बेतहाशा खर्च पर लगाम लगाना मुश्किल तो खुली छूट ही दे दो, ताकि पैसे का बहाव नीचे तो आये




चुनावों में बेतहाशा खर्च पर लगाम लगाना कल्पना के भी बाहर लगता है तो क्या ऐसे में बेहतर नहीं होगा कि चुनाव आयोग खुली छूट ही दे दे, कम से कम इसके बदले बेरोजगारों और गरीबों को चुनाव प्रचार में जो रोजगार मिलता था, उसे ही चालू करवा दे। इससे कम से कम पैसे का बहाव नीचे की ओर तो हो पाएगा।



संजय सक्सेना 

भारत में चुनावों में बाहुबल पर तो काफी कुछ अंकुश लगा दिया गया है, परंतु चुनावी खर्च निर्वाचन आयोग के नियंत्रण से पूरी तरह बाहर होता जा रहा है। बड़े पैमाने पर पर्यवेक्षकों की तैनाती और मतदाताओं को लुभाने के लिए बड़े स्तर पर दी जाने वाली नकदी, सोना, शराब और मादक पदार्थों की जब्ती के बावजूद आयोग इस मामले में असहाय ही दिखता है। कहने को चुनाव प्रचार के तमाम तरीकों पर प्रतिबंध लगा दिया गया है, जो फिजूलखर्ची कही जाती थी, लेकिन उसका उलटा ही असर देखने को मिल रहा है। चुनाव प्रचार के दौरान जिन तरीकों से गरीब और बेरोजगारों को कुछ पैसा मिल जाया करता था, सामान्य कार्यकर्ता की जेब भी भर जाती थी, वही बंद हो गया। लेकिन चुनाव लगातार खर्चीले होते जा रहे हैं।


कहने को चुनाव प्रचार के तमाम तरीकों पर प्रतिबंध लगा दिया गया है, जो फिजूलखर्ची कही जाती थी, लेकिन उसका उलटा ही असर देखने को मिल रहा है। चुनाव प्रचार के दौरान जिन तरीकों से गरीब और बेरोजगारों को कुछ पैसा मिल जाया करता था, सामान्य कार्यकर्ता की जेब भी भर जाती थी, वही बंद हो गया। लेकिन चुनाव लगातार खर्चीले होते जा रहे हैं। 

लोकसभा चुनाव में खर्च आसमान छू रहा है। सभी प्रमुख राजनीतिक दल प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में दस-दस करोड़ रुपए तक खर्च कर रहे हैं। कई जगहों पर प्रत्याशी भी इतनी रकम लगा रहे हैं, जिससे यह आंकड़ा 20 करोड़ रुपए तक जा रहा है। आंध्र प्रदेश और कर्नाटक के कुछ चुनाव क्षेत्रों में तो प्रत्याशी द्वारा सांसद बनने के लिए सौ-सौ करोड़ रुपए तक खर्च करने की खबरें आ रही हैं। ऐसे मे कोई कल्पना ही कर सकता है कि सांसद बनने के बाद ये क्या करेंगे? 

चुनाव आयोग द्वारा बड़े राज्यों के लोकसभा क्षेत्रों में खर्च की सीमा बढ़ाकर 70 लाख कर दी गई है, लेकिन इतने पैसे में तो आज विधानसभा चुनाव तक नहीं लड़ पाते हैं। इस तरह अगर प्रत्येक लोकसभा क्षेत्र में दो गंभीर प्रत्याशियों को भी मान लें, तो वे और उनकी पार्टी चुनावों में 20,000 करोड़ रुपए से अधिक रकम खर्च करने जा रहे हैं, जो मुख्य रूप से मतदाताओं को रिश्वत ही है।


