तुम ने आकर अनजाने में



सुनो 
तुम जो कहते हो न 
लिखो
तो 
तुम ही बताओ 
क्या रह गया है शेष 
लिखने को !

जब तुम ने अध खुले, अधरों से मुस्कुरा कर 
अपनेपन की दस्तखत कर दी

कांटो भरी जीवन पथ पर, मैं थोड़ी भूली भूली थी 
जाने कब, कहाँ से आकर, राहों में फूल बिछा दी

जाने वो कौन सी पहर थी, 
अपनी तुम ने याद दिला दी

जाने ये क्यों होता है, 
कोयल जब कोई गीत सुनाए
टीस सी क्यों हृदय में उठती है

जीवन के कठिन डगर पर चलते चलते 
जड़ता है नित्य ही पीड़ा

तुम ने आकर अनजाने में 
मेरे हृदय पटल से हर ली पीड़ा

शुक्रिया करूँ या करूँ मैं वंदन
तेरी मैं कृतज्ञ रहूँगी 

- बन्दना पाण्डेय 

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