भूख इतनी थी की वो मिट्टी खा रहे थे, अंतिम परिणति मृत्यु, वह भी दुनिया की छःठी सबसे बड़ी अर्थव्यस्था वाले देश में



अगर यही देश का विकास है और यही आप का मानक तो माफ़ करिये मैं हर उस व्यवस्था को निहायत धूर्तता के अलावा कुछ न कहूंगा. अंधभक्ति और अंधविरोध के बीच कुछ मुद्दे ऐसे होते हैं, जिन पर सबको एक साथ मिल कर मंथन करना चाहिए, लेकिन दु:ख है कि गरीबी दूर करने और गरीबी हटाने के नारों के दम पर न जाने कितने चुनाव लड़े जाने के बावजूद हालात जस के तस हैं. आज जबकि भारत दुनिया की छःठी सबसे बड़ी अर्थव्यस्था है, ऐसे में भूख और कुपोषण से मृत्यु का होना, अपने आप में बड़ा और गम्भीर सवाल है.



सचिन आर पांडेय

विकास के नाम पर सत्त्ता में आने के बाद सेना और पाकिस्तान का नाम लेकर वोट मांगने और धर्म की ध्वजा को तिरंगे से ऊपर रख कर अपनी धूर्त धर्मवादिता का प्रदर्शन करते हुए एक बार फिर सत्ता को गले लगाने की लालसा ने कुछ मूल भूत चीजें या तो अनदेखी कर दी गयी हैं या तो भुला दी गयी हैं. 



देश में कितना विकास हुआ, हम कितना आगे बढ़े, और विश्व में हमारा कद कितना बढ़ा है, ये आकलन का प्रश्न है और इन सब के बीच जिस बात ने मुझे व्यथित किया वो ये कि स्मार्ट सिटी और बुलेट ट्रेन वाले देश में अभी 2 या 3 दिन पहले आंध्र प्रदेश के अनंतपुर जिले में कुपोषण और भुखमरी से 3 साल के 2 बच्चों की मृत्यु होना. 
भूख इतनी थी की वो मिट्टी खा रहे थे, और अंतिम परिणति मृत्यु.  

कभी आकलन करिये, और अपनी अंतरात्मा से पूछिए, क्या हमारे धर्म ने जिसकी छाती पीट पीट कर वोट माँग रहे हैं यही सिखाया था, या यही विकास का चरम बिंदु है? मैं हतप्रभः हूँ और हैरान भी कि कहीं भी इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना का जिक्र तक नहीं है और जो है तो वो सिर्फ गरीबी हटाने के नारे. मैं किसी एक दल या सरकार को दोष नहीं देना चाहता, लेकिन मेरा सवाल देश के लोगों से जरूर है कि उनकी प्राथमिकता क्या है?

एक को खाने के लिए रोटी की जगह मिट्टी है और दूसरे को सुबह सुबह पिज्जा! और अगर आप की नज़र में ये सही है तो आप को फ्रांस की क्रांति के तात्कालिक कारण याद हैं, अगर नहीं तो जरूर पढ़ लें. 

वैसे भी भूखों का भी कोई धर्म होता है साहब! उनका भी कोई लोकतंत्र होता है साहब! अगर होता है तो ये तय करें कि इतनी विषमता क्यों? करोड़ो अरबों का खर्च कर बेटे बेटियों की शादी करने वालों को देखिये और उनसे पूछिये कि इंसानियत नाम का कोई धर्म है भी की नही??

सवाल करिये देश के महानुभावों से, जिन्होंने अपने हर भाषण में गरीबी दूर करने की बात कही और उनसे भी जो अविरल गंगा को उनके हाल पर छोड़ कर विकास की गंगा बहाने चले थे.

अगर यही देश का विकास है और यही आप का मानक तो माफ़ करिये मैं हर उस व्यवस्था को निहायत धूर्तता के अलावा कुछ न कहूंगा. अंध-भक्ति और अंध-विरोध के बीच कुछ मुद्दे ऐसे होते हैं जिन पर सबको एक जुट होकर मंथन करना चाहिए. आज जबकि भारत दुनिया की छःठी सबसे बड़ी अर्थव्यस्था है ऐसे में भूख और कुपोषण से मृत्यु का होना अपने आप में बड़ा और गम्भीर सवाल है. ये सवाल सिर्फ सरकार से नहीं बल्कि "जीवन जीने का गरिमामय अधिकार" देने वाली हर उत्तरदायी संस्था से भी है. 

देश, देश का लोकतंत्र, देश की सरकार देश के नागरिकों की मजबूती पर निर्भर करता है और अगर देश में अमीरी और गरीबी की खाई ऐसे ही बढ़ती रही तो देश की गरिमा तो धूमिल होगी ही साथ ही साथ लोगों का विश्वास शासन व्यवस्था से उठ जायेगा. 

ये सिर्फ एक भुखमरी की घटना नहीं है, विकास और गरीबी हटाओ कहने वालों के मुँह पर एक कालिख है, जो गंगा के पावन जल से और संगम स्नान से भी नहीं धुल सकती.


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