लोकसभा के बाद अब राज्यसभा में भी स्वयं को मजबूत करने में लगी भारतीय जनता पार्टी

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लोकसभा में प्रचंड बहुमत हासिल कर सत्ता में आई भारतीय जनता पार्टी लगातार एक के बाद एक कई बड़े कदम उठा रही है। लेकिन निर्णायक फैसलों के लिए सरकार को आज भी राज्यसभा में बहुमत का इंतजार है। 



भवानी प्रताप सिंह ठाकुर 

यदि ये कहा जाए कि भारतीय जनता पार्टी इस समय अपने राजनीतिक जीवन के स्वर्णिम दौर में चल रही है तो संभवतः गलत नहीं होगा। वो भारतीय जनता पार्टी जिसने कभी एक सांसद की कमी के कारण अपनी सत्ता गंवा दी थी। आज वो एक ऐसे मुकाम पर आ गई है जहां उसने न केवल सत्ता पाई है बल्कि विपक्ष को बेजान और बिखरा हुआ भी बना दिया है। दशकों तक देश की राजनीति में सबसे बड़ी भूमिका निभाने वाली कांग्रेस पार्टी आज नेता प्रतिपक्ष के लिए आवश्यक सीटें भी प्राप्त नहीं कर पाई। 

लोकसभा में पूर्ण बहुमत प्राप्त करने के बाद अब भाजपा की नजरें राज्यसभा पर टिकी हुई है।  सत्रवी लोकसभा में  ऐतिहासिक जीत के बाद केंद्र में बीजेपी के पास 303 सांसद हैं l बीजेपी और उसके सहयोगी दलों (एनडीए गठबंधन) के पास लोकसभा में 353 सीटे हैं। जिसके चलते वह किसी भी बिल को लोकसभा से तो आसानी से पास करा सकती है। लेकिन, लोकसभा में पर्याप्त बहुमत होने के बावजूद भी सरकार को कई बार उच्च सदन राज्यसभा में अपना प्रस्ताव पारित कराने में दिक्कतों का सामना करना पड़ा है। लोकसभा में प्रचंड बहुमत हासिल कर सत्ता में आई भारतीय जनता पार्टी लगातार एक के बाद एक कई बड़े कदम उठा रही है। लेकिन निर्णायक फैसलों के लिए सरकार को आज भी राज्यसभा में बहुमत का इंतजार है। 

फिलहाल राज्यसभा में एनडीए को बहुमत प्राप्त नहीं है। जिसके चलते अपने पिछले कार्यकाल में भाजपा सरकार कई अहम विधेयकों को राज्यसभा से पारित करवाने में असफल रही है। भाजपा पुरजोर कोशिश के बाद भी तीन तलाक विधेयक को राज्यसभा से पास नहीं करा सकी, जबकि यह विधेयक लोकसभा में आसानी से पारित हो चुका था। नागरिकता संशोधन विधेयक भी पास नहीं हो पाया। इतना ही नहीं, 2016 में संयुक्त विपक्ष ने राष्ट्रपति के भाषण में संशोधन को भी पास करा लिया था। भूमि अधिग्रहण संशोधन विधेयक एक अहम विधेयक था, इसके विरोध में विपक्षी दलों की एकता को देखते हुए सरकार इसे राज्य सभा में लेकर ही नहीं गई। राज्य सभा में बहुमत नहीं होने की वजह से ही सरकार आधार विधेयक को मनी बिल बनाकर पारित करवा पाई। इसके अलावा मोटर वाहन संशोधन विधेयक, कंपनी संशोधन विधेयक, नागरिकता संबंधी विधेयक और इंडियन मेडिकल काउंसिल संशोधन विधेयक भी राज्यसभा में अटक कर रह गए थे।

अब अपने दूसरे कार्यकाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार अपने उस एजेंड़े को आगे बढ़ाने के प्रयास में लगी है जिस ओर पिछले 5 सालों में विपक्ष के विरोध के कारण भाजपा कदम नहीं बढ़ा पा रही थी। लोकसभा चुनाव में जीत दर्ज करने के बाद अब भाजपा राज्यसभा में भी खुद को मजूबत करने में जुट गई है। पिछले दिनों टीडीपी के 4 और हरियाणा राज्य सभा से इंडियन नेशनल लोकदल पार्टी के एकमात्र राज्यसभा सदस्य रामकुमार कश्यप ने भी भाजपा का दामन थाम लिया है। इन राज्यसभा सांसदों के बीजेपी में शामिल हो जाने के बाद राज्यसभा में बीजेपी के सांसदों की संख्या 71 से बढ़कर 76 पहुंच गई है। वहीं एनडीए के सांसदों की संख्या 107 पर पहुंच गई है। जिससे सत्ताधारी खेमा उच्च सदन में और मजबूत हो गया है। 

