मोदी जी के नेतृत्व में दागी और आरोपी सांसद सुधारेंगे भारत का भविष्य?


''चुनाव आयोग द्वारा प्रत्याशियों से हलफनामे में अपनी संपत्ति और अपने बारे में जानकारी मांगा जाना, ये सब आखिर किस मतलब का है? जब अरबों की संपत्ति का मालिक कोई प्रत्याशी चुनाव में पानी की तरह पैसा बहाता है. सैकड़ों आरोप उसके ऊपर होने के बावजूद भी वह प्रत्याशी अपने पैसों और अपनी पार्टी के नाम के कारण चुनाव जीत जाता है और देश की संसद के रास्ते उसके लिए खुल जाते हैं.''



भवानी प्रताप सिंह ठाकुर 
 भोपाल    

लोकसभा चुनाव 2019 हाल ही में संपन्न हुए  कैबिनेट का गठन भी हो चुका है. एक शानदार जीत के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी दूसरी पारी के लिए तैयार हैं. कई उपलब्धियों के बीच देश की पहली महिला वित्त मंत्री और देश के सबसे गरीब सांसद बताए जा रहे उड़ीसा के प्रताप सिंह सारंगी को राज्यमंत्री का दर्जा मिलना इस 17वी लोकसभा की बड़ी उपलब्धियों में से है.

जैसा कि पहले से अनुमान लगाया जा रहा था कि यह चुनाव ऐतिहासिक होने वाले हैं, अभूतपूर्व होने वाले हैं ठीक वैसा ही हुआ. भारतीय जनता पार्टी का लगभग 50% मतदाताओं के समर्थन से 300 से अधिक सीटों के प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में वापस आना इस बात का संकेत है कि देश की जानता ने प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की नीति और नियत पर विश्वास किया है. किंतु क्या केवल प्रधानमंत्री मात्र की नीति एवं नीयत साफ होने से देश का निर्माण सहजता और सरलता के साथ हो सकता है? 

राष्ट्र निर्माण में सबसे अहम भूमिका निभाती है देश की संसद, लोकतंत्र का वह मंदिर जहां पर जनता के चुने हुए प्रतिनिधि बैठकर वह नीति, नियम एवं कानून तैयार करते हैं जो आने वाले समय में देश और समाज को उन्नत तथा प्रगतिशील बनाए. किंतु क्या हो यदि इस लोकतंत्र के मंदिर में बैठने वाले प्रतिनिधियों पर ही संगीन अपराधों के आरोप लगे हुए हो? वर्तमान में संपन्न लोकसभा चुनाव के परिणामों के बाद बनी परिस्थितियों को देखकर कुछ ऐसा ही प्रतीत होता है जहां पर आरोपी बैठकर कानून निर्माण करते हुए नजर आने वाले हैं. 

भारतीय राजनीति को साफ सुथरी और अपराधी मुक्त बनाने के प्रयास लंबे समय से किए जा रहे हैं. किंतु वास्तविकता के धरातल पर ये सारे प्रयास व्यर्थ ही नजर आते हैं. ऐसा ही एक खुलासा किया है एडीआर की एक रिपोर्ट ने हाल ही में संपन्न हुए लोकसभा चुनाव को लेकर चुनाव प्रक्रिया से जुड़ी शोध संस्था 'एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक अलायंस' (एडीआर) द्वारा लोकसभा चुनाव के परिणाम तथा सांसदों द्वारा दिए गए हलफनामे के अध्ययन के बाद जारी एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2019 में संपन्न लोकसभा चुनाव से 17वीं लोकसभा के लिए चुनकर आए 542 सांसदों में से 233 (43 प्रतिशत) सांसदों के खिलाफ आपराधिक मुकदमे लंबित हैं. जिसमें से 159 सांसदों अर्थात 29% सांसदों पर तो हत्या अपहरण रेप जैसे गंभीर आरोप लंबित हैं. बावजूद इसके यह लोकतंत्र का मंदिर कही जाने वाली भारतीय संसद में अपने क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करेंगे और इस समाज को सुरक्षित बनाने के लिए कानून तैयार करेंगे.

बढ़ते हुए वोटिंग परसेंटेज को देखकर खुश होते निर्वाचन आयोग को इस बात पर भी विचार करना चाहिए कि केवल मतदान का प्रतिशत बढ़ना ही लोकतंत्र की जीत नहीं होता, अपितु चुना हुआ प्रत्याशी भी साफ-सुथरी छवि और उस पद हेतु लायक हो यह भी बहुत जरूरी है. देशभर में चुनाव आयोग के तमाम प्रयासों के बाद कुछ हद तक वोटिंग प्रतिशत तो बढ़ा है किंतु भारतीय राजनीति में आरोपी और दागी चेहरों की संख्या में कोई कमी आती नजर नहीं आ रही है. बल्कि ऐसे सांसदों की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है जिन पर कई संगीन आरोप लगे हुए हैं.

