'एक बात कहूँ' खत गुमनाम प्रियतमा के नाम


हे सखी संजीवनी
वक़्त के साये में जिम्मेदारियाँ भले
आसपास हों, लेकिन तुम 
अक़्सर जहन में
शीतलता भर जाती हो

वो
तुम्हारा आहिस्ता से 
मेरी 'बाजू' 
पकड़ कर ये कहना

'एक बात कहूँ'
जाने कितने सरल से लम्हों को
मुझमे संजीवनी 
सा भर जाया करता है
औऱ
मोहक सी तुम 
तुम छू जाती हो मुझे 
सरसराती हवा में
कानों के पास से गुजरती
हुई तुम !!
हवाओ में डोलते तुम्हारे बाल जब
बार बार तुम्हे सताते हैं 

उस मंज़र में
देर तलक तुम्हारा होना मेरे 
आसपास ठहर जाता है 

सुनो !!
एक बार यूँ ही आ जाना 
पेड़ की छांह में 

मेरे आखरी ख़त लिखने से पहले

- मनु    

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