रत्‍ती भर भी सोना, मोदी जी ने इधर उधर नहीं किया, लेकिन सवाल जब हम विदेश से कर्ज ले रहे हैं ऐसे में सोना खरीदा क्यों जा रहा है?



बात सोने की             


'सोना कितना सोना है, सोने जैसा तेरा मन.. हीरो तू मेरा हीरो है, विलेन जैसा काम न कर', एक फिल्म का गाना है सुना होगा... मगर यह राजनीति है. यहाँ हीरो या विलेन से कोई मतलब नहीं होता. मतलब होता है कुर्सी से, पैसों से, जिन्हें 'पेटी' और 'खोखा' कहा जाता है. घोटाले इतने अधिक होने लगे हैं कि जहाँ हाथ डालो, कोई न कोई घोटाला निकल ही आयेगा. अब बात सोने की निकली है.



चुनाव का मौसम है कोई भी अपने हित के लिए कुछ भी फैला सकता है सो हमें यह ध्यान रखना होता है, कहीं कुछ गलत तो नहीं. कुछ अखबारों और सोशल मीडिया में केंद्रीय बैंक द्वारा 2014 में कुछ सोना विदेश भेजने की रिपोर्ट के बाद हमारे पास भी यह खबर आई, लेकिन हमें यह सही नहीं लगी, हमने इसे प्रकाशित नहीं किया और सच्चाई जानने की कोशिश की तो पता चला यह गलत है. मोदी जी ने रत्‍ती भर भी सोना इधर से उधर नहीं किया, लेकिन RBI की रिपोर्ट से एक यह लौंचा अवश्य हो गया कि एक ओर जब हम विदेश से कर्ज ले रहे हैं ऐसे में सोना खरीदा क्यों जा रहा है?


असल में मोदी सरकार ने मई 2014 में सत्ता संभालते ही देश का 200 टन सोना रिजर्व बैंक से निकालकर चोरी छिपे विदेश भेज दिया था, यह सनसनीखेज़ आरोप दक्षिण दिल्ली से चुनाव लड़ रहे एक उम्मीदवार नवनीत चतुर्वेदी ने लगाया. बस फिर क्या था 2014 में सत्ता सँभालते ही मोदी जी ने पहला काम 200 टन सोना विदेश भेज कर किया, यह खबर आज खूब वायरल हुई. 

कांग्रेस पार्टी ने भी ट्विटर पर रिपोर्ट ट्वीट की, जिसमें 2014 में RBI का 200 टन सोना स्विट्जरलैंड भेजने की बात कही गई. पार्टी ने रिपोर्ट टैग करते हुए कहा था कि क्या मोदी सरकार ने गुपचुप तरीके से RBI का 200 टन सोना 2014 में स्विट्जरलैंड भेजा? लेकिन यह खबर सही नहीं निकली. 

आखिरकार आज शुक्रवार को ही भारतीय रिजर्व बैंक ने बयान जारी कर कहा कि 2014 या उसके बाद देश से बाहर रत्‍ती भर भी सोना नहीं भेजा गया है. RBI के बयान के अनुसार दुनिया भर में केंद्रीय बैंक अपना सोना सुरक्षित रखने के लिए उसे बैंक ऑफ इंग्लैंड समेत अन्य देशों के केंद्रीय बैंकों में रखते रहे हैं और यह एक सामान्य गतिविधि है. बयान में आगे कहा गया है कि केंद्रीय बैंक ने 2014 या उसके बाद देश से रत्ती भर भी सोना अन्य देशों में नहीं भेजा है. अत: इस बारे में मीडिया में जो रिपोर्ट आई है, वह तथ्यात्मक रूप से पूरी तरह गलत हैं.  


स्‍वर्ण भंडार रिकॉर्ड स्‍तर पर पहुंचा
बल्कि यहाँ तक कि स्‍वर्ण भंडार रिकॉर्ड स्‍तर पर पहुंचा. ओवरसीज चाइना बैंकिंग कॉर्प के अर्थशास्‍त्री होवेई ली के मुताबिक RBI 2019 में 15 लाख औंस सोना खरीद सकता है. अंतरराष्‍ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के मुताबिक 2018 में RBI ने कुल 42 टन सोने की खरीद की है. जनवरी और फरवरी में सोने की और खरीद करने के बाद देश का स्‍वर्ण भंडार वर्तमान में रिकॉर्ड उच्‍च स्‍तर पर पहुंच गया है. इस समय RBI के पास लगभग 609 टन सोने का भंडार है. 

