पूर्णता के चक्कर में मत पड़िये, अपूर्णता में ही समझदारी है


जल का गिलास आधा भरा हुआ, मैं नहीं कहूँगा आधा खाली है, क्योंकि मैं सकारात्मकता का समर्थन करता हूँ. उसमें हम और पानी डालकर उस अपूर्ण गिलास को पूर्ण कर सकते हैं. यदि वही गिलास पूरा भरा है, तो और भरने की गुंजाइश कदापि नहीं.   



नेहांश कुलश्रेष्ठ 'देशप्रेमी'    

क कहावत है-"अधजल गगरी छलकत जाए.." अर्थात अर्द्ध भरी गगरी से जल छलकता है, इस लोकोक्ति का अर्थ सर्वविदित है, इसलिये बस इतना ही कहा जा सकता है कि गगरी यदि आधी खाली है तो पूर्ण की जा सकती है, पर पहले ही वह जल से भरी हुई है, तो पूर्ण करने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि वह पहले ही पूर्ण है.

कहने का आशय है कि हम पढ़ाई-लिखाई करते हैं, सर्वप्रथम स्कूली शिक्षा, फिर स्नातक और फिर स्नातकोत्तर और आगे भी यदि इच्छुक हैं तो पढ़ाई का यह क्रम चलता रहता है, क्यों? क्योंकि जीवन की उन्नति हेतु कर्म तो महत्वपूर्ण है ही, ज्ञान भी महत्वपूर्ण है, तभी सम्पूर्ण विकास हमारा सम्भव है. और ज्ञान के विषय में कहा गया है -"जितना मिले उतना कम" यही हमारी मानसिकता होना चाहिए. जहाँ हमने स्वयं को पूर्ण मान लिया, पूर्ण अर्थात ईश्वर मान लिया, वहाँ हमारी दुर्गति निश्चित है, जिस प्रकार रावण की हुई, हिरण्यकश्यप की हुई, इसलिए अपूर्णता में ही समझदारी है." 


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