'शिक्षा वो शेरनी का दूध है, जो पियेगा वो गुर्राएगा' एक समय सबसे ज्यादा IAS/IPS देने वाले राज्य में अब बीते दिनों की बात, कौन है इसके पीछे?

राष्ट्रीय बचत और ढहती शिक्षा


''एक समय बिहार को सबसे ज्यादा IAS/IPS देने वाला राज्य माना जाता था, लेकिन आज क्या हुआ ऐसा कि शिक्षा के नाम पर नकलचियों और घोटालों का राज्य बन कर रह गया है? क्या है इसके पीछे की असली बजह?'' 




उषालाल सिंह
पटना बिहार से

शिक्षकों की बात करें तो क्या नियोजित शिक्षक Xerophytic प्लांट की तरह हैं, जिन्होंने अपनी जरूरतें कैक्टस की भांति समेट कर तना पर्ण व पर्ण कांटे में परिणित हो चुके हैं। जैसे बिना पानी के भी ये अपना अस्तित्व बचाये रखते हैं ठीक वैसे ही बिन वेतन ये नियोजित शिक्षक भी अपना अस्तित्व बचाये हुए हैं। और राज्य सरकार ने नियोजितों की बहाली उसी तर्ज पर की है, जैसे वन विभाग वृक्षारोपण में बबूल लगाते हैं। मेहनत भी कम लागत भी कम। "हींग लगे न फिटकिरी रँग भी चोखा होय।'

"शिक्षा वो शेरनी का दूध है जो पियेगा वो गुर्राएगा" यह कथन स्वतंत्र भारत के पहले कानून मंत्री, संविधान सभा के प्रारूप समिति के अध्यक्ष महोदय माननीय बाबा साहेब भीम राव अंबेडकर जी का है। मगर अफसोस!! शिक्षा, जैसे शेरनी का दूध सभी वर्गों तक न पहुंच जाय, इसके लिए सुनियोजित व्यवस्था की शुरुआत हो चुकी है। (अपवाद-लोकतंत्र की महिमा से बिन शिक्षा के जन्मघुट्टी के भी गुर्राने की कला सीखी जा सकती है, जिनमें मुख्य रूप से...!! आप अपनी जानकारी से रिक्त स्थानों की पूर्ति कर सकते हैं.) 


शिक्षा जो समवर्ती सूची का विषय है तथा इसपर राज्य व केंद्र सरकार कानून बनाने को स्वतंत्र है, पर अब तक यही देखने में आया है कि समवर्ती सूची पर केंद्र सरकार द्वारा बने कानून को राज्य सरकार को अमल में लाना बाध्यता होती है, पर मेरी जानकारी में पहली बार केंद्र सरकार बिहार सरकार के शिक्षा व्यवस्था की एक कड़ी "नियोजित शिक्षक" से प्रभावित दिख रहे हैं। आखिर हों भी क्यों न आखिर नियोजित शिक्षक के बदौलत ही तो राष्ट्रीय कोष में करोड़ों की बचत जो हुई है। 

धन्य हैं प्रभु जिन्होंने इस बचत की गणना की 
धन्य हैं प्रभु जिन्होंने इस बचत की गणना की है। उनकी तन्मयता, एकाग्रता को नमन जिन्हें सिर्फ बचत दिखाई दी। उन्हें ये न दिखा कि बिहार जनसँख्या में देश की ही भाँति प्रथम स्थान पर आने की होड़ में है जबकि शिक्षा में अंतिम पायदान पर घुटनों के बल ही। 

धन्य हैं वे जिन्होंने नियोजित शब्द को गढ़ा, एक प्रारुप दिया, और धन्य हैं वे बेरोजगार बिहारवासी, जिन्होंने बेरोजगारी भत्ता की राशि में राज्य हित के लिए आगे आये। ये नियोजित शिक्षक उस वक्त राज्य की शिक्षा व्यवस्था में रीढ़ बन मजबूती प्रदान किये हैं, जब बिहार आर्थिक, शैक्षणिक पिछड़ापन के आधार पर विशेष राज्य की दर्जा की अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। नियोजित शिक्षकों ने अपनी जरूरतों,शौक की आहुति दे राज्य हित की सोची, ताकि बिहार अपना खोया गौरव लौटा सके, ताकि कभी शिक्षा में अंतरष्ट्रीय पहचान रखने वाला बिहार फिर से विश्व पटल पर अपनी चमक बिखेर सके। 