लोकसभा चुनावों के बाद अब राज्यसभा की कुल छह सीटों पर उपचुनाव होना है। लोकसभा चुनाव में जीते सांसदों ने राज्यसभा सीटों से इस्तीफा दिया था। जिसके बाद इन सभी सीटों पर 5 जुलाई को उपचुनाव होंगे। खाली हुई छह सीटों में एक बिहार, दो गुजरात और तीन ओडिशा की सीटें हैं। गुजरात से अमित शाह और स्मृति ईरानी के लोकसभा चुनाव जीत राज्यसभा से इस्तीफा देने के बाद गुजरात की ये दो सीटें खाली हो चुकी थी, जिनपर चुनाव होना है। 

इन दोनों सीटों पर बीजेपी अपने उम्मीदवार घोषित कर चुकी है। गुजरात राज्यसभा चुनाव को लेकर चुनाव आयोग द्वारा दिया गया नोटिफिकेशन भी जाने अनजाने भाजपा के पक्ष में ही जाता दिखाई पड़ता है। चुनाव आयोग के नोटिफिकेशन के अनुसार इन दोनों सीटों के लिये विधायक दो बार वोटिंग करेंगे ऐसी परिस्थितियों में बीजेपी जिसके विधायकों की संख्या 100 से भी अधिक है। वह दो बार वोट करके दोनों ही उम्मीदवारों को जितवा सकते है। गुजरात राज्यसभा चुनाव में बनते समीकरणों के अनुसार देखें तो इन दोनों ही सीटों पर भाजपा का जीतना लगभग लगभग तय माना जा रहा है। गुजरात के अलावा ओडिशा की 3 सीटों पर होने वाले राज्यसभा चुनाव में ओडिशा के मुख्यमंत्री और बीजू जनता दल के अध्यक्ष नवीन पटनायक ने भी उड़ीसा राज्यसभा की 3 सीटों पर भाजपा का समर्थन करने की बात कही है। बीजेडी ने डॉ. अमर पटनायक और डॉ. ससमित पात्रा को राज्यसभा चुनाव के लिए अपना उम्मीदवार बनाया है। वहीं बीजेपी ने अश्विनी वैशव को राज्यसभा चुनाव के लिए उम्मीदवार घोषित किया है। राज्यसभा चुनाव को लेकर बनते समीकरणों को देख वर्तमान समय में राज्यसभा की जिन 6 सीटों पर चुनाव होना है उन 6 सीटों पर भाजपा की स्थिति काफ़ी मजबूत दिखाई दे रही है।

राज्यसभा में बहुमत के लिए एनडीए को 123 से ज्यादा सांसद चाहिए होंगे। जिसके लिए भाजपा की नजरें अगले साल उत्तर प्रदेश राज्यसभा की खाली होने वाली 10 सीटों पर होने वाले चुनाव पर टिकी हैं। इन 10 सीटों में से 9 सीटें इस समय विपक्षी दलों के पास में हैं। जिसमें से 6 सपा, 2 बसपा और 1 कांग्रेस के पास है। लेकिन उत्तर प्रदेश में इस समय भाजपा के पास 309 विधायक, और 62 सांसद हैं। जिससे प्रदेश मे भाजपा की स्थिति काफी मजबूत है। इसलिए राज्य की 10 सीटों में से केवल एक सीट को छोड़कर बाकी सभी 9 सीटें भाजपा को मिलनी तय हैं। इस एक सीट पर समाजवादी पार्टी वापस लौट सकती है। किंतु ऐसा होना मुश्किल ही प्रतीत होता है। सपा - बसपा में पड़ी फूट के बाद बीजेपी साम-दाम-दंड-भेद की नीति अपना कर किसी भी तरह इन सभी सीटों पर कब्जा करना चाहेगी।