देखा जाए तो चुनावों में धनबल का बढ़ता इस्तेमाल गंभीर चिंता का विषय है। चुनाव आयोग के एक आंकड़े के अनुसार 23 अप्रैल तक करीब 3200 करोड़ रुपए की ऐसी सामग्री बरामद की जा चुकी है, जिसका इस्तेमाल मतदाताओं को लुभाने में किया जाना था। इनमें नकदी के अलावा शराब एवं अन्य वस्तुएं हैं। प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में प्रत्याशियों द्वारा पानी की तरह पैसा बहाए जाने की इस स्थिति के बीच आम नागरिक लोकतांत्रिक प्रक्रिया से बाहर होता प्रतीत हो रहा है। सांसदों की बढ़ती आमदनी भी देश में लोकतंत्र की गतिशीलता को मापने का एक और अहम पैमाना है।

नेशलन इलेक्शन वॉच व एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉम्र्स ने इस संदर्भ में व्यापक जानकारियां उपलब्ध कराई हैं। ये जानकारियां प्रत्याशियों द्वारा नामांकन के दौरान दायर शपथ-पत्रों पर आधारित हैं। निर्वतमान लोकसभा के 521 सांसदों के हलफनामों के विश्लेषण में जो निष्कर्ष निकले, वे बेहद चिंतित करने वाले हैं। उक्त संस्थाओं के विश्लेषण के अनुसार 521 सांसदों में से 174 ने बताया कि उनके खिलाफ आपराधिक मामले चल रहे हैं। यह आंकड़ा कुल सांसदों के एक तिहाई के बराबर है। इनमें भी 106 सांसदों के खिलाफ तो गंभीर आपराधिक मामले लंबित हैं, जिनमें हत्या, हत्या का प्रयास, अपहरण, सांप्रदायिक विद्वेष फैलाने जैसे मामले शामिल हैं। 

मौजूदा लोकसभा में भाजपा के 35 प्रतिशत और कांग्र्रेस एवं अन्नद्रमुक के 16 प्रतिशत सांसद आपराधिक पृष्ठभूमि के हैं। हालांकि इस सूची में शिवसेना सबसे ऊपर है, जिसके 83 प्रतिशत सांसदों का आपराधिक अतीत रहा है। 521 मौजूदा सांसदों में से 430 यानी 83 प्रतिशत करोड़पति हैं, जिनकी औसत संपत्ति भी 14.72 करोड़ रुपए आंकी गई।

लोकसभा चुनाव के पहले दो चरणों में प्रत्याशियों के शपथ-पत्रों का विश्लेषण भी चौंकाने वाला है। 2,923 प्रत्याशियों के 2,856 शपथ-पत्रों का विश्लेषण दर्शाता है कि इनमें से 464 प्रत्याशी आपराधिक पृष्ठभूमि के हैं। 313 के खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले लंबित हैं। धनबल के मामले में कुल 824 यानी तकरीबन 29 प्रतिशत उम्मीदवार करोड़पति हैं, जिनकी औसत संपत्ति पांच करोड़ रुपए से अधिक है। हालांकि मौजूदा चुनाव में आपराधिक पृष्ठभूमि के उम्मीदवारों की संख्या में कमी आई है, मगर सिर्फ यही सही तस्वीर नहीं है। एक दुखद पहलू यह भी है कि स्वच्छ छवि वाले प्रत्याशियों की तुलना में आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों के जीतने की संभावनाएं अधिक होती हैं।

चुनाव आयोग को इस हकीकत को पहचानते हुए मतदाताओं को रिश्वत खिलाने के तौर-तरीकों पर विराम लगाना चाहिए। बेतहाशा खर्च पर लगाम लगाना तो कल्पना के भी बाहर लगता है। तो क्या ऐसे में बेहतर नहीं होगा कि चुनाव आयोग खुली छूट ही दे दे, कम से कम इसके बदले बेरोजगारों और गरीबों को चुनाव प्रचार में जो रोजगार मिलता था, उसे ही चालू करवा दे। इससे कम से कम पैसे का बहाव नीचे की ओर तो हो पाएगा।





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