नाटक जिंदगी और जोंक, गरीबी अभिशाप है या गरीब अभिशाप?




''नाटक दर्शाता है कि हम गरीब होकर तो लड़ सकते हैं, 

पर गरीबी से नहीं. गरीबी हर क्षण गरीब को मारती है.''

-डॉक्टर अरविन्द जैन, भोपाल 

भारत भवन में आयोजित मध्यप्रदेश रंगोत्सव में नाटक जिंदगी और जोंक का मंच आज 25 मई को किया गया. नाटक जिस पृष्ठभूमि में मंचित किया गया है, वह इतनी ज्वलंत समस्या को दर्शाता है, जो असाध्य रोग जैसा बन गया है. गरीबी और गरीब क्या समाज के लिए अभिशाप हैं या समाज के लिए वरदान? कारण जो धन सम्पन्न होते हैं, उनको गरीब लोग चाहिए, जिससे वे अपने निजी कार्यों को उनके माधयम से संचालित कर सकें. व्यक्ति कोई भी बड़ा या छोटा नहीं होता, होता है तो मात्र धन से, धनवान धनहीन होने पर गरीब कहलाने लगता है और उसे गरीबी अभिशाप लगने लगती है. 


जैसा बताया गया है कि हर जीव अपने पूर्व जन्म में अर्जित पुण्य पाप के आधार पर सुख दुःख पाते हैं और इसका एक पक्ष यह भी होता है हमारे कर्म और पुरुषार्थ का भी इस पर असर पड़ता है. पूर्व उपार्जित कर्म और वर्तमान में किये जाने वाले कर्मों का फल मिलता है. व्यक्ति हर समय कर्मशील रहता है, पर कौन उसे लाभ देगा और कौन हानि, वह निर्णय नहीं कर पाता, इसके साथ उसकी प्रवत्ति /नियत पर भी बहुत प्रभाव पड़ता है.


रजुआ नामक किरदार ने कई दिशाओं और दशाओं में शिक्षा देने का प्रयास किया. एक जगह जिसको जितना जैसा मिलता है, उससे वह संतुष्ट रहता है और जैसे जैसे वह कुछ धन संचय करके किसी विश्वास पात्र को देता है और वह धोखा दे देता है, तब वह धरम की ओर झुकता है, पर वह पवित्र भावना से अनुशरण नहीं करता. उस समय उसे बदले की भावना रहती है और जब वह कुछ मानसिक स्वस्थ्य होता है तो वह काम वासना के वशीभूत पागल लड़की को पाता है और वहां भी धोखा मिलता है.

इस प्रकार यह नाटक यह दर्शाता है कि हम गरीब होकर तो लड़ सकते हैं, पर गरीबी से नहीं. गरीबी हर क्षण गरीब को मारती है. सभी कलाकारों का अभिनय प्रशसनीय रहा .
कथाकार श्री अमरकांत जी और निर्देशक श्री बंसी कौल और रंगविदूषक संस्था भोपाल की प्रस्तुति प्रशंसनीय रही. 




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