राजनीतिक दलों के नेता व कार्यकर्ताओं की अमर्यादित भाषा, क्या यह मानें कि 'हम जंगली थे, जंगली हैं, और जंगली रहेंगे?'




राजनीतिक दलों के नेता व कार्यकर्ताओं की अमर्यादित भाषा भारतीय संस्कृति की दुनिया में खासी बदनामी कर रही है. क्या यह मानें कि हम जंगली थे, जंगली हैं, और जंगली रहेंगे?




संजय श्रीवास्तव 

न दिनों भारतीय राजनीतिक दलों के नेता व कार्यकर्ता जिस स्तर की भाषा का प्रयोग अपने राजनीतिक विरोधियों के लिए कर रहे हैं, उससे भारतीय संस्कृति की दुनिया में खासी बदनामी हो रही है. किसी भी सभ्य संस्कृति में इस तरह की अमर्यादित भाषा का प्रयोग वर्जित है, हम सिद्ध कर रहे हैं कि हम जंगली थे, जंगली हैं, और जंगली रहेंगे. 

अब ऐसा लगता है मारपीट की ही कसर इन नेताओं ने छोड़ी है. जनमानस को भी अपने मूर्ख होने का प्रमाण यह नेता दे रहे हैं, लगता है राजनीतिक दलों का कार्यकर्ताओं पर कोई नियंत्रण नहीं है या फिर उन्होंने इन गुंडे बदमाश, जो कार्यकर्ता कहलाते हैं, खुली छूट दे रखी है. ईश्वर के लिए अब यह लोग बाज आ जाएं, भारत पर इनका बड़ा उपकार होगा. जनता की नजरों में संस्कृति की दुहाई देने वाले यह राजनीतिक लोग अब नंगे हो चुके हैं, जनता हंस रही है. इन के विवेक पर.  



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