नियोजित शिक्षकों की बहाली भी कई स्तरों पर की गई थी, जैसे-शिक्षा मित्र, पंचायत शिक्षक, प्रखण्ड शिक्षक, नगर शिक्षक, जिला- परिषद शिक्षक। विविधता में एकता का उत्तम उदाहरण हैं ये नियोजित शिक्षक, जो भिन्न-भिन्न रूप में थे तो जरूर, पर उनका उद्देश्य मात्र एक, शिक्षा प्रदान करना है। 

नियोजित शिक्षक क्या बंधुआ मजदूरी का नया स्वरूप
ये शिक्षक अपनी योग्यता अनुसार अपना सर्वश्रेष्ठ देने का भी प्रयास करते रहे। जहाँ एक ही विद्यालय में नियमित शिक्षक नियोजित की तुलना में तिगुना, चौगुना वेतन सहित अन्य लाभ ले रहे हैं वही नियोजित को कुछ राशि निश्चित कर दी गई है जो बंधुआ मजदूरी का नया स्वरूप है। स्कूलों में ऐसा कोई काम नहीं जिसे नियोजित ने न किया हो। शैक्षणिक व गैर शैक्षणिक सारे वो काम, (शिक्षण, मूल्यांकन, वीक्षण, परीक्षण, जनगणना सम्बंधी कार्य, चुनाव कार्य आदि) जो अब तक निमियत शिक्षक करते आ रहे थे अब वो नियोजित के हिस्से भी आया। जब एक ही छत के नीचे दो लोग एक ही काम करें तो मजदूरी में इतनी खाई क्यों?

आखिर समान काम के बदले समान वेतन की बात पे जब नियोजित शिक्षकों ने अपनी बात न्यायालय में रखी तो उच्च न्यायलय ने अपना फैसला नियोजित शिक्षकों के हक़ में दिया।

जिसे राज्य सरकार तिलमिला गई। एक ओर जहाँ शिक्षकों में खुशी की लहर दौड़ गई वहीं राज्य सरकार इसे अपनी हार समझ इस मामले में सर्वोच्च न्यायलय में ले गई। जहाँ शिक्षक शारीरिक व आर्थिक रूप से निर्भय हो अपनी बात पर डटे रहे। सर्वोच्च न्यायलय ने भी महीनों दिन तारीख पर तारीख और हर दृष्टिकोण से मामले को समझने का प्रयास करती रही तथा उनका पक्ष नियोजितों के हित में में ही लगती दिख रही थी। पर ये ध्यान कैसे न रहा है कि सर्वोच्च न्यायालय जो स्वतंत्र संवैधानिक इकाई है इसकी साख गिरती जा रही है। इसे स्वतंत्र न रहने दिया है। 

नहीं तो सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिया गया फैसला सात महीनों तक सुरक्षित क्यों रखा गया था। अच्छा होता राष्ट्रपति की भांति इन न्यायाधीशों को पॉकेट वीटो की शक्ति होती। कम से कम आज हम अंधेरे में ही खुश रहते। आज जिस तरह से अपनों से ठगे जाने का अहसास हुआ है कि सदमे से उबरने में पूरी गर्मी छुट्टी ही निकल जाये। अच्छा ही होगा तब तक सब कुछ भूल कर फिर से मियाँ की दौड़ मस्जिद तक का सफर शुरू हो जाएगा। 

नियोजित बहाली से होने वाले विशुद्ध लाभ को देखते हुए इसे हर क्षेत्र में लागू करने की कवायद शुरू कर दी जानी चाहिए। वो चाहे पुलिस, प्रशासन, या केंद्र सरकार की कोई भी बहाली हो यहाँ तक कि केंद्र सरकार द्वारा संचालित सभी केंद्रीय विद्यालयों में कार्यरत नियमित शिक्षकों को यथाशीघ्र सेवा मुक्त कर नियोजित की बहाली करने की व्यवस्था की जाय। तभी तो करोड़ो की बचत अरबों खरबों में पहुंचेगी। ताकि जिससे कॉरपोरेट घराने बड़े स्तर पर इस्तेमाल कर सकेंगे। हमारा भारत (GPL) में अग्रणी होगा। 

