बागियों का भाजपा में शामिल होना भाजपा की लोकप्रियता, या बगियों की 'लोभ'-प्रियता?

विशेष टिप्पणी    

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बागी विधायकों और सांसदों का भाजपा में शामिल होना भारतीय जनता पार्टी की बढ़ती हुई लोकप्रियता है या फिर बागियों की लोभ-प्रियता? अर्थात पद, पैसे और पावर के लिए उनका लालच? यह प्रश्न आए दिन घट रही घटनाओं को देखकर उठना लाजमी है। कर्नाटक में भी प्रारम्भ से ही सियासी कलह पर भाजपा अपनी नजरें गड़ाए बैठी रही। और आज अंततः कर्नाटक में कांग्रेस-जेडीएस सरकार गिराने में सफल भी हो गई है। कांग्रेस-जेडीएस के 16 विधायकों ने जब अपने पद से इस्तीफा दे दिया था, तब से ही लगभग रोज यह लग रहा था आज गिरी, कल गिर ही जायेगी और आखिरकार आज वह हो गया। 


ठाकुर भवानी प्रताप सिंह

लोकसभा चुनाव के बाद से ही एक के बाद एक विधायकों और नेताओं का अपनी पार्टी छोड़ भाजपा में आना जारी है। इन विधायकों और नेताओं के भाजपा में आने का कारण यदि भारतीय जनता पार्टी की बढ़ती हुई लोकप्रियता है। तब तो बात ठीक है। किंतु इस समय यह करण भारतीय जनता पार्टी की लोकप्रियता नहीं अपितु विधायकों और नेताओं द्वारा अपने आगामी भविष्य में स्वार्थ सिद्धि और अपने निजी हित को ध्यान में रखकर लिए गए फैसले की भांति प्रतीत हो रहा है।

वर्तमान समय में भाजपा अपने स्वर्णिम दौर में है। लोकसभा में प्रचंड बहुमत प्राप्त करने वाली भारतीय जनता पार्टी अब राज्यों की विधानसभाओं पर भी अपना प्रभाव डाल रही है और उसका मकसद अधिक से अधिक राज्यों में अपनी सरकार बनाना है। यह भी साफ है कि विपक्ष जितना कमजोर आज हो गया है आज से पहले कभी नहीं था। जाहिर है विपक्षी नेताओं को विपक्ष में अपना भविष्य संकट में नजर आता होगा। यही कारण है कि वह अब अपनी पार्टियों से पलायन कर भाजपा का दामन थाम रहे हैं। 

लोकसभा चुनाव 2014 में भाजपा ने शानदार जीत प्राप्त की और पार्टी ने अपना यह प्रदर्शन 2019 लोकसभा चुनाव में भी जारी रखा लोकसभा चुनाव 2019 में एक बार पुनः प्रचंड बहुमत के साथ जीतने वाली भारतीय जनता पार्टी के लिए न केवल ये जीत बेहद खास थी, बल्कि इससे बड़ी जीत चुनाव के पहले और चुनाव परिणाम के बाद भारतीय जनता पार्टी को प्राप्त होती दिखाई दे रही है। जहां वो आए दिन किसी न किसी पार्टी के विधायकों अथवा राज्यसभा सांसदों को तोड़कर विपक्षी पार्टियों को कमजोर कर रही है। 

भाजपा की यह नीति न केवल विपक्षी पार्टियों को कमजोर कर रही है बल्कि कांग्रेस सहित अन्य तमाम विपक्षी दलों के बागी नेता भाजपा में शामिल हो भाजपा की की ताकत बनते जा रहे हैं। पूर्वोत्तर में हेमंत बिस्वा सरमा, पश्चिम बंगाल में मुकुल रॉय, कर्नाटक में एसएम कृष्णा सहित हरियाणा और उत्तर प्रदेश में विपक्ष के बागी नेता बीजेपी के लिए संजीवनी बनकर उभरे हैं। इन्हीं विपक्षी नेताओं के दम पर भाजपा ने इन राज्यों में अपना प्रदर्शन भी सुधार लिए है।

