चुनावी मजबूरियाँ न होतीं तो क्या प्रज्ञा, उमा जी के निवास पर मत्था टेकतीं?




प्रज्ञा ने वरिष्ठ फायरब्रांड नेता उमा भारती के साथ विवाद की हवा मीडिया द्वारा फैलाना बताया, लेकिन सवाल है कि 'चुनावी मजबूरियाँ न होतीं तो क्या उमा जी के निवास पर मत्था टेकतीं?' 
-चित्रांश     

साध्वियों की भिड़ंत के बाद आखिरकार पार्टी के ऊपर से निर्देश के बाद साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को साध्वी उमा भारती के सामने उनके निवास पर जाकर मत्था टेकना ही पड़ गया. अब उमा जी तो हैं ही बहुत भावुक लगा लिया गले. प्रचार में सहयोग की बात भी कह दी. 



लेकिन प्रज्ञा ठाकुर ने यह कह कर कि सब मीडिया का फैलाया हुआ था, अपने तेवर दिखा दिए हैं कि वे आसानी से झुकने वाली नहीं हैं. वो तो अभी चुनावी मजबूरियाँ हैं, अन्यथा...  

उमा भारती की बात करें तो उन्हें गलत बात पर गुस्सा भी आता है, और कोई ज़रा भी झुक जाए तो पिघल भी जल्दी ही जाती हैं. ज़रा सी बात पर सीएम जैसी कुर्सी छोड़ देने वाली उमा भारती का उस समय अपने साथ अन्याय होने पर जनशक्ति बना लेना एक बड़ा निर्णय था, लेकिन कुछ ही समय में उन्हें पिघला दिया गया. 

राजनैतिक विश्लेषक बताते हैं आज अब भले उमा भारती गुस्सा हो लें, लेकिन हकीकत यही है कि अब वे भी आडवाणी जी जैसी राह पर हैं. भोपाल में चुनावी मजबूरियाँ नहीं होतीं तो अभी भी पता चल जाता. 




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