किसकी नजर लग गयी दिल्ली की खुशहाली को?




कभी नील्सन के सर्वे में दिल्ली को सबसे खुशहाल शहर बताया गया था। बंगलुरु दूसरे नंबर पर था और मुंबई तीसरे पर। अब हम खुशियों के ग्लोबल इंडेक्स में 122वें नंबर पर हैं। आखिर देश के दिल दिल्ली की खुशहाली को किसकी नजर लग गयी? 



देश के दिल दिल्ली से 
आकाश नागर 

मुझे याद है कई बरस पहले नील्सन के सर्वे में दिल्ली को सबसे खुशहाल शहर बताया गया था। बंगलुरु दूसरे नंबर पर था और मुंबई तीसरे पर थी। वहीं मुंबई जहां शेयर बाजार उछाल मारता है तो हम पत्रकार लोग बिजनेस पेज पर इस खबर को लीड बना देते हैं, मगर हम मुंबई का हैपीनेस इंडेक्स कभी नहीं बताते। अब हम खुशियों के ग्लोबल इंडेक्स में 122वें नंबर पर हैं। 





सस्टेनेबल डवलेपमेंट सोल्यूशन नेटवर्क की रिपोर्ट में तो हम एक सौ चालीसवें नंबर पर हैं। सोचता हूं कि तब नील्सन ने क्या सोच कर दिल्ली को भारत का सबसे खुश शहर बताया था? क्या देश की राजधानी सच में सबसे खुशहाल है? या उसकी उपभोक्ता आदतें उसे पल दो पल खुश रहने का झांसा देती हैं।

कोई दो राय नहीं कि हम दिल्ली वालों की आदतें बहुत बदली हैं, लेकिन जीने का नजरिया नहीं बदला है। लोग गैजेट पर बेशुमार खर्च करते हैं। इससे खुशियां तो मिली हैं, मगर वह सतही किस्म की हैं। जिस चीज को पाने के लिए हम बेताब रहते हैं, वह मिल जाने के बाद उसकी खुशी कितने दिनों तक रहती है? एक सप्ताह या एक महीना या बहुत हुआ तो साल भर। फिर दूसरी किसी खास चीज की ख्वाहिश कुलबुलाने लगती है मन में।


अभी मैं मेट्रो में सफर कर रहा हूं और देख रहा हूं दिल्ली वालों को। क्या उनके चेहरे पर खुशी है? आम तौर पर यात्रियों के चेहरे पर चिंता की बारीक लकीरें दिख रही हैं। किसी चेहरे पर अधूरे काम को पूरा करने की बेचैनी है, तो किसी के चेहरे पर जीवन की असंतुष्टि की रेखाएं हैं। इस लिहाज से मुझे लग रहा है कि जीवन स्तर को नाप कर खुशी की तलाश नहीं की जा सकती। 




भारत जैसे देश में जहां इतनी ज्यादा बेरोजगारी है। निजी क्षेत्र के लाखों लोगों को इतनी भी सैलरी नहीं मिलती कि वे घर का खर्च ठीक से चला सकें। ऐसे में वे परिवार को भला क्या खुश रख पाते होंगे? फिर भी वे खुश रहते हैं।

कोई खुश है और कोई क्यों नहीं है, आज भी रहस्य है। मेरे लिए यह कुछ ज्यादा ही है। वर्ल्ड हैपीनेस रिपोर्ट तैयार करने वालों ने खुशहाली का स्तर जानने के लिए मोटे तौर पर जो पैमाना बनाया, उसमें सबसे पहले व्यक्ति की आय, फिर स्वास्थ्य को रखा। इसके बाद सामाजिक सुरक्षा को मानदंड बनाया। यही नहीं खुद फैसले लेने की कितनी स्वतंत्रता है, यह बात भी शामिल की। इस मानदंड पर नार्वे खुश देशों में नंबर एक है। तो फिर हम क्यों नहीं है?




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