माननीय मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री से यही कहना चाहूंगी कि यदि सही मायने में अध्ययन करना है तो केरल राज्य का क्यों नहीं? जहाँ शत प्रतिशत साक्षरता है। बिहार जो पहले से निम्नतम स्तर पर है उसे और कहां पहुंचाने की तैयारी है? कहीं ऐसा न हो कि भविष्य में कभी खुदाई के बाद सरकारी विद्यालयों के खंडहर से अक्षर ज्ञान का कोई साक्ष्य भी न मिले। 

जिनका पेशा कृषि, मात्र उनके बच्चे ही बढ़ा रहे सरकारी विद्यालयों की शोभा
आज जिस तरह से सरकारी विद्यालयों की छाती पर निजी विद्यालय पनप रहे हैं बहुत ही भयावह स्थिति होने वाली है। आज भी जिस तरह से भारत 70 प्रतिशत आबादी के साथ गांव में बसता है तथा जिनका मुख्य पेशा कृषि ही है उनके बच्चे ही सरकारी विद्यालयों की शोभा बढ़ा रहे हैं। ऐसे में ये बहुत बड़ी नीति है कि एक भारी तबका को आगे बढ़ने ही न दिया जाय।उन्हें मात्र उतनी शिक्षा दी जाय ताकि वो अपनी मजदूरी गिन सकें। आखिर तभी तो केंद्र सरकार द्वारा प्रायोजित योजना (मनरेगा) आदि के लिए मजदूर मिल सकेंगे। अब तक तो सरकारी विद्यालय के बच्चे हर स्तर की परीक्षा में अपनी पहचान कायम रख रहे थे। पर अब ऐसा नहीं होने वाला, क्योंकि नियोजित एक चौथाई पैसे में अपना सौ प्रतिशत कैसे दे सकेगा?

नियमित को तो बची- खुची नौकरी के बदले एक मुश्त मुआवजा दे जबरन सेवा निवृति की तैयारी की जा रही है, ताकि न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी। सब नियोजित फिर समान काम समान वेतन का मुद्दा तो ऐसे ही खत्म। 

यही कहा जाएगा एक तीर से कई निशाने साधे गए हैं। सरकारी विद्यालयों में बच्चों की संख्या तो होगी पर शिक्षा में गुणवत्ता न होगी। नतीजा राज्य व केंद्र सरकार के सभी विभागों में रिक्तियां तो होंगी पर योग्य अभ्यर्थी न मिलेंगे। अब ऐसे में आरक्षण ज्यों का त्यों धरा रह जायेगा।

हींग लगे न फिटकिरी रँग भी चोखा होय
अंत में इतना ही कहना चाहूंगी कि नियोजित शिक्षक Xerophytic प्लांट की तरह हैं, जिन्होंने अपनी जरूरतें कैक्टस की भांति समेट कर तना पर्ण व पर्ण कांटे में परिणित हो चुके हैं। जैसे बिना पानी के भी ये अपना अस्तित्व बचाये रखते हैं ठीक वैसे ही बिन वेतन ये नियोजित शिक्षक भी अपना अस्तित्व बचाये हुए हैं। और राज्य सरकार ने नियोजितों की बहाली उसी तर्ज पर की है, जैसे वन विभाग वृक्षारोपण में बबूल लगाते हैं। मेहनत भी कम लागत भी कम। "हींग लगे न फिटकिरी रँग भी चोखा होय।'

दस वर्षों के सेवा काल में याद नहीं, किस वर्ष नियमित रूप से हर महीने वेतन मिला है। आज भी दो महीने का वेतन का कहीं कोई जिक्र नहीं, तीसरा महीना भी आधा बीत गया। सवाल उठता है क्या नियोजित शिक्षकों को अपना परिवार, अपना शौक, बच्चों की जरूरतें पूरी करने का कोई अधिकार नहीं?  


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