शिक्षा प्रणाली को सही कर लें तो कल फिर कोई बच्चा विवेकानंद, भगतसिंह या सरदार अवश्य होगा


हर जगह दंगे, फसाद, बलात्कार, चोरी, भ्रष्टाचार.. कौन है इसके पीछे जिम्मेवार?
जो लोग शिक्षा में रुचि रखते हैं ख़ास उनके लिए.. कृपया आराम से अवश्य पढ़ें, पढ़ कर अपनी राय प्रतिक्रिया भी दें ताकि उस अनुरूप बात आगे बढ़े.. 


भावना भट्ट
भावनगर, गुजरात से 

जब अंग्रेजों ने भारत में कदम रखा, तब देखा कि भारत की जड़ें मजबूत हैं, क्यूँ कि संस्कारों से सींची हुई हैं। यहाँ का हर बच्चा संस्कृत और संस्कृति से जुड़ा हुआ है। यहाँ हर घर में हो रहा है भगवद गीता का अभ्यास..! जो उन के मनोबल को दृढ़ करता है। अगर शासन करना है तो उन को मन को गुलाम बनाएं, ऐसी शिक्षा प्रणाली बनानी होंगी। यही सोच के साथ मैकोले ने जो दी वो शिक्षा प्रणाली में एक छोर से घुसता बच्चा जब दूसरे छोर से बाहर आता था, तब उनका जमीर मर जाता था और वो एक ग़ुलाम होकर खड़ा रहता था अंग्रेजी अमलदारों के सामने।


अपराधों के पीछे अशिक्षा या गलत शिक्षा बड़ा कारण 

आजकल समाज में हो रहीं घटनाएँ मन को झकझोरती हैं! हर जगह दंगे, फसाद, बलात्कार, चोरी, भ्रष्टाचार.. कौन कौन से नाम लें और किसे छोड़े? क्या हालत हुई है हमारे भारत की? किस ने की है? कौन है आखिर जिम्मेदार? इन सब सवालों का जवाब मेरे विचारों से एक ही है और वो है हमारी शिक्षा प्रणाली।

बचपन में सुनी थी वो पंचतंत्र की बातें..! और पंचतंत्र की कहानियों के जन्म की बातें। एक राजा के पुत्र को सुधारने के लिए लगातार कही गई कहानियों का समूह है पंचतंत्र की कथाएँ।

आज भी हर बच्चें को कहानी सुनना पसंद है। कहानियां जो उसके भाव विश्व को पोषित करती है मगर आज कहानियां है कहाँ..? कौन कहेगा उसे कहानी..? माता-पिता को फुरसत नहीं है और घर की दादी 'ओल्ड एज होम' में रहने को मजबूर हुई है।

जब अंग्रेजों ने भारत में कदम रखा, तब देखा कि भारत की जड़ें मजबूत हैं, क्यूँ कि संस्कारों से सींची हुई हैं। यहाँ का हर बच्चा संस्कृत और संस्कृति से जुड़ा हुआ है। यहाँ हर घर में हो रहा है भगवद गीता का अभ्यास..! जो उन के मनोबल को दृढ़ करता है। अगर शासन करना है तो उन को मन को गुलाम बनाएं, ऐसी शिक्षा प्रणाली बनानी होंगी। यही सोच के साथ मैकोले ने जो दी वो शिक्षा प्रणाली में एक छोर से घुसता बच्चा जब दूसरे छोर से बाहर आता था, तब उनका जमीर मर जाता था और वो एक ग़ुलाम होकर खड़ा रहता था अंग्रेजी अमलदारों के सामने। उन्हें तो ऐसे ही चाहिए थे, कारकूनों की फ़ौज..!

अंग्रेज़ो के अत्याचारों ने और उनकी ही शिक्षा प्रणाली से त्रस्त लोगों के समुह ने उन्हें तो मार भगाया, मगर अभी भी हमारे भारत की मनोदशा में ग़ुलामी की वो जड़ें मौजूद हैं।

क्योंकि सिर्फ़ कारकुन बनाने वाली उस शिक्षा प्रणाली को आज भी हमने ज्यों की त्यों बरकरार रखी है। आज भी हमारें बच्चें ऐसी स्कूलों में दाखिल होते है जहाँ यूनिफॉर्म में सज्ज, टाई, शूज़ की कैद में जब अपने दोनों हाथ पीछे रखकर कतारों में अपना सर झुकाकर चलते हैं तब, हम उसकी डिसिप्लिन की बात का गर्व करते हुए सब को ये कहते हुए फुले नहीं समाते कि हम ने हमारे बच्चों को शहर की सब से महँगी स्कूलों में दाख़िल किया है..! एक ही लेसन को सौ बार लिखने वाले बच्चें स्कूल से निकल कर ट्यूशन की कैद में और फिर...?