पिछले कुछ दिनों से राजनीति में देशहित की अपेक्षा दल हित की भावना कुछ अधिक हावी होती दिखाई पडी है. यही कारण है की राजनीतिक पार्टियां चुनाव जीतने के लिए हर बार ऐसे व्यक्ति को टिकट दे देती हैं जो व्यक्ति ना तो उस पद के काबिल होता है और ना ही उस पद हेतु चुनाव लड़ने के योग्य. और इस देश की जनता भी उस व्यक्ति की निजी काबिलियत को जाने बिना केवल पार्टी के नाम पर उसे वोट दे देती है और वह प्रत्याशी एक बड़े अंतर के साथ जीत हासिल कर लेता है.

'सबका साथ, सबका विकास' जैसे लोकप्रिय नारे के साथ एक प्रचंड बहुमत लेकर ऐतिहासिक वापसी करने वाली भारतीय जनता पार्टी के 303 में से 301 सांसदों के हलफनामे की जांच बताती है कि केवल साध्वी प्रज्ञा ठाकुर ही नहीं, साध्वी प्रज्ञा ठाकुर समेत भाजपा के 116 सांसदों पर आपराधिक मामले लंबित हैं. यह आंकड़ा भाजपा के कुल सांसदों का 39 प्रतिशत है. दोबारा सत्तारूढ़ होने जा रहे राजग के घटक जदयू के 16 में से 13 (81 प्रतिशत), लोजपा के निर्वाचित सभी 6 सदस्यों ने अपने हलफनामे में उनके खिलाफ आपराधिक मामले लंबित होने की जानकारी दी है. इसके अलावा एआईएमआईएम के दोनों सदस्यों तथा एक एक सांसद वाले दल आईयूडीएफ, एआईएसयूपी, आरएसपी और वीसीआर के सांसद आपराधिक मामलों में घिरे हैं. 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आए दिन अपराध मुक्त समाज को लेकर अपने विचार लोगों से साझा करते हैं किंतु जब उनके साथ उन्हीं के नेतृत्व में बैठने वाले सांसदों में इतनी बड़ी संख्या आरोपी सांसदों की हो तब अपराध मुक्त समाज की 'परिकल्पना भी कल्पना से परे लगती है.'

केवल भारतीय जनता पार्टी ही नहीं- 'अब होगा न्याय' और 'चौकीदार चोर है' के नारे देने और सुप्रीम कोर्ट से फटकार खाने वाली कांग्रेस पार्टी यदि अपने गिरेबान में झांके तो उसे यह एहसास होगा कि आरोपियों को टिकट देने में उसने भी कोई कसर नहीं छोड़ी थी. यही कारण है कि कांग्रेस के टिकट पर जीत के आने वाले 52 में से 29 सांसदों (57 प्रतिशत) पर आपराधिक मामले दर्ज हैं. 

केरल से कांग्रेस के टिकट पर नवनिर्वाचित सांसद डीन कुरियाकोस ने तो अपने आपराधिक मामलों का दोहरा शतक पूर्ण किया हुआ है. डीन के ऊपर लगभग 204 आपराधिक मामले दर्ज हैं. जिनमें गैर इरादतन हत्या, लुट और रेप के मामले भी शामिल हैं. डीन के ऊपर कई संगीन धाराओं के तहत केस भी चल रहा है. बावजूद इसके डीन को कांग्रेस पार्टी ने टिकट दिया और वह उस सीट से विजयी होकर देश की संसद में बैठ अपने क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करेंगे. भाजपा प्रत्याशी और वर्तमान भोपाल सांसद साध्वी प्रज्ञा के ऊपर लगे आरोपों को लेकर कांग्रेस पार्टी बार-बार बवाल मचाती रही. किंतु डीन की छवि पर कांग्रेस पार्टी की ओर से कोई ध्यान ही नहीं दिया गया. या फिर क्या कांग्रेस पार्टी की नजरों में डीन साफ-सुथरी छवि के व्यक्ति है?

