राजनीति के महाभारत में क्या एक बार फिर द्रोणाचार्य की अर्जुन के हाथों पराजय होगी?



एक रिपोर्ट / लोकसभा संसदीय क्षेत्र क्रमांक 29


इतिहास गवाह है कि चाहे एकलव्य हो या फिर अर्जुन हार हमेशा गुरू द्रोणाचार्य की ही हुई है। अब इसे छल कहे या कपट, जब धर्मयुद्ध हो रहा था, तब गुरू द्रोणाचार्य से हथियार टेकने के लिए युधिष्ठर को छद्म झूठ का सहारा लेना पड़ा, लेकिन वर्तमान के राजनैतिक द्धंद में एक बार फिर गुरू और शिष्य दोनो एक दुसरे के सामने खड़े ही नहीं बल्कि अड़े हुए हैं। 
बैतूल से पत्रकार रामकिशोर पंवार की रिर्पोट 

जब किसी ने पुछा प्रश्र की वर्तमान समय में गुरू खड़ा है तब शिष्य कैसे टिक पाएगा या जीत पाएगा! आजाद भारत की वर्तमान राजनीति के इस घोर कलयुग के समय उदाहरण बन एक बार फिर द्धापर युग ही आया जब शिष्य ने यह कह कर सनसनी पैदा कर दी कि अर्जुन के सामने गुरू द्रोणाचार्य की हार हुई है। ऐसे में पेशे से शिक्षक दुर्गादास उइके जो गायत्री परिवार से जुड़े है और कर्मकांडी आदिवासी समाज के ब्राहमण कहे जाते है। राज प्रधान गोत्र से आने वाले दुर्गादास उइके परम पूज्य गुरूदेव आचार्य श्री राम शर्मा के द्वारा स्थापित अखिल भारतीय गायत्री परिवार के अहम सदस्य होने के कारण धर्म - कर्म और पूजा - आरधना से लेकर पितृ तर्पण जैसे कार्य भी नि:शुल्क करवाते चले आ रहे है। 



आदिवासी समाज में सबसे श्रेष्ठ माने जाने वाले राज प्रधान के साथ विडम्बना कहे या नीयति का क्रम आज तक आदिवासी समाज के बीच प्रधान में रोटी - बेटी के सबंद्ध नहीं हो सके है। रिश्तो की डोर से बंध नही पाने के कारण आदिवासी समाज का प्रधान जनजाति से रिश्ता सिर्फ पंडित और यजमान का ही बन सका है। हालाकि इस सवाल पर शिक्षा में वकालत के बाद न्यायाधीश की परीक्षा के लिए आवश्क्य योग्यता हासील कर चुके रामू टेकाम तर्क देते है कि वे स्वंय राज प्रधान एवं आदिवासी समाज के बीच किसी भी प्रकार की दूरियां नहीं मानते है क्योकि जंगल में रहने वाली सभी जनजातियां आदिवासी ही है। 

कांग्रेस से प्रत्याशी रामू टेकाम की बीते छै साल से आदिवासी समाज के बीच घुसपैठ ने उसे एक ऐसा नेटवर्क दिया है जिसे ध्वस्त कर पाना वर्तमान भाजपा प्रत्याशी दुर्गादास के लिए असंभव है। मोदी के नाम की नैया गैर आदिवासी समाज से वोट पा सकती है लेकिन आदिवासी समाज आज भी एक झण्डा एवं एक डण्डा के साथ खड़ा दिखाई देता है। 

बैतूल - हरदा - हरसूद संसदीय क्षेत्र क्रमांक 29 में वर्तमान समय में 17 लाख 34 हजार 849 मतदाता है। 8 विधानसभा क्षेत्रो में 4 विधानसभा जिसमें हरसूद , टिमरनी, घोडाडोंगरी, भैसदेही आदिवासी समाज के लिए सुरक्षित है जबकि एक सीट आमला विधानसभा अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है। 

तीन सीट सामान्य है जिसमें बैतूल, मुलताई, हरदा है। वर्तमान के विधानसभा चुनाव में जहां एक ओर भाजपा के पास आमला, हरदा, हरसूद, टिमरनी है वही कांग्रेस के पास घोडाडोंगरी, मुलताई, बैतूल, भैसदेही है जिसमें सबसे अधिक वोटो से पूरे होशंगाबाद संभाग में जीत भैसदेही से दो बार विधायक बने कांग्रेस के धरमूसिंह सिरसाम ने प्राप्त की है। आदिवासी समाज के लिए आरक्षित दो सीटे भैसदेही एंव घोडाडोंगरी कांग्रेस के पास है जो उसने भाजपा से छीनी है। 


भैसदेही विधानसभा क्षेत्र में 2 लाख 37 हजार 263 मतदाता है। बीते विधानसभा चुनाव में यहां पर कांग्रेस के धरमू सिंह को 1 लाख 45 हजार 592 वोट मिले थे। यहां पर भाजपा मात्र 73 हजार पर सीमट कर रह गई। पड़ौसी घोडाडोंगरी सीट सबसे अधिक समय तक भाजपा के पास रही जबकि भैसदेही कांग्रेस के पास से आती - जाती रही। भैसदेही सीट पर वैसे तो एक ही परिवार का कब्जा रहा जिसके चलते आदिवासी समाज के नाम पर आरक्षित सीट पर कोरकू समाज के चौहान परिवार का एकाधिकार रहा। १९६२ में पहली बार स्वर्गीय सिंह दददू सिंह बालाजी चौहान चुनाव जीते। 1967 में भी दददूसिंह चुनाव जीते 1972 में कांग्रेस के काल्या सिंह चौहान जो दददू सिंह के भाई वे चुनाव जीते। 

