स्थानांतरण उद्योग, क्या अधिक परखना भी अविश्वास करना नहीं?


''कर्मचारी अधिकारी अपनी आजीविका के प्रति आश्रित होता है, अन्यथा बगावत की स्थिति बन सकती है. यानि पांच माह 15 दिन में 15 हजार निचले स्तर के कर्मचारियों और अधिकारियों और 450 आईएएस और आईपीएस स्तर के अधिकारियों का स्थांतरण होना, यह सरकार की किस मानसिकता का प्रतीक है? सोचें अधिक परखना भी एक प्रकार का अविश्वास करना होता है.'' 



डॉ. अरविन्द जैन

जैसे श्वास लेने और छोड़ने में एक हवा आती है और जाती है. यानि हवा आती जाती है ऊर्जा का क्रम चलता रहा है, जैसे कहा जाता है कि स्थानांतरण करने में भी ऊर्जा लगती है और रुकवाने में भी ऊर्जा लगती है. इससे यह फायदा होता है कि करने वाले और करने या रुकवाने वालों को ऊर्जा खर्च करना पड़ती है. यदि मनमाफिक होता है तो भी ठीक और न हुआ तो ऊर्जा खरच करो तो मनमुताबिक जगह आ जाओ. 

बार बार स्थांतरण से सरकार, नियंत्रण करता अधिकारी, नियुक्ति करता अधिकारी और प्रशासनिक अधिकारी भी निश्चिन्त रहता है. कारण उसको स्थिति जानने में परेशानी नहीं होती! कारण तब तक वह कहीं से कहीं पहुंच जाता है. एक बात और है जो आईएएस और आईपीएस अधिकारी अधिकतर ज्योतिषी होते हैं या त्रिकालज्ञ होते हैं. कारण वे जहाँ भी जाते हैं, बिना समय गवाएं सब जान जाते हैं. और उनको दूसरे जगह भेज दिया जाता है.        

यह उद्योग बहुत लाभकारी होता है. इसमें प्रभावित व्यक्ति हमेशा दीन बना रहता है. कारण उस पर असमय ट्रांसफर की गाज गिरने का भय रहता है और वह उस दौरान  किसी  भी जाँच या शिकायत से मुक्त रहता है. कारण जब वह कोई काम ही नहीं करेगा तो शिकायत नहीं होगी और विकास कार्य सरकार का निर्बाध चलता है. वह नए स्थान पर अनमने मन से जाता है और अज्ञात भय से ग्रसित रहता है और उस दौरान वह अपने परिवार के कष्टों से मुक्त रहता है कारण उसको नहीं मालूम होता है कि मेरा भविष्य कितने दिन कहाँ पर रहना है. 

वैसे स्थानांतरण एक बहुत सफल नीति होती हैं -
नित्यपरीक्षणम, कर्मविपर्ययः, प्रतिपत्तिदानं च नियोगी श्वार्थग्रहणोंपायाः!

अर्थात राजा अधिकारियों से रिश्वत द्वारा संचित धन निम्न प्रकार तीन उपायों से प्राप्त कर सकता है- 
1. नित्य परीक्षण कर अर्थात, सदा अधिकारियों की जांच पड़ताल करना अर्थात गुप्तरों द्वारा उनके दोष जानकार कड़ी सजा देना 
2. कर्मविपर्यय, उन्हें उच्च पदों से पृथक कर साधारण पदों पर नियुक्त करना, जिससे वे भयभीत होकर रिश्वत  से संचित धन बताने में बाध्य हो सके. 
3. समय समय पर अधिकारियों को पुरुस्कृत करते रहना, जिससे वे प्रसन्न होकर गुप्त धन दे सके. 

नापीड़ीता नियोगिनो दुष्टव्रणा इवानतः सारमुद्धमंति !
अर्थात अधिकारी वर्ग दुष्ट व्रण (पका हुआ दूषित फोड़ा ) सरीखे होते हैं, जो कि बिना ताडन बंधन आदि किये गृह में रखा हुआ रिश्वत का धन नहीं बताते. अर्थात जिस प्रकार पाकर हुए दूषित फोड़े शस्त्रादि द्वारा छेदन भेदन किये बिना भीतर कदुसहित रक्त नहीं निकालते, उसी तरह अधिकारी-गण भी कड़ी सजा पाए रिश्वत का धन नहीं बताते. 

पुनः पुनरभियोगो नियोगिषु महीपतीनामं वसुधारा !
राजनीय धन का अपहरण करने वाले अधिकारियों की बार बार भर्त्सना करते रहना चाहिए. राजा के लिए धन प्राप्ति का स्त्रोत बन जाता है. अथवा दूसरा अर्थ यह है कि रिश्वतखोर अधिकारियों के लिए बार बार ऊँचे पदों से पृथक्क करके साधारण  में नियुक्त करने से राहों कौन से रिश्वत का प्रचुर धन मिल जाता है, क्योकि वे पदच्युत होने के भय से रिश्वत का धन दे देते हैं.  

सकृनिष्पीड़ितं स्नानवस्त्रम किं जहाति साँद्रताम!
क्वील एक बार धोकर निचोड़े हुए स्नान वस्त्र से क्या पूरा जल निकल जाता हैं? अर्थात -जिस प्रकार नहाने का कपडा बार बार पछाड़ कर धोने से स्वच्छ होता हैं उसी प्रकार घूंसखोर अधिकारी बार बार दण्डित किये जाने से शुद्ध होता है. अर्थात संचित हुआ रिश्वत का धन दे देता हैं. 

पर कमल नाथ सरकार ने किस उद्देश्य से इतने अधिक स्थांतरण कैसे और किये जा रहे हैं, इससे कोई भी अधिकरी जहाँ जाता है तो पहले यह भय समाये रहता है कि मैं यहाँ कितने दिन हूँ और जब कुछ समझना चाहता है तब उसका ट्रांसफर. इससे क्या हुआ, पहली बात सरकार का काम प्रभावित होता है, अधिक व्यय का भार पड़ता है और उसे अपनी योग्यता दिखने का अवसर नहीं मिलता, हीन भावना से ग्रसित होता है और आप इन्ही अधिकारीयों को यहाँ से वहां ट्रांसफर कर रहे हो. कोई नया अधिकारी तो नहीं मिल रहे हैं. इस तरह की गतिविधियों से सरकार की कार्य विधि पर प्रश्न चिन्ह लगते हैं. 

यह जरूर है कि शासन किसी भी अधिकारी का स्थानांतरण कभी भी कहीं भी कर सकता है, पर इसका मतलब यह नहीं कि हर दूसरे दिन, सप्ताह में पंद्रह दिन में महीना भर में इससे सरकार का अधिकारियों पर भरोसा नहीं होने से वे यदि असंतुष्ट हो जायेंगे तो आगे का भविष्य अंधकारमय. चूँकि कर्मचारी अधिकारी अपनी आजीविका के प्रति आश्रित होता है, अन्यथा बगावत की स्थिति बन सकती है. यानि पांच माह 15 दिन में 15 हजार निचले स्तर के कर्मचारियों और अधिकारियों और 450 आईएएस और आईपीएस स्तर के अधिकारियों का स्थांतरण होना यह सरकार की किस मानसिकता का प्रतीक है? सोचें अधिक परखना भी एक प्रकार का अविश्वास करना होता है. 



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