साथ ही ये कहना भी गलत नहीं होगा कि कांग्रेस मुक्त भारत का नारा देने वाली भारतीय जनता पार्टी धीरे-धीरे स्वयं ही कांग्रेस युक्त होती नजर आ रही है। आए दिन विधायक और कांग्रेसी नेता कांग्रेस पार्टी को छोड़कर भाजपा में शामिल हो रहे हैं। अपने सियासी लाभ को देखकर स्वयं को नियमों के अनुरूप चलने वाला बताने वाली भारतीय जनता पार्टी उन्हीं बागी विधायकों और नेताओं को कहीं अपना उम्मीदवार घोषित कर देती है तो कहीं उन्हें मंत्री पद ही सौंप देती है। जिससे भाजपा के भीतर कांग्रेसियों की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है।

संभवत वे भाजपा में आने से पहले किसी ऐसी सियासी नदी में जरूर नहाते होंगे जिसमें डुबकी लगा उनके सभी सियासी पाप धुल जाते हैं। तभी तो जिन नेताओं के खिलाफ कभी भारतीय जनता पार्टी मोर्चा खोल कर बैठी होती है, उनके भाजपा में शामिल हो जाने के बाद भाजपा को उनमें कोई कमी नजर नहीं आती।

हालिया उदहारण गोवा का है जहां गोवा विधानसभा में से कांग्रेस के 15 में से 10 विधायक भाजपा में शामिल हो गए जिनमें से तीन को मंत्री पद भी दे दिया गया। जाहिर है राज्य में भाजपा की स्थिति और मजबूत हो गई। मगर गौर करने वाली बात यह है कि दो महीने पहले उपचुनाव में बीजेपी ने जिस बाबुश मोनसेरेटे का विरोध किया था। अब उन्हें ही बीजेपी में शामिल कर लिया गया है। बाबुश मोनसेरेटे पर रेप के मामले में उनके खिलाफ आरोप पत्र दाखिल हो चुका है। बावजूद इसके न केवल उन्हें बीजेपी में शामिल किया गया बल्कि मंत्री भी बना दिया गया। गोवा की इस राजनीतिक हलचल को भाजपा अपनी बड़ी जीत बता रही है किंतु सच्चाई यह भी है कि बाबुश मोनसेरेटे को मंत्री बना भाजपा ने राज्य में महिलाओं से नाराजगी भी मोल ले ली है।

लोकसभा चुनाव के दौरान पश्चिम बंगाल में मचा सियासी संग्राम भी अभी ज्यादा पुराना नहीं हुआ। पश्चिम बंगाल में भाजपा-टीएमसी के बीच तनाव और हिंसा के बीच संपन्न हुए लोकसभा चुनाव के बाद भारतीय जनता पार्टी ने ममता के गढ़ पश्चिम बंगाल में भी जमकर सेंधमारी की है। पश्चिम बंगाल से टीएमसी के तीन विधायक और लगभग 50 पार्षद अपने-अपने समर्थकों के साथ भाजपा में शामिल हो गए। टीएमसी छोड़ भाजपा में आए नेताओं में से एक बड़ा नाम मुकुल रॉय के बेटे सुभ्रांशु रॉय का है। रॉय के अलावा टीएमसी विधायक तुषारक्रांति भट्टाचार्य और सीपीएम विधायक देवेंद्र रॉय भी भाजपा में शामिल हो गए। पश्चिम बंगाल और गोवा के बाद दल बदलने का ये दौरा कर्नाटक तथा अन्य राज्यों की ओर भी बढ़ चला है।

गुजरात में कांग्रेस के पूर्व विधायक अल्पेश ठाकोर और धवल सिंह जाला भाजपा में शामिल हो गए। ठाकोर और जाला ने राज्यसभा उपचुनाव में कथित रूप से कांग्रेस उम्मीदवारों के खिलाफ मतदान कर के बाद विधायक पद से इस्तीफा दे दिया। गुजरात के कद्दावर ओबीसी नेता ठाकोर ने भाजपा को 'अनुशासित कार्यकर्ताओं' की पार्टी करार देते हुए कहा कि कांग्रेस में रहते उनके लिये अपने समुदाय के लिये काम करना मुश्किल हो गया था। उन्होंने कहा, "मैं कांग्रेस में घुटन महसूस कर रहा था क्योंकि मैं अपने समुदाय के गरीब लोगों के विकास के लिये काम नहीं कर पा रहा था। उस पार्टी (कांग्रेस) में उसके नेताओं की अपरिपक्वता और घमंड के कारण कोई काम नहीं किया जा सकता।" 