पतिराम चौहान 1977 में चुनाव जीतेे। 1980 में स्वर्गीय केशर सिंह और 1985 में स्वर्गीय सतीश चौहान चुनाव जीते। 1990 में स्वर्गीय केशर सिंह चौहान के बाद १९९३ में कांग्रेस के ज्ञान सिंह कुमरे आदिवासी , उसके बाद १९९८ में महेन्द्र सिंह चौहान एक बार फिर २००३ में विधायक कोरकू जनजाति बाहुल्य भैसदेही विधानसभा सीट में अभी तक की लड़ाई कोरकू विरूद्ध गोण्ड रही है। 

हालांकि कोरकू भी विलुप्त जनजातियों में शामिल है। इस बार का चुनाव आदिवासी समाज में होना है जिसमें पूरी लड़ाई प्रधान विरूद्ध गोण्ड के बीच में आ खड़ी है। गोण्ड आदिवासी समाज की मूल जाति कहीं जाती है। जिसे मुख्य रूप से रंग रूप और भाषा तथा पहनावे से असली कहा जाता है। इस बार बैतूल संसदीय क्षेत्र में तिलक और भाले की लड़ाई देखने को मिल रही है। ऐसा जानकारो का मानना है कि दुर्गादास उइके गायत्री परिवार के साथ जुड़े रहने के कारण लम्बा तिलक लगाते एवं जनेऊ संस्कार का पालन करते है जबकि आदिवासी लोग जनेऊ धारण नहीं करते है। 

आदिवासी समाज बड़े देव शंकर जी के उपासक है इसलिए वे भगवा या लाल रंग का टीका लगाने के बजाय मिटट्ी - भभूत का टीका लगाते है। आदिवासी समाज के बीच छै देव और सात देव की दिवार बनी हुई है। आपस में एक दुसरे से रिश्तेदारी करने में आदिवासी सिर्फ आदिवासी में ही सबंद्ध बनाते है। संस्कार - रीति - रिवाज और सबंध ही लोकसभा से लेकर ग्राम सभा के चुनाव में हार जीत का फैसला करते है। 


बैतूल संसदीय क्षेत्र में चार आदिवासी सीटो में दो कांग्रेस के पास दो भाजपा के पास है लेकिन जनसंख्या और मतदाता के अनुपात में सबसे अधिक वोटर वाली घोडाडोंगरी एवं भैसदेही कांग्रेस के पास है। सामान्य की दो बड़ी सीटे कांग्रेस के पास मुलताई और बैतूल है जबकि भाजपा के पास मात्र हरदा है। संसदीय क्षेत्र की एक मात्र अनुसूचित जाति की सीट बीते चार चुनाव से भाजपा के पास ही है। ऐसे में अब निर्णय हार जीत का सिर्फ आदिवासी समाज के लोग ही करेगें जिनकी मतदाता संख्या 7 से 8 लाख के लगभग है। 

इस बार के चुनाव में यूं तो कांग्रेस सबसें अधिक मजबूत स्थिति में है जिसके पीछे प्रमुख कारण जिले से मंत्री मण्डल में सुखदेव पांसे का केबिनेट मंत्री का होना है जो भाजपा के 15 सालो में जिले को नहीं मिला। वैसे भाजपा बैतूल जिले से आज तक किसी को मंत्री नहीं बना सकी जबकि कांग्रेस से स्वर्गीय रामजी महाजन, स्वर्गीय डाँ अशोक साबले, प्रताप सिंह उइके दो - दो बार मंत्री रहे। 

राज्यमंत्री के रूप में राजेन्द्र जैसवाल, स्वर्गीय घनश्याम तिवारी जैसे कई नाम है। इतना ही नहीं केन्द्रीय मंत्री मण्डल में असलम शेर खान भी मंत्री रहे। बैतूल - हरदा संसदीय क्षेत्र में एक बार फिर मैनेजमेंट गुरू को लोगो ने घेर लिया है और इस बार भी उनका राजनैतिक वध करने के लिए उनके अपनी ही पार्टी के विरोधियों ने घेराबंदी शुरू कर दी है। समझा जा रहा है कि इस बार बैतूल जिले से भाजपा की हार प्रदेश भाजपा कोषाध्यक्ष के राजनैतिक भविष्य को ग्रहण लगा सकती है। 

संघ से टिकट लाने के बाद दुर्गादास उइके का भाजपा के निष्ठावान कार्यकत्र्ताओं से दूरियां बना लेना और उनकी मोदी स्ट्राईल का भाषण शैली लोगो मे नीरसता ऊबाऊपन की परिस्थितियों को पैदा करने में अहम भूमिका निभा रही है। सासंद बनने के पूर्व ही व्ही आई पी ट्रीटमेंट भाजपा के निष्ठावान कार्यकत्र्ताओं को भले ही दूर न कर पाए लेकिन लोगो का दूर होना शुरू हो गया है। 

भाजपा की सासंद श्रीमति ज्योति बेवा प्रेम सिंह धुर्वे की टिकट कटने के बाद जिले में पवार समाज एवं धुर्वे उपजाति के लोगो का भाजपा से मोह भंग होना स्वभाविक है। कांग्रेस की बागी श्रीमति पुष्पा पेन्द्राम कांग्रेस के कितने वोट काट पाएगी यह तो समझ बताएगा लेकिन हार जीत की जंग में अभी से एक दुसरे को पटखनी देने का क्रम जारी है।




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