लेकिन अब सवाल इस बात पर उठने लगे हैं कि गत वर्ष 3 सितंबर की शाम को एक खबर आई थी. खबर ये थी कि भारतीय रिजर्व बैंक ने 9 साल के बाद सोना खरीदा है. अब हम-आप जैसे लोग तो घर में बेटी या बेटे की शादी पर सोना खरीदते हैं, कोई त्योहार होता है, एनिवर्सरी होती है तो सोना खरीदते हैं या फिर अगर पैसे बच जाते हैं तो सोना खरीद लेते हैं. लेकिन सोना रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने खरीदा है. उस बैंक ने जो  देश का सबसे बड़ा बैंक है और जिसके बल पर पूरे देश की अर्थव्यवस्था चलती है. 

उस समय की खबर के अनुसार बैंक ने जो सोना खरीदा है, उसका वजन 8.46 टन बताया गया था. रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की हर साल जारी होने वाली रिपोर्ट के मुताबिक सोने की इस खरीद के बाद रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के पास 574.69 टन सोना बताया गया. इससे पहले रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने 2009 में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से 200 टन सोना खरीदा था. 30 जून 2018 को रिजर्व बैंक के पास कुल 566.23 टन सोना था. पिछले साल यानी कि 2017 में 30 जून को रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के पास कुल 557.77 टन सोना था. 


जब हम विदेश से ऋण ले रहे हैं, ऐसे में सोना क्यों खरीदा जा रहा है?    
सोना एक ऐसी चीज़ है, जिसकी पूरी दुनिया में स्वीकार्यता है. दुनिया के हर देश की अपनी अलग-अलग मुद्रा है. भारत में रुपया चलता है, तो अमेरिका में डॉलर. यूरोपियन यूनियन के देशों में यूरो चलता है, तो रुबल, रियाल, टका, दिनार, फ्रैंक, दिरहम, पाउंड जैसी मुद्राएं भी दुनिया के कई देशों में चलती हैं. एक देश की मुद्रा दूसरे देश में नहीं चलती है. इसलिए जब एक देश को दूसरे देश से कोई खरीदारी करनी होती है, तो वो अंतरराष्ट्रीय मुद्राओं जैसे डॉलर या फिर यूरो में भुगतान करता है. लेकिन अगर किसी देश की अर्थव्यवस्था को इस लिहाज से मापना हो कि वो विदेशों से कितनी खरीदारी कर सकती है तो पूरी दुनिया में इसके लिए एक जो कॉमन चीज है वो है सोना. 1946 में इंग्लैंड से इसकी शुरुआत हुई थी. 

उस वक्त इंग्लैंड पूरी दुनिया का चौधरी माना जाता था, इसलिए उसके बनाए नियम अधिकांश देशों पर लागू होते थे. इसके बाद ये माना जाने लगा कि जिस देश के पास जितना ज्यादा सोना होता है, वो देश दूसरे देशों से उतनी ज्यादा खरीदारी कर सकता है. अब भारत का सबसे बड़ा बैंक रिजर्व बैंक है, इसलिए वो अपने पास सोना रखता है, ताकि उसके जरिए भारत दूसरे देशों से खरीदारी कर सकता है. ज़रूरत पड़ने पर कोई भी देश सोने को गिरवी रखकर उस देश से नकदी या सामान ले सकता है. इसलिए भारत ने अपने सोने का स्टॉक बढ़ाने के लिए इस सोने की खरीद की है. हालांकि ये खरीद कहां से की गई है और इसके लिए कितनी पेमेंट की गई है, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने इस बारे में कोई जानकारी नहीं दी.  साथ ही यह भी कि जब हम विदेश से ऋण ले रहे हैं, ऐसे में सोना क्यों खरीदा जा रहा है? 

असल में हर देश अपने पास सोने का एक भंडार रखता है. एक जानकारी के अनुसार फिलहाल सबसे ज्यादा सोने का भंडार अमेरिका के पास है. अमेरिका के पास अभी 8133.5 मीट्रिक टन सोना बताया जाता है, जो उसके विदेशी मुद्रा भंडार का कुल 74.5 प्रतिशत है. दूसरे नंबर पर जर्मनी है, जिसके पास 3369.9 मीट्रिक टन सोना है. इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष भी अपने पास सोने का भंडार रखता है. इटली, फ्रांस, रूस, चीन, स्विटजरलैंड, जापान, नीदरलैंड जैसे दुनिया के कई देश स्वर्ण भंडार रखते हैं. अब भारत को ही लें तो भारत के पास सोने का जो भंडार है, वो भारत की कुल विदेशी मुद्रा का करीब 5.5 फीसदी है.  

- चित्रांश     






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