कांग्रेस ने केरल में अच्छा प्रदर्शन किया है किंतु रिपोर्ट में नवनिर्वाचित सांसदों के आपराधिक रिकॉर्ड के राज्यवार विश्लेषण से पता चलता है कि आपराधिक मामलों में फंसे सर्वाधिक सांसद केरल से ही चुन कर आए हैं. अब इसे कांग्रेस की जीत कहें या फिर लोकतंत्र की हार यह एक प्रश्न जरूर सामने आता है. बिहार जहां एनडीए गठबंधन सफल रहा वहां के भी 82 फीसदी सांसदों के खिलाफ आपराधिक मामले चल रहे हैं. इसके अतिरिक्त अन्य राजनीतिक दलों में भी दागी सांसदों की कोई कमी नहीं है. बसपा के आधे (10 में से पांच), तृणमूल कांग्रेस के 22 में से नौ (41 प्रतिशत) और माकपा के तीन में से दो सांसदों के खिलाफ आपराधिक मामले चल रहे हैं. बीजद के 12 निर्वाचित सांसदों में सिर्फ एक सदस्य ने अपने खिलाफ आपराधिक मामले की हलफनामे में घोषणा की है.

देश की संसद जिससे पूरे देश को उम्मीदें रहती हैं, देश की संसद जो लोकतंत्र का मंदिर कही जाती है. उस संसद में बैठने वाले सांसदों की छवि साफ-सुथरी होना बहुत आवश्यक है किंतु वर्तमान समय में ऐसा होते नहीं दिख रहा देश के संसद में इतने बड़े पैमाने पर आरोपी सांसदों का होना चिंतन का विषय है. न जाने इस 17वी लोकसभा के चुनाव किन-किन मायनों में यादगार होंगे. यादगार इसीलिए कि नेताओं ने अपनी सभी मर्यादा भूलकर किस तरह अभद्र शब्दों का प्रयोग किया या फिर इसीलिए की 48 साल बाद कोई पार्टी इतने प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में वापस आई थी. यादगार इसलिए कि अब तक का सबसे अच्छा वोटिंग परसेंटेज रहा या फिर इसीलिए की अब तक के इतिहास में सबसे ज्यादा आरोपी इसी लोकसभा के लिए चुने गए हैं. 

चुनाव आयोग द्वारा प्रत्याशियों से हलफनामे में अपनी संपत्ति और अपने बारे में जानकारी मांगा जाना, ये सब आखिर किस मतलब का है? जब अरबों की संपत्ति का मालिक कोई प्रत्याशी चुनाव में पानी की तरह पैसा बहाता है. सैकड़ों आरोप उसके ऊपर होने के बावजूद भी वह प्रत्याशी अपने पैसों और अपनी पार्टी के नाम के कारण चुनाव जीत जाता है और देश की संसद के रास्ते उसके लिए खुल जाते हैं.

सांसद केवल एक लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व ही नहीं करते बल्कि उन्हें अधिकार मिलता है लोकतंत्र के मंदिर उस संसद में बैठ देश की दिशा एवं दशा सुधारने हेतु अपने विचार प्रदान करने का और अगर उन्ही सांसदों पर लूट, हत्या और रेप जैसे संगीन आरोप लगे हो तो इस विषय पर विचार केवल निर्वाचन आयोग को ही नहीं अपितु पार्टी प्रमुख एवं देश की जनता को भी करना चाहिए कि हम जिस प्रत्याशी को चुनकर देश की संसद में भेज रहे हैं वह प्रत्याशी उस पद और उस जिम्मेदारी के लायक है भी या नहीं. मतदान का प्रतिशत बढ़ाने के लिए विगत दिनों में बहुत अधिक खर्च किया गया और कुछ हद तक इसे बढ़ा भी लिया गया. 

किंतु राजनीति के जानकारों को विचार इस बात पर भी करना चाहिए कि मतदान प्रतिशत का बढ़ना चुनाव आयोग एवं मतदाता जागरूकता अभियानों की सफलता है या फिर दागी एवं आरोपी प्रत्याशी के भय का परिणाम? देश की जनता अपनी जिम्मेदारी समझते हुए मतदान केंद्रों पर आकर मतदान कर रही है, या फिर उन्हें मतदान केंद्रों तक आने के लिए मजबूर किया जा रहा है? 

यदि देश की जनता स्वयं मतदान केंद्र पर आकर मतदान कर रही है तो यह अवश्य ही सफलता है. किंतु चिंतन इस विषय पर भी करना चाहिए कि कहीं ऐसा तो नहीं की प्रत्याशियों का भय देश की जनता को मजबूर कर रहा है मतदान केंद्रों तक आने के लिए? लोकतंत्र के महापर्व चुनाव में जनता की बढ़ती हुई भागीदारी प्रयासों की सफलता की ओर संकेत करती है. किंतु यदि आरोपी प्रत्याशियों को चुनाव से दूर रखने एवं मतदाताओं को समझदार बनाने पर ध्यान दिया जाए तो संभवत: यह मतदान के प्रतिशत को बढ़ाने से भी अधिक लाभदायक होगा.

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