिखते हैं। मैं तो इस कल्पना मात्र से सिहर जाता हूं कि इतनी बड़ी संख्या में कामकाज से विहीन किए गए लोगों के परिवारों का क्या होगा? उनके पास फिर यही विकल्प बचेगा कि या तो भीख मांगें या फिर पूरे परिवार को उन्हीं खाद्य पदार्थों में जहर मिलाकर सपरिवार खुदकुशी कर लें, जो आज उनके परिजनों की जिंदगी का बहुत बड़ा आधार बने हुए हैं। और नहीं तो फिर यही होगा कि अतिक्रमण हटाने की यह मुहिम शहर में बेरोजगारी के चलते अपराध करने वालों की संख्या में भयावह इजाफा कर देगी। 

गौर इस बात पर भी किया जाना चाहिए कि आखिर यह अतिक्रमण एक दिन में तो हो नहीं गए। जब इस क्षेत्र में गुमठियां लग रही थीं, तभी इन्हें क्यों नहीं रोका गया। और अगर अभी हटाया जा रहा है तो क्या इस बात की कोई गांरटी दे सकता है कि कल को फिर यहां अतिक्रमण नहीं होगा। निश्चित तौर पर नगर निगम के जो लोग अतिक्रमण हटा रहे हैं वे ही इस अतिक्रमण होने देने के जिम्मेदार हैं या नहीं। उन पर पहले कार्रवाई की जाना चाहिए।

मेरा विनम्र निवेदन है कि अतिक्रमण हटाने की इस मुहिम में छिपे त्रासदायी तत्वों का निदान पहले तलाशिए। समुचित वैकल्पिक व्यवस्था के बगैर एक भी गरीब को उसके रोजगार से वंचित न करें। ये वही परिवार हैं, जिन्होंने आपकी पार्टी को राज्य की हुकूमत संचालित करने का जनादेश दिया है। आप पर भरोसा जताया है। संभव है कि प्रशासन की इन कोशिशों से अतिक्रमण की समस्या कुछ अंश तक कम हो जाए, किंतु उसके बाद जिन विकराल समस्याओं को हम अभी से साफ देख सकते हैं, उनका निदान कर पाना किसी के भी बूते की बात नहीं रह जाएगी। धन्यवाद
भवदीय 
सुरेंद्रनाथ सिंह
पूर्व विधायक, भोपाल मध्य क्षेत्र. 

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