कर्नाटक में भी प्रारम्भ से ही सियासी कलह पर भाजपा अपनी नजरें गड़ाए बैठी रही। और आज अंततः कर्नाटक में कांग्रेस-जेडीएस सरकार गिराने में सफल भी हो गई है। कांग्रेस-जेडीएस के 16 विधायकों ने जब अपने पद से इस्तीफा दे दिया था, तब से ही लगभग रोज यह लग रहा था आज गिरी, कल गिर ही जायेगी और आखिरकार आज वह हो गया। माना जा रहा था यदि इन 15 बागी विधायकों का इस्तीफा मंजूर हो जाता है। तो कर्नाटक में वर्तमान सरकार का गिरना लगभग तय है। और ऐसे में यदि कुमारस्वामी सरकार गिर जाती है तो भाजपा राज्यपाल से मिलकर सरकार बनाने का दावा पेश करेगी, जो कि अब कल किया जाएगा। कर्नाटक के पूर्व सीएम बीएस येदियुरप्पा पूर्व में ही कई बार कह चुके हैं कि सरकार गिरी तो हम तीन दिन में राज्य में भाजपा सरकार बना लेंगे। इस बात की संभावना भी प्रबल है कि ये सभी बागी विधायक अपने पद से इस्तीफा देने के बाद भाजपा का दामन थाम सकते हैं।

विपक्षी दलों से नेताओं को अपनी ओर खींचने की सियासी चाल में भारतीय जनता पार्टी अन्य राज्यों की तरह दिल्ली में भी पूरी तरह से कामयाब रही है। दिल्ली 'आप' के मजदूर कर्मचारी संयुक्त संघ के अध्यक्ष और भारतीय मजदूर क्रांति दल के अध्यक्ष संजीव जावा, लक्ष्मण इंदौरिया, राजकुमार सोनी, महेंद्र प्रताप सिंह तंवर और कांग्रेस पार्टी के बख्तावरपुर ब्लॉक के अध्यक्ष सुदेश कुमार अपने समर्थकों के साथ बीजेपी में शामिल हुए। 

इन बागियों को लेकर भाजपा की नीति साफ नजर आ रही है। दिग्गज नेताओं को जहाँ भाजपा सीधे अपने खेमे में शामिल कर लेती है। वहीं विधायकों और सांसदों को कानूनी रूप से अपने दल में सम्मिलित करने में असमर्थ होने पर  उन्हें उनके पद से इस्तीफा दिलवा स्वयं से जोड़ लेती है। पद से इस्तीफा देने के बाद उपचुनाव में उन्हीं बागियों का उम्मीदवार घोषित होना भी लगभग लगभग तय होता है।

केवल विधानसभा अथवा निकाय में ही नहीं भाजपा की यह तोड़ो जोड़ों की नीति राज्यसभा में भी बखूबी कारगर साबित हुई है। जिसका प्रभाव ये रहा कि पिछले दिनों टीडीपी के चार सदस्य- वाईएस चौधरी, सीएम रमेश, जीएम राव और टीजी वेंकटेश और हरियाणा राज्य सभा से इंडियन नेशनल लोकदल पार्टी के एकमात्र राज्यसभा सदस्य रामकुमार कश्यप ने भी भाजपा का दामन थाम लिया था। 