लिखते हुए हाथ कांप रहे हैं मगर यह भी सत्य है कि काँच की बोतलों में बंद की हुई तितलियाँ आखिर दम तोड़ ही देती हैं..! उस में रहें मानवीय मूल्यों का कत्ल हो जाता है..! और हम तालियां बजाते रहते हैं। 

जब अंदर का आक्रोश अपनी सीमाओं को तोड़कर समाज जीवन को कलुषित करता है तब हम दोष देने के लिए कोई चेहरा ढूंढते रहते हैं क़भी सुरक्षा प्रणाली को तो क़भी न्याय प्रणाली को दोषी ठहराकर अपने आप को बेगुनाह साबित करने में लगे रहते हैं।

ये बहुत ही कटु सच है कि आज की शिक्षा प्रणाली केवल और केवल मार्क्स को महत्त्व देती है। बच्चे जैसे रेस के घोड़े होकर दौड़ते रहते हैं। मीडियम चाहे कोई भी हो, शिक्षा प्रणाली एक जैसी ही है, जहाँ बचपन खिलता नहीं है और न ही अपनी इच्छा से पनपता है। ईश्वर का हमारे भरोसे इस सृष्टि में भेजा हुआ एक फूल खिलने के बदले मुरझा जाता है।

क्या है इस का हल? मुझे लगता है हमें हमारी जड़ो को फिर से टटोलना होगा। हमारी वो शिक्षा प्रणाली जो हमारे ऋषियों की देन थी, उसे फिर से कार्यान्वित करना होगा।

हमें समझना होगा शिक्षा और विद्या दो अलग अलग चीजें हैं, अलग अलग बात हैं। लगता है एक जैसे, मगर शिक्षा का मतलब केवल अक्षर ज्ञान है, जबकि विद्या के साथ आत्मा से जुड़ा हुआ आनंद भी अभिप्रेत है..! जैसे कि एक प्रार्थना अगर मुखपाठ करवाई जाएं तो शिक्षा है मगर, इसे भाव से गाया जाय, साथ में शिक्षक की आँखों में अगर इसे गाते वक़्त कृतज्ञता के आँसू या हल्की सी नमीं आ जाय तो, हो सकता है बच्चे शायद उस बात को समझने की उम्र के न भी हों मगर, उस के मन में ये बात तो अवश्य जाएगी कि मैं जिसे जनता नहीं हूँ ऐसा कुछ तो है..! जहाँ तक मुझे पहुँचना है। तो ये बच्चा बड़ा होकर समाज में भार रूप नहीं बनेगा, मगर हो सकता है वो कल का गांधी, इसु, पैग़म्बर या बुद्ध, नानक, राम बने जाए।

शिक्षा में विषय कोई भी हो उस में कला को जोड़ना होगा। मतलब शिक्षा को विद्या से जोड़ना होगा।

सालों पहले विनोबा जी ने कहा था कि सच्चे भारत का निर्माण अगर करना हो तो.. तो एक ही सरकार एक ही खाता और एक ही प्रधान चाहिए और वो है शिक्षा खाता, और शिक्षा प्रधान। अगर हम अपनी शिक्षा प्रणाली को सही कर लें तो सुरक्षा या न्याय या किसी भी प्रकार के खाते की जरूरत नही होंगी। समाज अपने आप सुचारू अवस्था में चलने लगेगा।

सरकार कुछ करें न करें मगर मेरा ये लेख पढ़ने वाले सभी शिक्षकगण और माता-पिता को मेरा नम्र निवेदन है कृपया बच्चों को विद्या से जोड़ें। उन को जो भी कला में रस रुचि है उस में आगे बढ़ने दें।

ईश्वर की बगियाँ के इन फूलों को खिलने दें। माली बनें। मालिक बनने से जरूर बचें। बच्चे कल का भारत हैं और शिक्षकों के साथ शिक्षित माता-पिता युग निर्माता हैं। बस अपना धर्म निभाएं तो कल का भारत एक नया भारत होगा। कल फिर कोई बच्चा विवेकानंद, भगतसिंह या सरदार होगा। हमारा भारत दुनियां की शान होगा, दुनियां का सरताज़ होगा।


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News Digital India 18

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2 comments:

  1. धन्यवाद आ. मुकुट सक्सेना जी।

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  2. धन्यवाद आ. मुकुट सक्सेना जी।

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