पूंछ पर पांव रखा तो कांग्रेस को याद आ गए घोटाले



''राजनीति के बारे में यूं ही नहीं कहते हमाम में सब नंगे हैं. आयकर विभाग ने छापा क्या मारा, मानो कांग्रेस की पूंछ पर पांव रख दिया. अचानक से सरकार को पिछली सरकार के घोटाले याद आ गये..'' 

खरी खरी /
संजय सक्सेना 

राजनीति के बारे में यूं ही नहीं कहते हमाम में सब नंगे हैं. आयकर विभाग ने छापा क्या मारा, मानो कांग्रेस की पूंछ पर पांव रख दिया. अचानक से सरकार को पिछली सरकार के कुछ घोटालों की फिर याद आ गई, हालांकि सिंहस्थ को लेकर आज भी तमाम नेता मौन साधे हुए हैं, लेकिन कुछ घोटालों में जांच की गति तेज होने का दावा जरूर किया जा रहा है. कांग्रेस जब विपक्ष में थी, तो विधानसभा से लेकर सड़कों तक व्यापमं, सिंहस्थ, नर्मदा किनारे वृक्षारोपण और चुनाव के ऐन पहले ई-टेंडरिंग घोटालों को लेकर खूब हंगामा मचाती रही, लेकिन सत्ता में आते ही ये सारे मुद्दे जैसे हवा हो गए थे.   

आयकर छापेमारी के बाद अचानक पूर्ववर्ती भाजपा सरकार के समय हुए कथित घोटालों के मामलों के दस्तावेजों को खंगाले जाने की कार्रवाई तेज हो गई है. जांच एजेंसी आर्थिक अपराध अन्वेषण प्रकोष्ठ यानि ईओडब्ल्यू में ई-टेंडरिंग, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय की गड़बडिय़ों, फर्जी वेबसाइट्स और सांसद निधि के उपयोग में गड़बड़ी के मामलों की विवेचना जारी है. जनजातीय कार्य विभाग के वन्या प्रकाशन सहित अन्य योजनाओं में घपलों के दस्तावेजों को भी खंगाला जा रहा है. 

माना जा रहा है कि अब कांग्रेस सरकार, भाजपा सरकार के समय हुए घपलों-घोटालों को लेकर चुप नहीं बैठेगी. हो सकता है कि इसमें कुछ समय लग जाए, लेकिन देर सबेर कांग्रेस हमलावर होगी. ई-टेंडरिंग घोटाले में ईओडब्ल्यू अब तक नौ टेंडरों के टेम्परिंग की जांच कर रही है. टेम्परिंग के मामले में केंद्र सरकार के कंप्यूटर इमरजेंसी रिस्पांस टीम (सीईआरटी) से जांच कराई गई थी, जिसकी छह महीने में रिपोर्ट में मिली है पर इसमें ईओडब्ल्यू को कुछ और तथ्यों पर सीईआरटी से उसके कमेंट चाहे गए हैं, जिसके लिए उसने कुछ जानकारी मांगी है. इसके लिए ईओडब्ल्यू ने संबंधित विभाग को पत्र लिखा है. 

सीईआरटी की इस रिपोर्ट के बाद ई-टेंडरिंग घोटाले में चल रही प्रारंभिक जांच में एफआईआर होने की संभावना है. इसके अलावा माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विवि में हुई अनियमितताओं की जांच भी ईओडब्ल्यू कर रही है. नियुक्तियों से लेकर खरीदी, मनमाना वेतन और बिना काम के वेतन आदि बिंदुओं पर जांच के बाद एफआईआर होगी. 

इसी तरह फर्जी वेबसाइट के मामले में जिला कोर्ट की सीजेएम कोर्ट में ईओडब्ल्यू ने तीन महीने का और समय मांगा है, जिसे अदालत ने मान लिया है. अब इसकी सुनवाई जुलाई में होगी. सांसद निधि के उपयोग में गड़बड़ी की जांच भी ईओडब्ल्यू द्वारा शुरू की जानी है, जिसमें अभी दस्तावेजों का परीक्षण किया जा रहा है. इसमें शिकायत है कि सांसद निधि का उपयोग तो हो गया मगर काम हुए ही नहीं. एक तो इन मामलों की जांच बहुत ही धीमी गति से चल रही है, शायद जानबूझकर ऐसा हो रहा है. 

चुनाव के पहले तो कांग्रेस इन मुद्दों को लेकर विपक्ष में बैठकर हमले कर रही थी. आज जो मंत्री बने बैठे हैं, वो चीख-चीख कर कहते थे कि सत्ता में आते ही ये जांच कराएंगे-वो जांच कराएंगे. सिंहस्थ में भी करोड़ों के घोटाले की बात कही जा रही थी, लेकिन सरकार में आने के बाद अचानक सारी जांचों की बात ही होना बंद हो गई. सवालों पर भी मंत्री कहते रहे कि जांच कराएंगे. सिंहस्थ को लेकर बाकायदा मंत्रियों की कमेटी भी बना दी गई, लेकिन जांच का मामला एक कदम भी आगे नहीं बढ़ पाया. 

सिंहस्थ में एक मटका तक सैकड़ों रुपए में खरीदा गया. शौचालय से लेकर सीसीटीवी, और तमाम चीजों की खरीदी में भारी मात्रा में भ्रष्टाचार के आरोप कांग्रेस ने लगाए थे. विधानसभा में बाकायदा दस्तावेज भी सौंपे गए. राज्यपाल तक को ज्ञापन दिया गया. पर सरकार आने के बाद आज तक सिंहस्थ की तो कोई बात ही नहीं कर रहा है. केबिनेट में शामिल एक मंत्री सबसे ज्यादा हमलावर रहे, वो आज एकदम शांत दिखाई दे रहे हैं. व्यापमं तो सरकार पूरी तरह से भूल ही चुकी है. एसटीएफ से लेकर बाकी एजेंसियां जो कांग्रेस के रडार पर थीं, आज उसकी बात ही नहीं हो रही है. 

सवाल यह उठाया जा रहा है कि पिछले दिनों यदि आयकर के छापे नहीं पड़ते तो क्या वाकई सरकार किसी मामले की जांच नहीं कराती? जो जांच अब तेज होने की बात कही जा रही है, वो जांच अब तक सुस्त चाल से क्यों चल रही थी? अभी भी कई मामले तो आज भी जांच के दायरे में नहीं हैं. नर्मदा किनारे वृक्षारोपण के कथित घोटाले की बात तो कोई कर ही नहीं रहा है. और भी बहुत सारे मुद्दे हैं, जिन्हें सत्ता में आते ही भुला दिया गया. क्या इसी तरह से वो भी याद आएंगे, या अपने आप सरकार पन्ने पलटेगी?

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