हाल के दिनों में समाजवादी पार्टी के पूर्व राज्यसभा सांसद और पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के पुत्र नीरज शेखर ने ने भी राज्यसभा से इस्तीफा देकर भाजपा का दामन थाम लिया है और यदि राजनीति के गलियारों में हो रही चर्चाओं पर  ध्यान दें तो समाजवादी पार्टी के दो और सांसदों के भाजपा में शामिल होने के कयास लगाए जा रहे हैं। यदि ऐसा होता है और समाजवादी पार्टी के दो और सांसद राज्यसभा से इस्तीफा देते हैं तो राज्यसभा में बहुमत का आंकड़ा घट जाएगा। जिससे भाजपा बहुमत के करीब आ जाएगीऔर  यदि इन सीटों पर उपचुनाव भी भाजपा ही जीत जाती है तो भाजपा राज्यसभा में भी बहुमत के बेहद करीब पहुंच जाएगी।
बागियों का अपने साथ जोड़कर भाजपा विधानसभा और राज्यसभा में तो स्वयं को मजबूत कर रही है। किंतु यह भाजपा के लिए नुकसानदायक भी साबित हो सकता है। सियासत की पृष्ठभूमि पर कोई कार्यकर्ता दिन रात मेहनत करता है और उसके बाद विपक्षी पार्टी से आया हुआ कोई नेता अचानक से उसकी मेहनत को किनारे कर पार्टी में पद और प्रतिष्ठा पा जाता है। तब जमीनी कार्यकर्ताओं में विरोध उत्पन्न होने की आशंका प्रबल होती है। उस से निपटना भाजपा के लिए बड़ी चुनौती साबित होगी।

वैसे वर्तमान समय में भाजपा में दूसरी पार्टियों से आ कर इतने नेता और विधायक सम्मिलित हो चुके हैं कि यदि यह सब एक साथ, एक समय पर भाजपा छोड़ने का निर्णय कर लें। तो भारतीय जनता पार्टी के भीतर एक सियासी भूचाल जरूर ला सकते हैं। संभव यह भी है कि इन दल बदलू नेताओ फिर से के दल बदलने के साथ कुछ विधानसभाओं में भाजपा की सरकार भी गिर जाए और राज्यसभा में बहुमत के करीब पहुंचती भाजपा अचानक से एक बार फिर बहुमत से दूर चली जाए। किंतु वर्तमान में ऐसा होने की संभावनाएँ कम नजर आती है। 

बीजेपी की इस तोड़ो जोड़ों की नीति को देखकर यदि यह कहा जाए कि बीजेपी अपने एजेंडे को पूरा करने और दोनों सदनों में अपने आप को मजबूत करने के लिए उधार के उम्मीदवारों पर दांव खेल रही है। तो यह बात गलत नहीं होगी। भाजपा राज्यसभा में पूर्ण बहुमत प्राप्त करना चाहती है साथ ही वह यह भी चाहती है कि अधिक से अधिक राज्यों में उसकी अथवा उसके समर्थकों की सरकार हो जिससे जब वह बड़े बिलों में परिवर्तन लाए तो वह राज्यों में जाकर अटके नहीं। भाजपा जिस तेजी के साथ बागी विधायकों को अपने साथ जोड़ रही है संभवत पार्टी इस बात को भूल रही है कि जनता ने उन्हें वोट उनकी विचारधारा से सहमत हो कर दिया था। क्या किसी व्यक्ति के चुनाव से ठीक पहले अथवा चुनाव जीतने के बाद पार्टी बदल लेने से उसकी मानसिकता भी परिवर्तित हो जाती होगी ? नहीं । चुने हुए जनप्रतिनिधि का इस तरह बार-बार पलटी खाना केवल पार्टी ही नहीं बल्कि जनता के साथ भी धोखा है। आखिर कब तक चुने हुए जनप्रतिनिधि अपने निजी स्वार्थ को देख किसी लहर के प्रभाव में आकर अपने दल अपनी विचारधारा से पलटी खाते रहेंगे और जनता को छलते रहेंगे ? ऐसे राजनीतिक लोग जो अपने फायदे के लिए किसी भी पल अपनी पार्टी, अपने दल को छोड़ किसी और दल में सम्मिलित हो जाते हैं। ये लोग न तो अपने क्षेत्र का विकास चाहते हैं और न ही यह देश के विकास में सहयोग करना चाहते हैं। इनका उद्देश्य केवल पद, पैसा और पावर प्राप्त करना होता है। जिसके लिए यह कभी भी जनता से छलकर दल बदल सकते हैं। ऐसे राजनेताओं से देश की जनता को बचना चाहिए और चुनाव में इनके साथ न्याय संगत व्यवहार करना चाहिए।

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