पश्चिम बंगाल विधानसभा में ममता बनर्जी की कमजोर होती पकड़ से आगामी चुनाव में भाजपा पश्चिम बंगाल की राजनीति में कोई बड़ा परिवर्तन कर सकती है। साऊथ वाईएसआर कांग्रेस के भाजपा से बढ़ते संबंधों को देख आसार लगाए जा रहे हैं कि वाईएसआर कांग्रेस राज्यसभा में भाजपा का समर्थन कर सकती है। आगामी विधान सभा चुनाव में बीजेपी पश्चिम बंगाल एवं दिल्ली विधानसभा में भी अपनी पकड़ मजबूत बनाना चाहेगी। इस बीच कर्णाटक और मध्यप्रदेश की सरकारों पर भी विशेष ध्यान केंद्रित होगा। यदि मध्य प्रदेश और कर्नाटक में सत्ता परिवर्तन होता है तो बीजेपी के राज्यसभा में पूर्ण बहुमत प्राप्त करने के आसार और भी अधिक हो जाएंगे। आगामी विधानसभा चुनाव तथा 2020 में होने वाले राज्यसभा चुनाव के मद्देनजर राजनीति के जानकारों का मानना है कि भारतीय जनता पार्टी 2020 के शुरुआती महीनों में राज्यसभा में पूर्ण बहुमत प्राप्त कर सकती है। राज्यसभा के एक तिहाई सदस्यों का कार्यकाल 2 वर्षों में पूर्ण हो जाता है। अगले साल राज्यसभा की लगभग 55 सीटों पर चुनाव संभव है ऐसे में भारतीय जनता पार्टी के पास एक राज्यसभा में खुद को मजबूत करने का बेहतर मौका है।

राजनीतिक इतिहास में भाजपा की  राज्यसभा में नंबरों के लिहाज से आज से बेहतर स्थिति कभी नहीं थी। भाजपा आज तक राज्यसभा में पारंपरिक तौर पर अल्पसंख्यक ही रही है। लेकिन मोदी और शाह की जोडी ने पार्टी के सारे इतिहास और भूगोल बदल डाले हैं। इतिहास में पहली बार भारतीय जनता पार्टी ने राज्यसभा में कांग्रेस को पछाड़ दिया है। ना केवल केंद्र और राज्यसभा बल्कि आज भाजपा उन राज्यों में भी अपने पैर पसार रही है जहां कभी भाजपा एक विधानसभा सीट के लिए भी तरसती नजर आती थी। जैसा कि प्रतीत होता है यदि भारतीय जनता पार्टी अथवा एनडीए गठबंधन राज्यसभा में पूर्ण बहुमत पा जाता है तो राज्यसभा में बहुमत मिलते ही न सिर्फ संसद में ही बदलाव आएगा बल्कि कई बड़े राजनीतिक परिवर्तन भी होंगे। राज्यसभा में भाजपा को बढ़त मिलने का मतलब है कि अब किसी बिल को पास करने के लिए पहले की तरह अब उन्हें अध्यादेश लाने की जरुरत नहीं पड़ेगी। भाजपा को अपने जरुरी बिल मनी बिल के सहारे पास करने की भी जरुरत नहीं पड़ेगी। जैसा की अभी तक सरकार करती आई है। 

लोकसभा में भाजपा पहले ही बहुत मजबूत स्थिति में है और अब यदि वो राज्यसभा में भी अपनी दम पर बहुमत हासिल कर लेती है। तो लोकसभा और राज्यसभा दोनों में बहुमत पाने के बाद भाजपा के लिए किसी भी कानून में बदलाव लाना और नया कानून बनाना आसान हो जायेगा। ऐसी परिस्थितियों में कमजोर विपक्ष भी चिंतन का विषय है। लोकसभा चुनावों के दौरान विपक्षी पार्टियां भाजपा पर लगातार यह आरोप लगाती रही थीं कि इस बार भाजपा अगर सरकार बनाती है तो वो ऐसे फ़ैसले लेगी, जो पहले कभी नहीं लिए गए हैं। भाजपा पर अपने पिछले कार्यकाल में भी न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र में दखल देने के आरोप भी लगते रहे हैं और यदि वह राज्यसभा में भी पूर्ण बहुमत प्राप्त कर लेती है तो उसके फैसलों पर विवाद जरूर खड़ा होगा।

विपक्षी दलों के सारे आरोप तो एक तरफ है। किंतु भारतीय लोकतंत्र देश की संसद के भीतर विपक्षी नेता के महत्व का सदैव गवाह रहा है। इतिहास गवाह है की जब भी अटल बिहारी वाजपेयी, भैरो सिंह शेखावत, लालकृष्ण आडवाणी जैसे नेता संसद में विपक्षी नेता के रूप में बोलते थे, तो सत्ता पक्ष उनकी बातों को संजीदगी से सुनता था, और एक मजबूत विपक्ष के सामने सरकार को कई बार अपने कदम पीछे भी लेने पड़े हैं।

किंतु वर्तमान में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष नहीं है ऐसी स्थिति में राज्य सभा में भी पूर्ण बहुमत प्राप्त करना बीजेपी के लिए तो लाभदायक साबित होगा। किंतु किसी लोकतांत्रिक देश में यदि सत्ताधारी दल से प्रश्न पूछने वाला व्यक्ति ना हो तो ऐसी परिस्थितियों में सिंहासन के निरंकुश होने का भय सदैव बना रहता है और इतिहास ने इस बात को साबित भी किया है। 


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